
देशभर के चिकित्सा जगत से एक बेहद चिंताजनक और डरावनी खबर सामने आई है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद यानी आईसीएमआर (ICMR) के एक हालिया और व्यापक अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि अस्पतालों में भर्ती गंभीर मरीजों पर आधुनिक जीवनरक्षक एंटीबायोटिक दवाओं का असर तेजी से खत्म हो रहा है। जब किसी मरीज पर सामान्य से लेकर सबसे शक्तिशाली एंटीबायोटिक दवाएं काम करना बंद कर देती हैं, तो वह संक्रमण जानलेवा ‘सुपरबग’ का रूप ले लेता है। डॉक्टरों के पास इलाज के विकल्प खत्म होने लगते हैं, जिससे न केवल मरीजों की जान जाने का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है, बल्कि इलाज की अवधि और दवाओं पर होने वाला आर्थिक बोझ भी सामान्य से दोगुना तक पहुंच जाता है।
यह शोध देश के 20 शीर्ष तृतीयक देखभाल अस्पतालों (टर्शियरी केयर हॉस्पिटल्स) में भर्ती डेढ़ लाख से अधिक मरीजों के विस्तृत मेडिकल डेटा के आधार पर तैयार किया गया है। उत्तर प्रदेश के लखनऊ, कानपुर, उन्नाव, प्रयागराज, वाराणसी से लेकर देश की राजधानी दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, कोलकाता और चंडीगढ़ जैसे प्रमुख चिकित्सा केंद्रों के बड़े अस्पतालों में यह समस्या अब एक मूक महामारी का रूप ले चुकी है। सामान्य खांसी-जुकाम या बुखार में भी मेडिकल स्टोर से बिना डॉक्टर की पर्ची के धड़ल्ले से एंटीबायोटिक गोलियां खरीदने की जन-आदत आज भारत को दवा-प्रतिरोधक क्षमता (Antimicrobial Resistance – AMR) के बेहद खतरनाक मुहाने पर लाकर खड़ा कर चुकी है।
1.59 लाख मरीजों पर देशव्यापी शोध: 61 फीसदी मामलों में अंतिम हथियार कार्बापेनेम भी फेल
आईसीएमआर के एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस सर्विलांस नेटवर्क से जुड़े प्रख्यात वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने अप्रैल 2022 से अप्रैल 2025 के बीच 20 प्रमुख सरकारी व गैर-सरकारी मेडिकल संस्थानों के 1,59,336 मरीजों के आंकड़ों का गहन क्लिनिकल विश्लेषण किया। जांच में पाया गया कि इनमें से 26,213 मरीज ग्राम-नेगेटिव (Gram-Negative) बैक्टीरिया के गंभीर संक्रमण से जूझ रहे थे। ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया की श्रेणी में ई. कोलाई (E. coli), क्लेबसिएला न्यूमोनिया (Klebsiella pneumoniae), एसिनेटोबैक्टर बाउमानी (Acinetobacter baumannii) और स्यूडोमोनास एरुजिनोसा (Pseudomonas aeruginosa) जैसे चार प्रमुख रोगाणु शामिल हैं, जो मानव शरीर के फेफड़ों, यूरिनरी ट्रैक्ट (मूत्र मार्ग), गहरे घावों और रक्त प्रवाह में खतरनाक संक्रमण पैदा करते हैं।
अध्ययन का सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह रहा कि इन 26,213 संक्रमित मरीजों में से 16,025 यानी 61.1 प्रतिशत मामलों में संक्रमण ‘कार्बापेनेम’ (Carbapenem) एंटीबायोटिक के खिलाफ पूरी तरह प्रतिरोधी (रेजिस्टेंट) पाया गया। चिकित्सा विज्ञान में कार्बापेनेम को एंटीबायोटिक दवाओं की दुनिया का ‘ब्रह्मास्त्र’ या अंतिम हथियार माना जाता है। जब पेनिसिलिन, सेफालोस्पोरिन और फ्लोरोक्विनोलोन जैसी शुरुआती लाइन की दवाएं विफल हो जाती हैं, तब डॉक्टर मरीज की जान बचाने के लिए कार्बापेनेम का सहारा लेते हैं। जब 60 फीसदी से ज्यादा मरीजों में यह अंतिम हथियार भी बेअसर साबित होने लगे, तो आईसीयू और वेंटिलेटर पर मौजूद मरीजों के लिए डॉक्टरों के हाथ पूरी तरह बंध जाते हैं।
