WHO ने फॉर्मूलेशन में किया बड़ा बदलाव, जानिए किन लोगों के लिए हर साल यह टीका लगवाना है बेहद जरूरी और जीवन रक्षक

बदलते मौसम, मानसून की बारिश और सर्दियों की आहट के साथ ही देश भर में मौसमी इन्फ्लुएंजा (फ्लू) के मामलों में तेजी से उछाल देखने को मिलता है। इसी बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), वैश्विक रोग नियंत्रण केंद्रों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इन्फ्लुएंजा वैक्सीन (Flu Shot) के फॉर्मूलेशन को लेकर एक बड़ा और ऐतिहासिक अपडेट जारी किया है। फ्लू वायरस की लगातार बदलती प्रकृति और म्यूटेशन को देखते हुए इस साल की फ्लू वैक्सीन को नए स्ट्रेन्स के अनुसार पूरी तरह अपडेट कर दिया गया है। मेडिकल साइंस में हुए इस बड़े बदलाव के बाद आम जनता के मन में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर नई वैक्सीन पहले से कैसे अलग है, इसे किसे लगवाना चाहिए और किन लोगों के लिए यह टीका सामान्य बचाव नहीं बल्कि जान बचाने वाला सुरक्षा कवच साबित होता है।

फ्लू वैक्सीन में क्या हुआ बड़ा बदलाव? जानिए क्यों बदला गया फॉर्मूलेशन

इन्फ्लुएंजा वायरस दुनिया के उन वायरसों में शामिल है जो बहुत तेजी से अपना रूप (म्यूटेशन) बदलते हैं। इसे वैज्ञानिक भाषा में ‘एंटीजेनिक ड्रिफ्ट’ कहा जाता है। हर साल दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में यह अध्ययन किया जाता है कि कौन से इन्फ्लुएंजा वायरस सबसे ज्यादा सक्रिय हैं और लोगों को गंभीर रूप से बीमार कर रहे हैं। हालिया वैश्विक निगरानी के बाद वैज्ञानिकों ने पाया कि इन्फ्लुएंजा बी का ‘यामागाटा’ (B/Yamagata) स्ट्रेन साल 2020 के बाद से दुनिया में कहीं भी सक्रिय रूप से नहीं देखा गया है।

इसी वजह से डब्ल्यूएचओ और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य नियामक संस्थाओं ने फ्लू वैक्सीन को चार स्ट्रेन (क्वाड्रिवेलेंट) से बदलकर तीन सबसे सक्रिय स्ट्रेन (ट्राइवेलेंट) पर केंद्रित करने की सिफारिश की है। नई फ्लू वैक्सीन में अब सबसे ज्यादा आक्रामक और तेजी से फैलने वाले इन्फ्लुएंजा ए (H1N1), इन्फ्लुएंजा ए (H3N2) और इन्फ्लुएंजा बी (विक्टोरिया लीजेंड) के सबसे ताजा सब-वेरिएंट्स को शामिल किया गया है। इसका सीधा फायदा यह है कि नई वैक्सीन शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को उन वायरसों के खिलाफ अधिक केंद्रित और मजबूत एंटीबॉडी तैयार करने में मदद करती है जो वर्तमान में इंसानों में संक्रमण फैला रहे हैं।

किन लोगों के लिए बेहद जरूरी है फ्लू का टीका? हाई-रिस्क ग्रुप्स की पूरी लिस्ट

चिकित्सा विशेषज्ञों और पल्मोनोलॉजिस्ट्स (श्वसन रोग विशेषज्ञ) के अनुसार, इन्फ्लुएंजा केवल एक सामान्य सर्दी-जुकाम नहीं है, बल्कि यह फेफड़ों में गंभीर संक्रमण, निमोनिया और कई मामलों में मल्टी-ऑर्गन फेलियर का कारण बन सकता है। सामान्य स्वस्थ वयस्कों में भले ही फ्लू 5 से 7 दिनों में ठीक हो जाए, लेकिन कुछ विशेष श्रेणियों के लोगों के लिए यह जानलेवा साबित हो सकता है। इन हाई-रिस्क समूहों के लिए नई फ्लू वैक्सीन लगवाना अनिवार्य माना जाता है:

  • 6 महीने से 5 साल तक के छोटे बच्चे: छोटे बच्चों का इम्यून सिस्टम पूरी तरह विकसित नहीं होता है, जिससे उनमें ब्रोंकियोलाइटिस और सीवियर निमोनिया का खतरा सबसे अधिक रहता है।

  • 60 से 65 वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिक: उम्र बढ़ने के साथ शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता प्राकृतिक रूप से कमजोर हो जाती है, जिससे बुजुर्गों में फ्लू की वजह से अस्पताल में भर्ती होने और मृत्यु का जोखिम बढ़ जाता है।

  • गर्भवती महिलाएं: गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के शरीर में हार्मोनल और इम्यूनोलॉजिकल बदलाव होते हैं। फ्लू का संक्रमण न केवल मां के फेफड़ों को प्रभावित कर सकता है, बल्कि समय से पहले प्रसव (प्री-मैच्योर डिलीवरी) का खतरा भी पैदा करता है। टीका लगवाने से मां के साथ-साथ गर्भ में पल रहे नवजात को भी जन्म के शुरुआती 6 महीनों तक सुरक्षा मिलती है।

  • क्रॉनिक बीमारियों (को-मॉर्बिडिटी) से पीड़ित मरीज: अस्थमा (दमा), सीओपीडी, टीबी, ब्रोंकाइटिस, डायबिटीज (मधुमेह), हार्ट फेलियर, हाई ब्लड प्रेशर, क्रॉनिक किडनी डिजीज और लिवर की बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए फ्लू घातक हो सकता है।

