साल 2014 में आई निर्देशक विशाल भारद्वाज की सुपरहिट बॉलीवुड फिल्म ‘हैदर’ में शाहिद कपूर के साथ काम करने वाले एक उभरते हुए कश्मीरी कलाकार की असल जिंदगी की कहानी बेहद चौंकाने वाली है। अपने अभिनय के दम पर मायानगरी में चमकने का सपना देखने वाला यह थिएटर आर्टिस्ट अचानक आतंक की दुनिया में शामिल हो गया और अंततः सुरक्षाबलों के साथ हुई एक भीषण मुठभेड़ में मारा गया।
बाजार से मीट लेने निकला था, फिर कभी नहीं लौटा
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह दास्तान हाजिन (बांदीपोरा) के रहने वाले साकिब बिलाल शेख की है। 31 अगस्त 2018 को साकिब की मां ने उसे पास के एक स्थानीय बाजार से मीट खरीदने के लिए भेजा था। लेकिन उस दोपहर के बाद साकिब कभी अपने घर वापस नहीं लौटा। वह अपने एक दोस्त मुदासिर राशिद पर्रे के साथ अचानक लापता हो गया था। लापता होने के कुछ समय बाद ही परिवार को यह स्तब्ध करने वाली भनक लगी कि दोनों ने लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठन का रास्ता चुन लिया है।
दिसंबर 2018 के मुजगुंड एनकाउंटर में हुआ ढेर
घर से लापता होने के महज कुछ महीनों बाद, दिसंबर 2018 में जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर के बाहरी इलाके मुजगुंड में आतंकियों के छिपे होने की सूचना मिली। सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच करीब 18 घंटे तक चली इस भीषण गनफाइट और एनकाउंटर में तीन आतंकवादियों को ढेर कर दिया गया। सुरक्षाबलों द्वारा मारे गए इन तीन आतंकियों में साकिब बिलाल शेख और उसका दोस्त मुदासिर भी शामिल थे।
विशाल भारद्वाज की ‘हैदर’ और थिएटर में बिखेरा था जलवा
बंदूक उठाने और देश के खिलाफ साजिश रचने से पहले साकिब बिलाल कला की दुनिया का एक जाना-माना चेहरा बनता जा रहा था। साकिब के मामा आसिम ऐजाज के मुताबिक, फिल्म ‘हैदर’ के एक सीन में साकिब का 15 सेकंड का अपीयरेंस था। श्रीनगर के अमर सिंह कॉलेज में फिल्माए गए एक बम ब्लास्ट के दृश्य में उसे इकलौते जीवित बचे शख्स के तौर पर दिखाया गया था। इसके अलावा वह एक बेहद सक्रिय थिएटर आर्टिस्ट भी था। उसने श्रीनगर और ओडिशा में आयोजित हुए कई प्रतिष्ठित स्थानीय नाटकों में मुख्य भूमिका निभाई थी, जहाँ उसके अभिनय की भारी प्रशंसा हुई थी।
हमेशा के लिए अधूरी रह गई परिवार की आखिरी इच्छा
साकिब के परिजनों के पास आज तक इस बात का कोई तार्किक जवाब नहीं है कि आखिरकार उसने यह आत्मघाती कदम क्यों उठाया। साकिब का परिवार आर्थिक रूप से बेहद संपन्न था और उसकी हर ख्वाहिश पूरी करता था। उसके मामा ने बताया कि स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने उनसे वादा किया था कि यदि साकिब कभी जिंदा घेरा गया, तो आत्मसमर्पण के लिए उसकी बात परिवार से कराई जाएगी। परिवार बस एक बार साकिब के सामने बैठकर उससे यह पूछना चाहता था कि उसने बंदूक क्यों चुनी? लेकिन मुठभेड़ में उसकी मौत के साथ ही यह सवाल हमेशा के लिए दफन हो गया।
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