UAPA और जमानत का पेच: क्या ‘ट्रायल में देरी’ से मिलनी चाहिए आतंकियों को बेल? सुप्रीम कोर्ट में छिड़ी बड़ी कानूनी बहस

सुप्रीम कोर्ट में इस समय ‘गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम’ (UAPA) के तहत जमानत के नियमों को लेकर एक गंभीर और महत्वपूर्ण कानूनी बहस चल रही है। केंद्र सरकार ने कोर्ट के सामने एक तीखा सवाल रखते हुए कहा है कि यदि केवल ‘ट्रायल में देरी’ को जमानत का आधार बना दिया गया, तो इससे हाफिज सईद और अजमल कसाब जैसे खूंखार आतंकियों को भी राहत मिलने का रास्ता साफ हो सकता है।

क्या है केंद्र सरकार की दलील?

केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एसवी राजू ने कोर्ट को स्पष्ट किया कि आतंकवाद जैसे गंभीर मामलों में जमानत देते समय ‘अपराध की गंभीरता’ और ‘आरोपी की भूमिका’ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

ASG राजू ने तर्क दिया:

  • अजमल कसाब जैसे मामलों में गवाहों की भारी संख्या के कारण ट्रायल में देरी स्वाभाविक थी। क्या सिर्फ इसी देरी के आधार पर उन्हें जमानत दी जा सकती है?

  • यदि हाफिज सईद जैसे आतंकियों के मामले में सबूत जुटाने या अन्य कारणों से ट्रायल में लंबा समय लग जाए, तो क्या महज देरी के आधार पर उन्हें जमानत देना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा नहीं होगा?

सरकार का स्पष्ट मानना है कि जमानत के लिए ‘ट्रायल में देरी’ को एक ‘गणितीय फॉर्मूले’ की तरह नहीं देखा जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की दो बेंचों में मतभेद

वर्तमान विवाद का मुख्य कारण सुप्रीम कोर्ट की ही दो अलग-अलग बेंचों द्वारा दिए गए विपरीत फैसले हैं, जिसने कानूनी स्थिति में एक अस्पष्टता पैदा कर दी है:

बेंच (जज) मामला मुख्य टिप्पणी
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां सैयद इफ्तिखार अंद्राबी केस (मई 2026) लंबी देरी और जेल में लंबा समय बिताना जमानत का मजबूत आधार है। ‘जेल अपवाद है, बेल नियम है’ का सिद्धांत यहाँ भी लागू होता है।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले दिल्ली दंगा केस / उमर खालिद (जनवरी 2026) केवल लंबी कैद को जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता। अपराध की गंभीरता देखना अनिवार्य है।

अब ‘बड़ी बेंच’ करेगी फैसला

इस वैचारिक मतभेद को हमेशा के लिए सुलझाने के उद्देश्य से, जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने 22 मई 2026 को इस मामले को सुप्रीम कोर्ट की एक ‘बड़ी बेंच’ (Larger Bench) के पास रेफर कर दिया है।

अब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) इस कानूनी सवाल के निपटारे के लिए एक नई और बड़ी बेंच का गठन करेंगे। हालांकि, इस बीच कोर्ट ने 2020 के दिल्ली दंगों के आरोपी तस्लीम अहमद और खालिद सैफी को मामले के अंतिम निपटारे तक 6 महीने की अंतरिम जमानत दे दी है।

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