  • कमजोर इम्युनिटी वाले व्यक्ति: कैंसर का इलाज करा रहे मरीज, कीमोथेरेपी ले रहे लोग, ऑर्गन ट्रांसप्लांट वाले मरीज और ऑटो-इम्यून बीमारियों से ग्रस्त लोग।

  • हेल्थकेयर और फ्रंटलाइन वर्कर्स: डॉक्टर, नर्स और अस्पताल का स्टाफ, जो रोजाना सैकड़ों संक्रमित मरीजों के संपर्क में आते हैं और संक्रमण के वाहक बन सकते हैं।

हर साल क्यों बदलती है फ्लू वैक्सीन? समझिए इसके पीछे का वैज्ञानिक चक्र

कई लोगों के मन में यह भ्रम रहता है कि बचपन में एक बार टीका लगवा लेने के बाद बार-बार फ्लू का टीका लगवाने की क्या आवश्यकता है। डॉक्टरों का स्पष्ट कहना है कि इन्फ्लुएंजा वैक्सीन की कार्यप्रणाली अन्य टीकों से बिल्कुल अलग होती है। फ्लू वैक्सीन से शरीर में बनने वाली एंटीबॉडीज का प्रभाव आमतौर पर 6 से 9 महीने तक ही अपने चरम पर रहता है, जिसके बाद एंटीबॉडी का स्तर धीरे-धीरे घटने लगता है।

इसके अलावा, जैसा कि वायरस लगातार म्यूटेट होकर अपने बाहरी प्रोटीन स्ट्रक्चर को बदल लेता है, पिछले साल की वैक्सीन नए बदले हुए वायरस के खिलाफ उतनी प्रभावी नहीं रह जाती। यही कारण है कि दुनिया भर की स्वास्थ्य संस्थाएं हर साल वायरस के बदलते स्वरूप का अध्ययन करके वैक्सीन के स्ट्रेन को अपडेट करती हैं। इसलिए साल में एक बार वार्षिक फ्लू शॉट लेना शरीर के रक्षा तंत्र को नए वायरसों की पहचान करने और उनसे लड़ने के लिए पूरी तरह अपडेट रखता है।

भारत में फ्लू वैक्सीन लगवाने का सबसे सही समय और जरूरी सावधानियां

भारत की भौगोलिक स्थिति और मौसम चक्र के आधार पर फ्लू के मामलों के दो प्रमुख पीक देखने को मिलते हैं। पहला पीक मानसून के मौसम (जुलाई से सितंबर) में आता है, जबकि दूसरा बड़ा पीक सर्दियों के मौसम (दिसंबर से फरवरी) में देखा जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, फ्लू का टीका लगवाने का सबसे आदर्श समय मौसमी पीक शुरू होने से ठीक 2 से 4 सप्ताह पहले का होता है।

टीका लगने के बाद शरीर को वायरस के खिलाफ पर्याप्त मात्रा में सुरक्षात्मक एंटीबॉडीज बनाने में लगभग 10 से 14 दिनों का समय लगता है। इसलिए यदि मानसून से पहले (मई-जून) या सर्दियों से पहले (सितंबर-अक्टूबर) यह टीका लगवा लिया जाए, तो संक्रमण के चरम दौर में फेफड़ों की गंभीर जटिलताओं से पूरी तरह बचा जा सकता है। यह टीका पूरी तरह सुरक्षित है और इसे 6 महीने से बड़े किसी भी व्यक्ति को डॉक्टर की सलाह से लगाया जा सकता है। टीका लगने के बाद हल्के बुखार, इंजेक्शन वाली जगह पर हल्का दर्द या बदन दर्द जैसे सामान्य लक्षण हो सकते हैं, जो 24 से 48 घंटों में अपने आप ठीक हो जाते हैं।

सामान्य सर्दी-जुकाम और फ्लू में क्या है अंतर? समय पर बचाव क्यों है जरूरी

अक्सर लोग साधारण जुकाम (Common Cold) और इन्फ्लुएंजा (Flu) को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है। सामान्य जुकाम राइनोवायरस के कारण होता है, जिसमें हल्की छींकें, नाक बहना और हल्का गला खराब होता है तथा मरीज बिना किसी गंभीर समस्या के ठीक हो जाता है।

इसके विपरीत, इन्फ्लुएंजा वायरस का हमला अचानक और बहुत तेज होता है। इसमें 102 से 104 डिग्री तक तेज बुखार, असहनीय सिरदर्द, मांसपेशियों में भयंकर जकड़न, सूखी खांसी, अत्यधिक थकान और सांस लेने में तकलीफ जैसे गंभीर लक्षण सामने आते हैं। बुजुर्गों और कमजोर फेफड़ों वाले मरीजों में फ्लू कुछ ही दिनों के भीतर एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम (ARDS) का रूप ले सकता है, जहां मरीज को ऑक्सीजन और वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत पड़ जाती है।

नई और अपडेटेड फ्लू वैक्सीन इन सभी गंभीर जोखिमों, आईसीयू में भर्ती होने की संभावना और फ्लू से होने वाली मौतों को 80 से 90 प्रतिशत तक कम कर देती है। इसलिए अपने नजदीकी चिकित्सक से परामर्श लेकर समय पर फ्लू टीकाकरण कराना आपके और आपके पूरे परिवार के स्वास्थ्य की सबसे मजबूत ढाल है।

Check Also

बेअसर हो रही हैं आखिरी उम्मीद वाली एंटीबायोटिक्स, 1.59 लाख मरीजों पर शोध में सामने आया जानलेवा खतरा

देशभर के चिकित्सा जगत से एक बेहद चिंताजनक और डरावनी खबर सामने आई है। भारतीय …