
सावन 2026 का पवित्र महीना शुरू हो चुका है और देशभर की सड़कें गेरुआ वस्त्र धारण किए शिव भक्तों और ‘हर हर महादेव’ के जयकारों से गूंज उठी हैं। शिव भक्त नंगे पैर मीलों का सफर तय करके पवित्र नदियों से गंगाजल लाते हैं और अपने आराध्य देव महादेव का जलाभिषेक करते हैं। आस्था और सेवा की प्रतीक इस कांवड़ यात्रा को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि आखिर यह यात्रा सावन में ही क्यों होती है और दुनिया का सबसे पहला कांवड़िया कौन था? आइए एआई और पौराणिक तथ्यों के आधार पर इसका सही उत्तर जानते हैं।
सावन में ही क्यों लाई जाती है कांवड़?
कांवड़ यात्रा का सीधा संबंध पौराणिक काल के समुद्र मंथन से है। मान्यताओं के अनुसार, सावन के महीने में ही देवताओं और दानवों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था। इस मंथन से ‘हलाहल’ नाम का भयानक विष निकला, जिससे पूरी सृष्टि नष्ट हो सकती थी। संसार को बचाने के लिए भगवान शिव ने उस विष को पी लिया और उसे अपने गले में ही रोक लिया। विष के भयंकर प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए।
विष की गर्मी के कारण महादेव का शरीर बुरी तरह तपने लगा। उनकी इस जलन को शांत करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन पर शीतल जल अर्पित किया, जिससे उन्हें भारी राहत मिली। बस इसी मान्यता के चलते हर साल सावन में पवित्र नदियों से जल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई।
दुनिया का पहला कांवड़िया कौन था?
कांवड़ यात्रा की शुरुआत किसने की, इसे लेकर हिंदू धर्म ग्रंथों और स्थानीय मान्यताओं में अलग-अलग कथाएं प्रचलित हैं। एआई सर्च और धर्म ग्रंथों के अनुसार मुख्य रूप से चार नाम सामने आते हैं:
भगवान परशुराम की कांवड़ यात्रा
ज्यादातर विद्वान और लोक मान्यताएं भगवान परशुराम को ही पहला कांवड़िया मानती हैं। कहा जाता है कि शिव के परम भक्त परशुराम ने उत्तर प्रदेश के गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल भरा था और बागपत स्थित ऐतिहासिक पुरा महादेव मंदिर में शिवलिंग का जलाभिषेक किया था। आज भी सावन में पुरा महादेव में लाखों शिव भक्त जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं।
भगवान श्रीराम का देवघर जलाभिषेक
त्रेतायुग की एक मान्यता के अनुसार, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ पहली कांवड़ उठाई थी। उन्होंने बिहार के सुल्तानगंज से गंगाजल लिया था और झारखंड के देवघर स्थित वैद्यनाथ धाम ज्योतिर्लिंग पर जल अर्पित किया था। यह कांवड़ मार्ग आज भी देश का सबसे प्रसिद्ध मार्ग है।
लंकापति रावण की शिव भक्ति
एक अन्य पौराणिक कथा कहती है कि जब समुद्र मंथन के विष से शिवजी का शरीर जल रहा था, तब उनके परम भक्त रावण ने ही कांवड़ के जरिए गंगाजल लाकर उनका अभिषेक किया था, ताकि महादेव को विष के ताप से मुक्ति मिल सके।
श्रवण कुमार का मातृ-पितृ प्रेम
कई लोग श्रवण कुमार को कांवड़ का जनक मानते हैं। कथाओं के मुताबिक, श्रवण कुमार ने अपने दृष्टिहीन माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर तीर्थ यात्रा करवाई थी। वापसी में उन्होंने गंगाजल लाकर अपने माता-पिता का तर्पण किया था, जिसे कांवड़ परंपरा का शुरुआती रूप माना जाता है।
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