दवा प्रतिरोधक क्षमता से 43% तक बढ़ा मौत का जोखिम: चारों बैक्टीरिया का भयावह आंकड़ा
आईसीएमआर के शोधकर्ताओं ने जब दवाओं के प्रति संवेदनशील (जिन पर दवा असर कर रही थी) और दवाओं के प्रति प्रतिरोधी (जिन पर दवा बेअसर हो चुकी थी) मरीजों के बीच मृत्यु दर का तुलनात्मक अध्ययन किया, तो परिणाम बेहद विचलित करने वाले थे। चारों प्रमुख बैक्टीरिया के मामलों में दवा-प्रतिरोधी समूह में मौतों का आंकड़ा उल्लेखनीय रूप से बहुत अधिक दर्ज किया गया।
ई. कोलाई संक्रमण के उन मामलों में जहां बैक्टीरिया पर दवा का असर हो रहा था, वहां मृत्यु दर 17.3 प्रतिशत थी, लेकिन कार्बापेनेम-रेजिस्टेंट ई. कोलाई से पीड़ित मरीजों में यह मृत्यु दर बढ़कर सीधे 24.4 प्रतिशत पर पहुंच गई। आंकड़ों के अनुसार इसमें मौत का खतरा सामान्य से 41 प्रतिशत ज्यादा देखा गया। क्लेबसिएला न्यूमोनिया के मामले में दवा काम करने वाले मरीजों में मृत्यु दर 23.5 फीसदी थी, जबकि दवा बेअसर होने पर यह आंकड़ा 31.2 फीसदी दर्ज हुआ, जिसमें मौत का जोखिम 33 प्रतिशत अधिक पाया गया।
इसी प्रकार आईसीयू के वातावरण में आसानी से पनपने वाले एसिनेटोबैक्टर बाउमानी बैक्टीरिया के मामलों में मृत्यु दर क्रमशः 32.8 प्रतिशत से बढ़कर 37.9 प्रतिशत पाई गई, जो 16 प्रतिशत अतिरिक्त जोखिम को दर्शाती है। वहीं फेफड़ों और त्वचा के गंभीर संक्रमण का कारण बनने वाले स्यूडोमोनास एरुजिनोसा में जब दवा ने असर करना बंद किया, तो मृत्यु दर 20.2 प्रतिशत से सीधे उछलकर 28.9 प्रतिशत तक जा पहुंची, जो कि 43 प्रतिशत अधिक मृत्यु जोखिम का स्पष्ट प्रमाण है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस को खत्म कर देने मात्र से इन सभी मौतों को पूरी तरह नहीं टाला जा सकता, क्योंकि मरीज की पहले से मौजूद शारीरिक स्थिति, उम्र, अन्य पुरानी बीमारियां और अस्पताल में इलाज शुरू होने का समय भी रिकवरी में बड़ी भूमिका निभाते हैं।
खून में संक्रमण पहुंचते ही 50% तक पहुंची मृत्यु दर: 85% मामले अस्पतालों की लापरवाही से जुड़े
जब किसी मरीज के शरीर में मौजूद बैक्टीरिया स्थानीय संक्रमण से आगे बढ़कर सीधे रक्त प्रवाह (Bloodstream) में प्रवेश कर जाता है, तो उस स्थिति को सेप्सिस (Sepsis) कहा जाता है। आईसीएमआर के अध्ययन में सामने आया कि यदि कार्बापेनेम-रेजिस्टेंट बैक्टीरिया मरीज के खून तक पहुंच जाए, तो मृत्यु की दर सीधे 50 फीसदी के पार पहुंच जाती है।
अध्ययन के मुताबिक खून के संक्रमण के मामलों में कार्बापेनेम-रेजिस्टेंट एसिनेटोबैक्टर बाउमानी से संक्रमित मरीजों में मृत्यु दर 50.8 फीसदी दर्ज की गई, जबकि सामान्य स्थिति में यह 42.6 फीसदी थी। स्यूडोमोनास के मामलों में खून के संक्रमण से मौत का आंकड़ा 46.4 फीसदी (संवेदनशील में 32.8%), क्लेबसिएला न्यूमोनिया में 44.8 फीसदी (संवेदनशील में 36%) और ई. कोलाई में 39.3 फीसदी (संवेदनशील में 23.8%) तक जा पहुंचा।
