
उत्तर प्रदेश के चर्चित और राजनीतिक रूप से संवेदनशील रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के 38 भवनों के ध्वस्तीकरण प्रकरण में एक नया मोड़ सामने आया है। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री आजम खान के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘जौहर विश्वविद्यालय’ के भवनों को गिराने के आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर मुरादाबाद मंडलायुक्त (कमिश्नर) न्यायालय में होने वाली सुनवाई टल गई है। सावन के दूसरे सोमवार और कांवड़ यात्रा के चलते अधिवक्ताओं के न्यायिक कार्य से विरत रहने की वजह से 10 अगस्त को होने वाली सुनवाई पूरी नहीं हो सकी। इसके बाद कमिश्नर कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनते हुए अगली सुनवाई के लिए 13 अगस्त 2026 की नई तिथि निर्धारित कर दी है। फिलहाल राहत की बात यह है कि विश्वविद्यालय प्रशासन की अपील पर कमिश्नर कोर्ट द्वारा ध्वस्तीकरण आदेश पर लगाई गई अंतरिम रोक (Stay) यथावत जारी रहेगी। इस बहुचर्चित कानूनी जंग पर केवल रामपुर ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों की नजरें टिकी हुई हैं।
रामपुर विकास प्राधिकरण का ध्वस्तीकरण आदेश और विवाद की पूरी पृष्ठभूमि
इस पूरे विवाद की शुरुआत रामपुर विकास प्राधिकरण (RDA) की उस पड़ताल से हुई थी जिसमें विश्वविद्यालय परिसर की इमारतों की वैधता की जांच की गई थी। रामपुर विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष व जिलाधिकारी द्वारा बीते 15 जुलाई को एक कड़ा आदेश सुनाया गया था। इस आदेश में जौहर यूनिवर्सिटी के परिसर में स्थित कुल 40 भवनों की जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए 38 भवनों को पूरी तरह से अवैध घोषित कर दिया गया था। प्राधिकरण का तर्क था कि इन भवनों का निर्माण बिना नक्शा (Building Map) स्वीकृत कराए गैर-कानूनी ढंग से किया गया है।
प्राधिकरण ने अपने आदेश में विश्वविद्यालय प्रबंधन को 20 दिनों का समय देते हुए कहा था कि वे इन 38 अवैध भवनों को खुद-ब-खुद ध्वस्त कर लें, अन्यथा प्रशासन बुलडोजर कार्रवाई के जरिए इन्हें ध्वस्त करने के लिए बाध्य होगा। रामपुर विकास प्राधिकरण के इस अचानक आए ध्वस्तीकरण आदेश से जौहर यूनिवर्सिटी ट्रस्ट और समाजवादी पार्टी खेमे में हड़कंप मच गया था। 38 भवनों में प्रशासनिक ब्लॉक, हॉस्टल, शैक्षणिक भवन और कई महत्वपूर्ण संकायों की इमारतें शामिल हैं, जिनके ध्वस्त होने पर पूरी यूनिवर्सिटी के अस्तित्व पर ही संकट के बादल मंडराने लगे थे।
मुरादाबाद कमिश्नर कोर्ट की कार्रवाई और स्टे का कानूनी चक्रकाल
रामपुर विकास प्राधिकरण के ध्वस्तीकरण आदेश के खिलाफ जौहर यूनिवर्सिटी ट्रस्ट ने तुरंत उच्च अदालत का रुख करने का फैसला किया। ट्रस्ट की ओर से अधिवक्ता जुनैद एजाज ने 20 जुलाई को मुरादाबाद मंडलायुक्त (कमिश्नर) आंजनेय कुमार सिंह की अदालत में एक अपील याचिका दायर की थी। इस याचिका में आरडीए के आदेश को नियमों के विपरीत बताते हुए उस पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने की गुहार लगाई गई थी।
मामले की पहली सुनवाई 28 जुलाई को तय की गई थी, लेकिन मुरादाबाद में वरिष्ठ अधिवक्ता के निधन के चलते शोक दिवस घोषित हो जाने के कारण अधिवक्ता की विशेष अर्जी पर कमिश्नर कोर्ट ने 27 जुलाई को ही सुनवाई की। 27 जुलाई को सुनवाई करते हुए मंडलायुक्त आंजनेय कुमार सिंह ने जौहर यूनिवर्सिटी प्रबंधन को बड़ी राहत देते हुए रामपुर विकास प्राधिकरण के 38 भवनों को ध्वस्त करने के आदेश पर अंतरिम रोक (Interim Stay) लगा दी थी। इसके बाद 3 अगस्त को हुई सुनवाई में विश्वविद्यालय के अधिवक्ता जुनैद एजाज और आरडीए की ओर से शासकीय अधिवक्ता दिनेश सिंह चौहान ने अपने-अपने पक्ष रखे थे। दोनों पक्षों की प्रारंभिक बहस सुनने के बाद कोर्ट ने ध्वस्तीकरण पर स्टे को आगे बढ़ाते हुए साक्ष्य पेश करने के लिए 10 अगस्त की तारीख मुकर्रर की थी।
10 अगस्त को क्यों टली सुनवाई और 13 अगस्त का क्या है महत्व?
