Nana Patekar की मां को देर रात क्यों दी गई थी अंतिम विदाई? बेटे मल्हार पाटेकर ने बताई थी इसके पीछे की असली वजह

दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर भारतीय सिनेमा के उन गिने-चुने कलाकारों में से हैं जो अपनी बेबाकी, सादगी और आडंबरहीन जीवनशैली के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने कभी भी अपनी निजी जिंदगी, पारिवारिक दुखों या संघर्षों को प्रचार का जरिया नहीं बनने दिया। हाल के दिनों में सोशल मीडिया और विभिन्न चर्चाओं में नाना पाटेकर के परिवार से जुड़े एक भावुक प्रसंग का जिक्र तेजी से हो रहा है, जिसमें यह सवाल उठाया गया कि आखिर परिवार में देर रात अंतिम संस्कार क्यों संपन्न कराया गया था। दरअसल, यह पूरा मामला नाना पाटेकर की पूज्य माताजी निर्मला पाटेकर के निधन और उनके अंतिम संस्कार से जुड़ा हुआ है। उस वक्त भी लोगों के मन में यह सवाल उठा था कि आम तौर पर दिन में होने वाले अंतिम संस्कार के उलट यह प्रक्रिया देर रात श्मशान भूमि में शांतिपूर्वक क्यों पूरी की गई थी। इस पूरे घटनाक्रम और परिवार के फैसले के पीछे की संवेदनशील वजह को नाना पाटेकर के बेटे मल्हार पाटेकर ने बेहद संजीदगी से स्पष्ट किया था।

मां के निधन पर नाना का सादगी भरा फैसला: नहीं चाहते थे कोई दिखावा

नाना पाटेकर अपनी मां के बेहद करीब थे। जब उनकी वृद्ध मां ने इस दुनिया को अलविदा कहा, तो नाना पाटेकर और उनके पूरे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था।

उस मुश्किल घड़ी में भी नाना पाटेकर ने अपने उसूलों से कोई समझौता नहीं किया। मल्हार पाटेकर ने बताया था कि उनके पिता का यह स्पष्ट मानना था कि किसी भी अपने का जाना बेहद निजी और आत्मिक दुख का विषय होता है, इसे किसी सार्वजनिक तमाशे, वीआईपी जमावड़े या कैमरों की चकाचौंध में नहीं बदला जाना चाहिए। परिवार नहीं चाहता था कि अंतिम विदाई जैसे अत्यंत संवेदनशील और शोकाकुल क्षण में अनावश्यक भीड़, मीडिया के कैमरे या वीआईपी प्रोटोकॉल की वजह से आम जनता या पड़ोसियों को किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना करना पड़े।

देर रात अंतिम संस्कार करने के पीछे की मुख्य वजह

मल्हार पाटेकर के अनुसार, देर रात अंतिम विदाई देने का फैसला अचानक या किसी जल्दबाजी में नहीं, बल्कि पूरी तरह सोच-विचार कर और धार्मिक नियमों के दायरे में रहकर लिया गया था:

  • अनावश्यक भीड़ और ट्रैफिक जाम से बचाव: नाना पाटेकर की लोकप्रियता पूरे देश और खास तौर पर महाराष्ट्र में जबर्दस्त है। यदि खबर फैलने के बाद अंतिम संस्कार के लिए अगली सुबह तक इंतजार किया जाता, तो हजारों की संख्या में प्रशंसकों और मीडिया कर्मियों का तांता लग जाता, जिससे इलाके में भारी ट्रैफिक जाम और अफरातफरी मचने का डर था।

  • अस्पताल से प्रक्रिया पूरी होने में हुआ विलंब: निधन की औपचारिकताएं, डॉक्टरों के जरूरी कागजात और प्रक्रिया पूरी होते-होते शाम ढल चुकी थी। पार्थिव शरीर को घर लाने और परिवार के सबसे करीबी रिश्तेदारों के पहुंचने में देर हो गई थी।

  • सादगी और शांति से अंतिम विदाई की इच्छा: परिवार की दिली ख्वाहिश थी कि अंतिम यात्रा पूरी तरह शांत, सात्विक और बिना किसी हंगामे के संपन्न हो, जहां केवल वे लोग मौजूद हों जो सचमुच उस दुख में परिवार के साथ रो सकें, न कि केवल औपचारिकता निभाने आएं।

ओशिवरा श्मशान घाट पर कुछ गिने-चुने अपनों की मौजूदगी में हुआ था संस्कार

इस फैसले के तहत मुंबई के ओशिवरा श्मशान घाट पर बेहद सीमित और चुनिंदा लोगों की मौजूदगी में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया देर रात संपन्न कराई गई थी।

वहां फिल्म इंडस्ट्री के किसी तामझाम या बड़े सितारों के हुजूम के बजाय केवल परिवार के सदस्य, मल्हार, नाना के बेहद पुराने पारिवारिक मित्र और सामाजिक कार्यों से जुड़े नजदीकी साथी ही मौजूद थे। स्वयं नाना पाटेकर ने बेहद शांत भाव से अपनी मां को मुखाग्नि दी थी। वहां मौजूद लोगों का कहना था कि उस रात श्मशान घाट का सन्नाटा इस बात की गवाही दे रहा था कि इंसान अपनी जड़ों और उसूलों से कितना जुड़ा रह सकता है।

मल्हार पाटेकर ने बयां किया पिता का नजरिया

मल्हार ने बातचीत में साझा किया था कि उनके पिता नाना पाटेकर हमेशा यह सिखाते हैं कि इंसान की पहचान उसके कर्मों और उसकी सादगी से होती है, न कि इस बात से कि उसके पीछे कितनी गाड़ियां या कैमरे चल रहे हैं।

जीवन के अंतिम पड़ाव पर भी किसी को तकलीफ न पहुंचे, यही उनके परिवार की सबसे बड़ी प्राथमिकता थी। नाना पाटेकर का यह व्यवहार और मल्हार का यह स्पष्टीकरण यह साबित करता है कि यह परिवार सिनेमा की चकाचौंध के बीच रहते हुए भी अपने संस्कारों और संवेदनशीलता को किस मजबूती से थामे हुए है।

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