इस अध्ययन का दूसरा सबसे चिंताजनक पहलू यह रहा कि इन चारों बैक्टीरिया से होने वाले खून के संक्रमणों में से 85 प्रतिशत से अधिक मामले ‘हॉस्पिटल-एक्वायर्ड इंफेक्शन’ (Hospital-Acquired Infections) पाए गए। इसका सीधा अर्थ यह है कि मरीज जब अस्पताल में भर्ती हुआ था, तब उसके खून में यह संक्रमण नहीं था, बल्कि अस्पताल के वार्ड, आईसीयू, कैथेटर, वेंटिलेटर पाइप या स्वास्थ्यकर्मियों के अशुद्ध हाथों के माध्यम से यह जानलेवा बैक्टीरिया उसके शरीर में दाखिल हुआ। यह तथ्य स्पष्ट करता है कि देश के मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण प्रोटोकॉल, साफ-सफाई, उपकरणों के स्टेरलाइजेशन और बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट पर अभी बहुत कड़े कदम उठाए जाने की तत्काल आवश्यकता है।
इलाज का बजट हुआ दोगुना: केवल दवाओं का खर्च पहुंचा 66 हजार के पार
एंटीबायोटिक्स के बेअसर होने की कीमत केवल इंसानी जान से ही नहीं चुकानी पड़ रही है, बल्कि यह आम आदमी की जेब को भी बुरी तरह खोखला कर रही है। अध्ययन में दवाओं के वित्तीय पहलुओं का विश्लेषण करते हुए पाया गया कि जिन मरीजों में बैक्टीरिया पर दवाएं काम नहीं कर रही थीं, उनके इलाज में एंटीबायोटिक दवाओं का खर्च सामान्य मरीजों की तुलना में 1.1 गुना से लेकर 2 गुना तक अधिक आया।
आंकड़ों के अनुसार, ई. कोलाई के दवा-प्रतिरोधी संक्रमण के इलाज में एक मरीज पर एंटीबायोटिक दवाओं का औसत खर्च करीब 39,846 रुपये आया, जबकि दवा असर करने वाले साधारण मामलों में यह खर्च मात्र 20,034 रुपये था। क्लेबसिएला न्यूमोनिया के मामलों में दवा-प्रतिरोधी मरीजों पर 55,688 रुपये का खर्च आया, जो संवेदनशील मरीजों (47,918 रुपये) से काफी अधिक था। एसिनेटोबैक्टर बाउमानी के इलाज में प्रतिरोधी संक्रमण के लिए दवाओं पर 62,150 रुपये खर्च हुए (संवेदनशील में 41,372 रुपये)। वहीं स्यूडोमोनास एरुजिनोसा के इलाज में यह खर्च सबसे ज्यादा 66,599 रुपये प्रति मरीज दर्ज किया गया, जबकि सामान्य स्थिति में यह 48,392 रुपये था।
आईसीएमआर ने अपनी रिपोर्ट में विशेष रूप से नोट किया है कि यह वित्तीय आकलन भारत सरकार की ‘प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि योजना’ (PMBJP) के तहत मिलने वाली बेहद रियायती दरों पर आधारित दवाओं के अनुसार किया गया है। खुले बाजार और निजी अस्पतालों के मेडिकल स्टोर्स पर बिकने वाले ब्रांडेड एंटीबायोटिक इंजेक्शनों की कीमतें जनऔषधि से कई गुना अधिक होती हैं। इसके अलावा इस खर्च में आईसीयू का प्रतिदिन का किराया, विभिन्न पैथोलॉजी जांचें, वेंटिलेटर शुल्क और डॉक्टरों की फीस शामिल नहीं है। यदि इन सभी खर्चों को जोड़ दिया जाए, तो सुपरबग संक्रमण से जूझ रहे एक मध्यमवर्गीय परिवार पर पड़ने वाला वास्तविक आर्थिक बोझ लाखों रुपये में पहुंच जाता है।
क्यों बन रहे हैं सुपरबग्स? बिना सोचे-समझे दवाएं लेने की आदत पड़ रही भारी
