
मुस्लिम बहुल देशों की सुरक्षा, आतंकवाद से मुकाबले और किसी भी बाहरी या आंतरिक खतरे से निपटने के लिए साल 2015 में सऊदी अरब की अगुवाई में ‘इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिज्म कोएलिशन’ (IMCTC) की नींव रखी गई थी। पश्चिमी मीडिया और रक्षा विशेषज्ञों ने इसे अनौपचारिक रूप से ‘इस्लामिक नाटो’ (Islamic NATO) का नाम दिया था। इसमें पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) समेत करीब 41 मुस्लिम देश शामिल हुए थे।
इस गठबंधन का मुख्य उद्देश्य यह दिखाया गया था कि अगर किसी भी सदस्य देश या विशेष रूप से सऊदी अरब पर कोई सैन्य या सुरक्षा संकट आता है, तो सभी सदस्य देश एकजुट होकर सेना और संसाधनों के साथ उसकी रक्षा के लिए खड़े होंगे। पाकिस्तान के पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल राहिल शरीफ को इस गठबंधन का पहला प्रमुख (कमांडर-इन-चीफ) बनाया गया था, जिससे यह संदेश देने की कोशिश की गई थी कि पाकिस्तान की परमाणु शक्ति और तुर्की की आधुनिक सेना मिलकर पूरे इस्लामिक जगत को एक सुरक्षा कवच प्रदान करेगी।
48 घंटे के भीतर कैसे फुस्स हुआ ‘इस्लामिक नाटो’ का गुब्बारा?
कागजों और बड़े-बड़े मंचों पर तैयार किया गया यह महा-गठबंधन तब ताश के पत्तों की तरह ढह गया जब सऊदी अरब के रणनीतिक ठिकानों और तेल सुविधाओं को निशाना बनाकर भीषण हमला हुआ। हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में यह उम्मीद जताई जा रही थी कि ‘इस्लामिक नाटो’ के तहत पाकिस्तान और तुर्की तुरंत हरकत में आएंगे और अपनी सेना या रक्षा तंत्र के जरिए सऊदी अरब के समर्थन में उतरेंगे।
हालांकि, हमला होने के महज 48 घंटों के भीतर इस गठबंधन का खोखलापन दुनिया के सामने आ गया। संकट की इस घड़ी में सऊदी अरब को बचाने या सैन्य मदद भेजने के बजाय पाकिस्तान और तुर्की जैसे बड़े साझेदार पूरी तरह पीछे हट गए। दोनों ही देशों ने केवल औपचारिक निंदा वाले बयान जारी करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली और किसी भी प्रकार की प्रत्यक्ष सैन्य सहायता भेजने से साफ इनकार कर दिया। इस घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया कि यह सैन्य गठबंधन केवल एक कागजी शेर था, जिसकी कोई जमीनी कूटनीतिक या सैन्य धुरी नहीं है।
संकट के समय क्यों पीछे हटे पाकिस्तान और तुर्की?
सऊदी अरब पर संकट आने पर पाकिस्तान और तुर्की का पीछे हटना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है, बल्कि इसके पीछे इन दोनों देशों की अपनी लाचारियां और कूटनीतिक मजबूरियां हैं:
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पाकिस्तान की आर्थिक लाचारी और दोहरी रणनीति: पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चरमराई हुई है और वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) व अन्य देशों की आर्थिक मदद पर टिका है। पाकिस्तान कभी नहीं चाहता कि वह मध्य पूर्व के क्षेत्रीय शिया-सुन्नी संघर्षों या ईरान के साथ किसी सीधे सैन्य टकराव में उलझे। पाकिस्तान के भीतर खुद एक बड़ी शिया आबादी है और ईरान के साथ उसकी लंबी सीमा लगती है। इसलिए, अपनी परमाणु शक्ति का ढिंढोरा पीटने वाला पाकिस्तान सऊदी अरब की रक्षा के लिए अपनी सेना भेजने से हमेशा कतराता रहा है।
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तुर्की की अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं: तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोगन खुद को मुस्लिम दुनिया का निर्विवाद नेता (खलीफा) स्थापित करने का सपना देखते हैं। तुर्की और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से मुस्लिम जगत में वर्चस्व कायम करने की होड़ रही है। तुर्की कभी नहीं चाहेगा कि वह सऊदी अरब के नेतृत्व वाले किसी गठबंधन के लिए अपनी सेना की बलि दे। इसके अलावा तुर्की का अपना रक्षा बजट और सीरिया-इराक में जारी सैन्य अभियान उसे किसी नए क्षेत्रीय संघर्ष में कूदने से रोकते हैं।
निष्पक्षता और क्षेत्रीय गुटबाजी बना विनाश का कारण
‘इस्लामिक नाटो’ के असफल होने का सबसे बड़ा कारण इसकी संरचनात्मक कमियां और सदस्य देशों के बीच आपस में ही अविश्वास होना है। उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) में जहाँ ‘आर्टिकल 5’ के तहत एक देश पर हमला सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाता है, वहीं इस इस्लामिक गठबंधन में ऐसा कोई बाध्यकारी सैन्य नियम कभी लागू ही नहीं किया गया।
इसके अलावा, यह गठबंधन शुरुआत से ही वैचारिक अंतरों से घिरा रहा। ईरान, इराक और सीरिया जैसे प्रमुख मुस्लिम देशों को इस गठबंधन से बाहर रखा गया था, जिससे यह आतंकवाद विरोधी बल के बजाय एक विशेष क्षेत्रीय गुट (सुन्नी ब्लॉक) बनकर रह गया था। कतर और तुर्की के विचार सऊदी अरब व संयुक्त अरब अमीरात से कई मुद्दों पर पूरी तरह अलग रहे हैं। जब सदस्य देशों के अपने राष्ट्रीय हित आपस में टकराते हों, तो ऐसे किसी भी सैन्य गठबंधन का ज्यादा दिन टिक पाना असंभव होता है।
निष्कर्ष: वैश्विक कूटनीति के लिए बड़ा सबक
सऊदी अरब पर हुए हमले और पाकिस्तान-तुर्की के पीछे हटने की इस घटना ने साफ कर दिया है कि केवल धार्मिक या वैचारिक आधार पर बनाए गए सैन्य गठबंधन वास्तविक युद्ध या संकट की स्थिति में काम नहीं आते। सुरक्षा केवल आधुनिक सेना, मजबूत अर्थव्यवस्था और वास्तविक राष्ट्रीय हितों के सामंजस्य से ही हासिल की जा सकती है।
48 घंटे में ‘इस्लामिक नाटो’ के इस गुब्बारे के फूटने के बाद अब सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश (Gulf Countries) अपने रक्षा तंत्र के लिए केवल इस तरह के बहुराष्ट्रीय कागजी गठबंधनों पर निर्भर रहने के बजाय अपनी सेना के आधुनिकीकरण और पश्चिमी देशों व भारत जैसे विश्वसनीय वैश्विक भागीदारों के साथ द्विपक्षीय सुरक्षा संबंधों को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
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