10 अगस्त को मुरादाबाद कमिश्नर कोर्ट में दोनों पक्षों की ओर से अपने-अपने दावों के समर्थन में लिखित व मौखिक साक्ष्य प्रस्तुत किए जाने थे। शासकीय अधिवक्ता को यह सिद्ध करना था कि निर्मित 38 भवनों का स्वीकृत नक्शा आरडीए के पास मौजूद नहीं है और यह मास्टर प्लान का उल्लंघन है। वहीं, यूनिवर्सिटी ट्रस्ट के वकीलों को यह साबित करना था कि भवनों का निर्माण नियमानुसार कराया गया है अथवा वे शमन (Compoundable) की श्रेणी में आते हैं।
हालांकि, सावन के दूसरे सोमवार के कारण सुरक्षा व्यवस्था, कांवड़ यात्रा के लिए लागू रूट डायवर्जन और अधिवक्ताओं के न्यायिक कार्य से विरत रहने की वजह से सोमवार को अदालत में नियमित कार्यवाही पूरी नहीं हो सकी। दूर-दराज से वादकारियों के कोर्ट तक न पहुंच पाने के कारण वकीलों ने समय बढ़ाने का अनुरोध किया, जिसे स्वीकार करते हुए कोर्ट ने अब 13 अगस्त को अगली सुनवाई की तारीख नियत की है। 13 अगस्त को होने वाली यह सुनवाई निर्णायक मानी जा रही है, क्योंकि इसी दिन दोनों पक्ष अपने अंतिम साक्ष्य और कानूनी दलीलें जज के समक्ष प्रस्तुत करेंगे।
क्या बचेंगे 38 भवन या चलेगा बुलडोजर? जानिए भावी कानूनी संभावनाएं
जौहर यूनिवर्सिटी के 38 भवनों का भविष्य अब पूरी तरह से 13 अगस्त की सुनवाई और कमिश्नर कोर्ट के आने वाले फैसले पर निर्भर करता है। यदि कमिश्नर कोर्ट यूनिवर्सिटी ट्रस्ट की अपील को स्वीकार कर लेती है या नक्शा पास कराने (Regularisation) का अवसर प्रदान करती है, तो यूनिवर्सिटी प्रबंधन को एक बहुत बड़ी संजीवनी मिल जाएगी। ऐसे में आरडीए को अपने ध्वस्तीकरण आदेश पर पुनर्विचार करना होगा या शमन शुल्क (Compounding Fee) लेकर भवनों को वैध करने की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ सकती है।
इसके विपरीत, यदि कमिश्नर कोर्ट आरडीए के पक्ष में फैसला सुनाती है और ट्रस्ट की अपील को खारिज कर देती है, तो 38 भवनों के ध्वस्तीकरण पर लगी रोक खुद-ब-खुद हट जाएगी। ऐसी स्थिति में विश्वविद्यालय प्रबंधन के पास केवल इलाहाबाद हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने का कानूनी विकल्प बचेगा। यदि वहां से भी राहत नहीं मिलती है, तो रामपुर प्रशासन 38 भवनों पर बुलडोजर चलाकर उन्हें ध्वस्त करने की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकता है।
आजम खान और जौहर यूनिवर्सिटी का लंबा कानूनी संघर्ष
पूर्व मंत्री आजम खान और उनके परिवार के लिए जौहर यूनिवर्सिटी शुरू से ही विवादों और कानूनी लड़ाइयों का केंद्र रही है। जौहर यूनिवर्सिटी के निर्माण के लिए किसानों की जमीनों के कथित जबरन अधिग्रहण, ग्राम सभा की जमीन पर कब्जे, शत्रु संपत्ति (Enemy Property) के दावों और सरकारी अनुदानों के दुरुपयोग को लेकर दर्जनों आपराधिक व दीवानी मुकदमे दर्ज हैं। हाल ही में आय से अधिक संपत्ति, आयकर विभाग के छापों और विभिन्न मामलों में आजम खान व उनके बेटे अब्दुल्ला आजम को अदालती चक्रव्यूह का सामना करना पड़ रहा है।
यूनिवर्सिटी के 38 भवनों पर बुलडोजर का खतरा मंडराने से इसमें पढ़ने वाले हजारों छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों के भविष्य पर भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। 13 अगस्त की सुनवाई में यह साफ हो जाएगा कि मुरादाबाद कमिश्नर कोर्ट ध्वस्तीकरण के आदेश पर रोक को जारी रखती है या फिर उत्तर प्रदेश में चल रहे बुलडोजर एक्शन की कड़ी में जौहर यूनिवर्सिटी की इन इमारतों का नाम भी दर्ज होगा।
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