बैक्टीरिया में दवाओं के खिलाफ लड़ने की क्षमता रातों-रात पैदा नहीं होती। यह इंसानी गलतियों और अनियंत्रित दवा उपयोग का सीधा परिणाम है। भारत में सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग बिना किसी एमबीबीएस डॉक्टर की सलाह के, केवल मेडिकल स्टोर संचालक से पूछकर या अपनी पुरानी पर्ची देखकर एजिथ्रोमाइसिन, सिप्रोफ्लोक्सासिन, एमोक्सिसिलिन जैसी दवाएं खाने लगते हैं। कई बार लोग दो दिन दवा खाकर बुखार उतरते ही पूरा 5 या 7 दिन का कोर्स बीच में ही छोड़ देते हैं।
जब एंटीबायोटिक का कोर्स अधूरा छोड़ा जाता है, तो शरीर के कमजोर बैक्टीरिया तो मर जाते हैं, लेकिन मजबूत बैक्टीरिया जीवित बच जाते हैं। ये बचे हुए बैक्टीरिया अपनी जेनेटिक संरचना को बदल लेते हैं और उस दवा के खिलाफ अपना एक रक्षा कवच तैयार कर लेते हैं। इसे ही मेडिकल भाषा में म्यूटेशन और रेजिस्टेंस कहा जाता है। इसके अतिरिक्त पोल्ट्री फार्मिंग और पशुपालन में जानवरों का वजन तेजी से बढ़ाने और उन्हें बीमारियों से बचाने के लिए भारी मात्रा में एंटीबायोटिक्स का चारा दिया जा रहा है। इन जानवरों के मांस और दूध के जरिए भी प्रतिरोधी बैक्टीरिया और एंटीबायोटिक के अंश इंसानी शरीर में पहुंच रहे हैं, जो हमारी प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता को तहस-नहस कर रहे हैं।
इस मूक महामारी से खुद को और परिवार को कैसे बचाएं: जरूरी सावधानियां
आईसीएमआर का यह शोध पूरे देश की स्वास्थ्य प्रणाली और आम नागरिकों के लिए एक बड़ा अलार्म है। इस जानलेवा स्थिति से बचने के लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति और स्वास्थ्यकर्मियों को कुछ कठोर नियमों का पालन अपनी दिनचर्या में शामिल करना होगा।
सबसे पहला और गैर-परक्राम्य नियम यह है कि किसी भी स्थिति में ‘सेल्फ-मेडिकेशन’ (खुद से दवा लेना) बंद करें। वायरल फीवर, सामान्य सर्दी-जुकाम, गले की खराश या मौसमी फ्लू 90 प्रतिशत मामलों में वायरस के कारण होते हैं, जिन पर एंटीबायोटिक दवाओं का रत्ती भर भी असर नहीं होता। जब तक डॉक्टर ब्लड टेस्ट या कल्चर टेस्ट के बाद स्पष्ट रूप से एंटीबायोटिक न लिखें, तब तक इनका सेवन बिल्कुल न करें।
यदि डॉक्टर ने किसी संक्रमण के लिए एंटीबायोटिक दवा लिखी है, तो उसका निर्धारित कोर्स पूरा करें। भले ही आप दो दिन में पूरी तरह स्वस्थ महसूस करने लगें, लेकिन डॉक्टर द्वारा बताए गए पूरे 5, 7 या 10 दिन तक दवा का सेवन जारी रखें ताकि एक भी बैक्टीरिया जीवित न बच सके। कभी भी अपनी बची हुई दवाएं किसी रिश्तेदार या पड़ोसी को यह कहकर न दें कि ‘मुझे इससे आराम मिला था, तुम भी खा लो।’
अस्पतालों में भर्ती मरीजों से मिलने जाते समय स्वच्छता का कड़ाई से पालन करें। मरीज को छूने से पहले और बाद में साबुन से हाथ धोएं या हैंड सैनिटाइजर का प्रयोग करें। बिना आवश्यकता के अस्पताल के आईसीयू या वार्डों में भीड़ न लगाएं। वहीं चिकित्सा संस्थानों को भी चाहिए कि वे एंटीमाइक्रोबियल स्टीवर्डशिप प्रोग्राम (AMSP) को सख्ती से लागू करें, ताकि बिना क्लिनिकल आवश्यकता के मरीजों को सीधे ब्रॉड-स्पेक्ट्रम और उच्च क्षमता वाली दवाएं न दी जाएं। अपनी जागरूकता, संयम और अनुशासन से ही हम आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के इस सबसे बड़े संकट का मुकाबला कर सकते हैं।
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