
अफ्रीकी देश डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) इस समय इतिहास के सबसे भयावह और घातक इबोला संकट से जूझ रहा है। स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा जारी ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, कांगो में इबोला वायरस से मरने वालों की संख्या 2,000 के आंकड़े को पार (2,011 मौतें) कर गई है।
मई 2026 के मध्य में आधिकारिक रूप से घोषित हुए इस आउटब्रेक ने तीन महीनों के भीतर ही विकराल रूप धारण कर लिया है। कांगो में अब तक 4,380 से अधिक पुष्ट मामले (Confirmed Cases) दर्ज किए जा चुके हैं। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शुरुआती 1,000 मौतों का आंकड़ा छूने में जहाँ 9 सप्ताह का समय लगा था, वहीं अगले 1,000 लोगों की मौत महज़ 3 सप्ताह में ही हो गई। डब्ल्यूएचओ ने पहले ही इस प्रकोप को अंतरराष्ट्रीय जन स्वास्थ्य आपातकाल (Public Health Emergency of International Concern) घोषित कर रखा है।
रिकॉर्ड गति से फैल रहा वायरस: क्यों बेकाबू हुई स्थिति?
विश्व स्वास्थ्य संगठन और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रकोप इतिहास में अब तक का सबसे तेज़ी से फैलने वाला इबोला आउटब्रेक (Fastest-Spreading Ebola Outbreak) बन चुका है। 2014-2016 के पश्चिमी अफ्रीका के ऐतिहासिक इबोला संकट के बाद यह इतिहास की दूसरी सबसे बड़ी इबोला महामारी बन गई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इस अप्रत्याशित फैलाव के पीछे निम्नलिखित मुख्य कारण हैं:
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दुर्लभ ‘बुंदीबुग्यो’ (Bundibugyo) स्ट्रेन: इस बार तबाही मचा रहा इबोला वायरस का मुख्य प्रकार ‘बुंदीबुग्यो’ स्ट्रेन है। यह ज़ैरे (Zaire) स्ट्रेन से अलग है। चिंता की सबसे बड़ी बात यह है कि बुंदीबुग्यो स्ट्रेन के लिए फिलहाल कोई स्वीकृत टीका (Approved Vaccine) या विशिष्ट दवा मौजूद नहीं है।
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देर से पहचान: डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक, यह वायरस फरवरी से ही पूर्वी कांगो के दूरदराज इलाकों में सक्रिय था, लेकिन शुरुआती दौर में इसके लक्षणों को मलेरिया या टाइफाइड समझ लिया गया, जिससे ट्रैकिंग में काफी देर हो गई।
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सशस्त्र संघर्ष और हिंसा: पूर्वी कांगो (विशेषकर इटुरी और उत्तरी किवू प्रांत) लंबे समय से विद्रोही गुटों की हिंसा और गृहयुद्ध से प्रभावित रहा है। लगातार होती झड़पों और हिंसा के कारण स्वास्थ्यकर्मी दूरदराज के गाँवों तक नहीं पहुँच पा रहे हैं।
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अस्पतालों पर हमले और भ्रम: स्वास्थ्य केंद्रों पर लगातार होते हमलों और स्थानीय आबादी के भीतर फैले भ्रम के कारण 60 से 70 प्रतिशत मरीज़ों की मौत अस्पतालों के बाहर घरों में ही हो रही है।
छिड़ गया पड़ोसी देशों में भी खौफ: युगांडा और आसपास के इलाके अलर्ट पर
कांगो के इटुरी, उत्तरी किवू, दक्षिण किवू, हाउट-उएले और त्शोपो प्रांतों में महामारी का सबसे ज्यादा असर देखा जा रहा है। सीमाओं पर आवाजाही के कारण पड़ोसी देश युगांडा में भी इबोला के मामले सामने आए हैं और मौतें दर्ज की गई हैं। इसके अलावा फ़्रांस में भी एक ट्रैवल-संबंधित केस की पुष्टि हुई है।
रवांडा और युगांडा जैसे सीमावर्ती देश रेड अलर्ट पर हैं और बॉर्डर स्क्रीनिंग को अत्यधिक कड़ा कर दिया गया है। वैज्ञानिकों के बीच इस बात को लेकर भी चिंता गहरा गई है कि वायरस का तेज़ी से प्रसार इसे और अधिक उत्परिवर्तित (Mutate) न कर दे।
क्या हैं इबोला के लक्षण और बचाव के रास्ते?
इबोला एक अत्यंत संक्रामक और घातक रक्तस्रावी बुखार (Hemorrhagic Fever) है। यह संक्रमित व्यक्ति के शारीरिक तरल पदार्थों (रक्त, पसीना, उल्टी, या लार) के सीधे संपर्क में आने से फैलता है।
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मुख्य लक्षण: अचानक तेज़ बुखार आना, अत्यधिक शारीरिक कमजोरी, मांसपेशियों और सिर में दर्द, गले में खराश, उल्टी, दस्त, त्वचा पर चकत्ते (Rashes) होना और गंभीर स्थिति में शरीर के आंतरिक व बाहरी अंगों से खून बहना (Bleeding)।
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बचाव और नियंत्रण: जब तक बुंदीबुग्यो स्ट्रेन की नई वैक्सीन का परीक्षण पूरा नहीं होता, तब तक संक्रमित व्यक्तियों को तुरंत आइसोलेट करना, पीपीई (PPE) किट का प्रयोग, हाथों की बार-बार सफाई और संदिग्ध मरीज़ों के संपर्क में आने वाले लोगों की कांटेक्ट ट्रेसिंग ही इस वायरस की चेन को तोड़ने का एकमात्र उपाय है।
वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसियां और संयुक्त राष्ट्र (UN) लगातार कांगो में सहायता सामग्री, ट्रीटमेंट सेंटर और डॉक्टरों की टीमें भेज रहे हैं। हालांकि, हिंसा और खराब बुनियादी ढाँचे के बीच इबोला के इस भयानक आउटब्रेक पर काबू पाना अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
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