आज प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी पर जरूर पढ़ें यह पौराणिक कथा, इसके बिना अधूरी है बप्पा की पूजा

लखनऊ/वाराणसी: पंचांग के अनुसार आज ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि है, जिसे ‘प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी’ के रूप में बेहद श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। आज के दिन विघ्नहर्ता भगवान गणेश की विशेष पूजा-अर्चना और व्रत रखने का विधान है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विनायक चतुर्थी का व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता, जब तक कि पूजा के दौरान इसकी प्रामाणिक व्रत कथा का श्रवण या पाठ न किया जाए। यदि आप भी आज बप्पा को प्रसन्न कर अपनी मनोकामनाएं पूरी करना चाहते हैं, तो पूजा के समय इस कथा को जरूर पढ़ें।

जब चौपड़ के खेल में उलझे महादेव और माता पार्वती

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती नर्मदा नदी के सुरम्य तट पर बैठे थे। समय व्यतीत करने के लिए माता पार्वती ने भोलेनाथ से चौपड़ खेलने का आग्रह किया। भगवान शिव खेल के लिए तैयार तो हो गए, लेकिन समस्या यह उठी कि खेल में हार-जीत का निष्पक्ष फैसला कौन करेगा?

इस समस्या के समाधान के लिए भगवान शिव ने आसपास बिखरे कुछ तिनकों को इकट्ठा किया और उससे एक बालक का पुतला बनाकर उसमें प्राण फूंक दिए। शिवजी ने उस बालक से कहा, “बेटा, हम चौपड़ खेलने जा रहे हैं। तुम इस खेल को ध्यान से देखना और अंत में ईमानदारी से फैसला करना कि कौन जीता और कौन हारा।”

बालक की भूल और माता पार्वती का भयंकर श्राप

खेल शुरू हुआ और लगातार तीन बार माता पार्वती ने भगवान शिव को चौपड़ में परास्त कर दिया। लेकिन जब खेल समाप्त हुआ और बालक से विजेता का नाम पूछा गया, तो उसने भूलवश या अज्ञानतावश भगवान शिव को विजयी घोषित कर दिया।

बालक के इस गलत फैसले को सुनकर माता पार्वती अत्यंत क्रोधित हो गईं। उन्होंने क्रोध में आकर उस निर्दोष बालक को श्राप दे दिया कि वह जीवनभर लंगड़ा होकर इसी नदी के किनारे कीचड़ में पड़ा रहेगा।

नागकन्याओं ने बताया गणेश व्रत का महाउपाय

श्राप सुनते ही बालक रोने लगा और अपनी गलती के लिए माता पार्वती से क्षमा मांगने लगा। बालक को अत्यंत व्याकुल और पछताते हुए देखकर माता पार्वती का हृदय पसीज गया। उन्होंने कहा, “दिए गए श्राप को पूरी तरह वापस तो नहीं लिया जा सकता, लेकिन इस स्थान पर जल्द ही कुछ नागकन्याएं आएंगी। उनके कहे अनुसार तुम भगवान गणेश का व्रत करना, जिससे तुम्हें इस कष्ट से मुक्ति मिलेगी।”

कुछ समय बाद वहां नागकन्याएं आईं और उन्होंने दुखी बालक को दुखों से मुक्ति पाने के लिए पूरे विधि-विधान से गणेश चतुर्थी व्रत की महिमा बताई। बालक ने पूरी श्रद्धा, अटूट विश्वास और नियम के साथ लगातार 21 दिनों तक भगवान गणेश का व्रत और पूजन किया।

21 दिनों के व्रत से प्रकट हुए बप्पा, ऐसे दूर हुए सारे कष्ट

बालक की कठिन और निश्छल भक्ति से प्रसन्न होकर रिद्धि-सिद्धि के दाता भगवान गणेश वहां प्रकट हुए और उसे वरदान मांगने को कहा। बालक ने कहा, “हे प्रभु! मुझे इतनी शक्ति दें कि मैं अपने पैरों पर चलकर अपने माता-पिता के पास कैलाश पर्वत पहुंच सकूं।” गणेश जी ने ‘तथास्तु’ कहा और बालक पूरी तरह स्वस्थ होकर कैलाश पर्वत पहुंच गया।

वहां पहुंचकर बालक ने अपनी इस अद्भुत आपबीती भगवान शिव को सुनाई। उस समय माता पार्वती किसी बात पर महादेव से नाराज थीं। माता पार्वती की नाराजगी दूर करने के लिए स्वयं भगवान शिव ने भी बालक द्वारा बताई गई विधि से लगातार 21 दिनों तक गणेश जी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से माता पार्वती का क्रोध पूरी तरह शांत हो गया और वे वापस कैलाश लौट आईं।

व्रत का महात्म्य: बाद में यही व्रत विधि माता पार्वती ने अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने के लिए की और कार्तिकेय स्वयं उनसे मिलने दौड़े चले आए। तभी से यह अटूट मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से विनायक चतुर्थी का व्रत रखता है, बप्पा उसके जीवन के सभी विघ्न-बाधाओं को हर लेते हैं।

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