
वैश्विक रक्षा और सामरिक संतुलन पर नजर रखने वाले प्रतिष्ठित थिंक-टैंकों—स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) और फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स (FAS)—के ताजा आकलनों के अनुसार, भारत ने अपने परमाणु हथियारों के जखीरे का विस्तार करते हुए इसे आधुनिक रूप देना तेज कर दिया है। रिपोर्टों के मुताबिक, भारत के परमाणु हथियारों (Nuclear Warheads) की संख्या बढ़कर करीब 190 तक पहुंच चुकी है।
भारत ने न केवल अपने वॉरहेड्स की संख्या में इजाफा किया है, बल्कि अपनी परमाणु त्रिमूर्ति (Nuclear Triad—जमीन, हवा और समुद्र से परमाणु हमला करने की क्षमता) को भी अभेद्य बना लिया है। परमाणु ऊर्जा से संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों (SSBN) के जरिए भारत समुद्र में अपनी ‘सेकंड-स्ट्राइक कैपेबिलिटी’ (Second-Strike Capability) को लगातार पुख्ता कर रहा है।
रूस बना हुआ है दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु शक्ति केंद्र
दुनिया भर के परमाणु हथियारों के कुल भंडार पर नजर डालें तो रूस शीर्ष पायदान पर बरकरार है:
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रूस (Russia): रूस के पास लगभग 5,580 से अधिक परमाणु हथियार हैं, जिनमें से 1,700 से ज्यादा वॉरहेड्स मिसाइलों और बमवर्षक विमानों पर रणनीतिक रूप से तैनात हैं।
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अमेरिका (USA): दूसरे नंबर पर मौजूद संयुक्त राज्य अमेरिका के पास करीब 5,044 परमाणु हथियार हैं। रूस और अमेरिका दोनों मिलकर दुनिया के कुल 90 प्रतिशत परमाणु हथियारों पर नियंत्रण रखते हैं।
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चीन (China): तीसरे स्थान पर मौजूद चीन ने अपने शस्त्रागार का विस्तार सबसे तेजी से किया है और उसके पास वॉरहेड्स की संख्या 500 से 600 के पार पहुंच रही है।
भारत से कितना पीछे छूट गया है पाकिस्तान?
लंबे समय तक दक्षिण एशिया में पाकिस्तान यह दावा करता रहा था कि उसके पास भारत से अधिक परमाणु हथियार हैं। लेकिन पिछले तीन वर्षों में तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है:
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पाकिस्तान का ठहरा हुआ भंडार: पाकिस्तान के पास परमाणु हथियारों की संख्या पिछले कुछ वर्षों से 170 के आसपास स्थिर बनी हुई है। आर्थिक तंगी और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रतिबंधों की निगरानी के चलते इस्लामाबाद अपने जखीरे को उस तेजी से नहीं बढ़ा पा रहा है।
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20 वॉरहेड्स की सीधी बढ़त: भारत के पास मौजूद 190 वॉरहेड्स के मुकाबले पाकिस्तान अब करीब 20 हथियारों से पीछे छूट चुका है।
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रणनीतिक प्राथमिकताओं में अंतर: पाकिस्तान का परमाणु तंत्र विशुद्ध रूप से भारत-केंद्रित और सामरिक (टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन्स) मिसाइलों पर आधारित है। इसके विपरीत, भारत का ध्यान अब लंबी दूरी की अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों (ICBMs) और पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक संतुलन स्थापित करने पर केंद्रित है।
अग्नि-V की MIRV तकनीक और Fast Breeder Reactor बने गेमचेंजर
भारतीय रक्षा वैज्ञानिकों ने हाल के समय में दो बड़ी तकनीकी छलांग लगाई हैं, जिसने परमाणु संतुलन को भारत के पक्ष में मोड़ दिया है:
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मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेबल री-एंट्री व्हीकल (MIRV): भारत ने ‘मिशन दिव्यास्त्र’ के जरिए अग्नि-V मिसाइल पर एमआईआरवी तकनीक का सफल परीक्षण किया है। इसका अर्थ यह है कि एक ही मिसाइल एक साथ अलग-अलग दिशाओं में कई परमाणु हथियार (वॉरहेड्स) ले जा सकती है और अलग-अलग ठिकानों को एक साथ नष्ट कर सकती है।
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प्लूटोनियम क्षमता में उछाल: कल्पक्कम स्थित 500 मेगावाट के प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) के सक्रिय होने के बाद भारत की हथियार-ग्रेड प्लूटोनियम उत्पादन क्षमता में भारी इजाफा हुआ है। सामरिक विश्लेषकों का अनुमान है कि भारत आने वाले वर्षों में अपनी जरूरत के अनुसार अपने शस्त्रागार को 225 या उससे अधिक वॉरहेड्स तक सुरक्षित रूप से विस्तारित करने की पूर्ण क्षमता रखता है।
‘नो फर्स्ट यूज’ (NFU) नीति पर कायम भारत
हथियारों के जखीरे में विस्तार के बावजूद भारत अपनी स्थापित परमाणु नीति ‘नो फर्स्ट यूज’ (पहले इस्तेमाल न करने की नीति) और ‘विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध’ (Credible Minimum Deterrence) पर पूरी तरह अडिग है। भारत की आधिकारिक नीति स्पष्ट करती है कि वह किसी गैर-परमाणु देश पर हमला नहीं करेगा और परमाणु हथियारों का उपयोग केवल तभी करेगा जब देश या उसकी सेनाओं पर पहले परमाणु या रासायनिक-जैविक हमला किया जाए।
समुद्र में आईएनएस अरिहंत (INS Arihant), आईएनएस अरिघात (INS Arighat) और नई आईएनएस अरिधमान (INS Aridhaman) पनडुब्बियों की तैनाती ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि किसी भी दुस्साहस की स्थिति में भारत दुश्मन को तुरंत और निर्णायक जवाबी कार्रवाई देने में सक्षम है।
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