भारत, चीन और रूस ले आए डॉलर का तोड़; क्या है BRICS का नया डिजिटल पेमेंट प्लान, जिससे उड़ी अमेरिका की नींद?

वैश्विक व्यापार और वित्तीय लेनदेन में दशकों से चले आ रहे अमेरिकी डॉलर (US Dollar) के एकछत्र राज और पश्चिमी स्विफ्ट (SWIFT) मैसेजिंग सिस्टम पर निर्भरता को कम करने के लिए ब्रिक्स (BRICS) समूह ने एक बड़ा रणनीतिक कदम उठाया है। नई दिल्ली में आयोजित हो रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 के केंद्र में सदस्य देशों के बीच एक स्वतंत्र, सुरक्षित और विकेंद्रीकृत क्रॉस-बॉर्डर डिजिटल पेमेंट सिस्टम की स्थापना का प्रस्ताव सबसे अहम चर्चा का विषय बना हुआ है।

वैश्विक मंच पर इसे डॉलर के आधिपत्य (De-Dollarization) के खिलाफ एक मजबूत वित्तीय सुरक्षा कवच के रूप में देखा जा रहा है। पश्चिमी प्रतिबंधों के हथियार बनते डॉलर के जवाब में भारत, चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका सहित विस्तारित सदस्य देशों ने साझा मुद्रा (Common Currency) जैसी जटिल बहस में उलझने के बजाय अपनी-अपनी सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) और घरेलू फास्ट पेमेंट नेटवर्क्स को एक-दूसरे के साथ इंटीग्रेट (Interoperable) करने का व्यावहारिक फॉर्मूला तैयार किया है।

क्या है BRICS का नया पेमेंट मॉडल? कोई नई करेंसी नहीं, सिस्टम का इंटीग्रेशन

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजार में अक्सर यह अटकलें लगाई जाती थीं कि ब्रिक्स देश यूरो की तरह कोई साझा ‘ब्रिक्स करेंसी’ (BRICS Currency) या ‘ब्रिक्स कॉइन’ लॉन्च करेंगे। लेकिन भारत के संतुलित कूटनीतिक रुख और व्यावहारिक रणनीति के चलते ब्रिक्स ने बिल्कुल अलग और व्यावहारिक रास्ता चुना है:

  • सीबीडीसी का आपसी जुड़ाव (CBDC Interoperability): भारत की डिजिटल करेंसी ई-रुपया (e-Rupee), चीन की डिजिटल युआन (e-CNY) और रूस की डिजिटल रूबल (Digital Ruble) को एक साझा तकनीकी गेटवे से जोड़ा जाएगा।

  • राष्ट्रीय मुद्राओं पर पूर्ण नियंत्रण: किसी साझा करेंसी के बजाय हर देश की अपनी करेंसी पर पूर्ण संप्रभु नियंत्रण बना रहेगा। तकनीकी स्तर पर केवल ऐसा ब्रिज तैयार किया जा रहा है जिससे दोनों देशों के बैंक बिना किसी तीसरे मध्यस्थ (Intermediary Bank) के सीधे लेनदेन सेटल कर सकें।

  • फास्ट पेमेंट रेल का एकीकरण: भारत का विश्व-प्रसिद्ध यूपीआई (UPI) नेटवर्क, जिसने अकेले जुलाई 2026 में 23.66 अरब लेनदेन (लगभग 314 अरब डॉलर मूल्य) का रिकॉर्ड बनाया, चीन का क्रॉस-बॉर्डर इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम (CIPS) और रूस का वित्तीय मैसेजिंग सिस्टम (SPFS) इस नेटवर्क की मजबूत रीढ़ बनेंगे।

कैसे काम करेगा यह नया पेमेंट सिस्टम? ‘नेट सेटलमेंट साइकिल’ से लागत में भारी कटौती

पारंपरिक व्यवस्था में जब भारत को रूस या चीन से कोई कच्चा माल या मशीनरी खरीदनी होती है, तो पहले भारतीय रुपये को अमेरिकी डॉलर में बदला जाता है, फिर वह अमेरिकी बैंकों के क्लीयरिंग हाउस और स्विफ्ट नेटवर्क से होकर गुजरता है, जिसके बाद वह गंतव्य देश की मुद्रा में बदलता है। इस पूरी प्रक्रिया में भारी कन्वर्जन चार्ज (Currency Conversion Fee) लगता है और विदेशी प्रतिबंधों का जोखिम हमेशा मंडराता रहता है।

ब्रिक्स का नया पेमेंट सिस्टम नेट सेटलमेंट साइकिल (Net Settlement Cycle) के फॉर्मूले पर काम करेगा:

  • उदाहरण के लिए, यदि एक महीने के व्यापार चक्र में भारत ने चीन से 500 अरब रुपये मूल्य का सामान आयात किया और उसी अवधि में चीन ने भारत से 450 अरब रुपये का सामान खरीदा, तो हर लेनदेन का अलग-अलग डॉलर में भुगतान करने की जरूरत नहीं होगी।

  • महीने के अंत में केवल दोनों के बीच के शुद्ध अंतर यानी 50 अरब रुपये की रकम का ही प्रत्यक्ष डिजिटल निपटान होगा।

  • इससे विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर रखने की मजबूरी घटेगी, बैंकों का ट्रांजेक्शन खर्च लगभग शून्य के करीब पहुंचेगा और व्यापारिक कंपनियों व एमएसएमई (MSMEs) को करेंसी रिस्क से आजादी मिलेगी।

भारत का संतुलित कूटनीतिक संतुलन: ‘एंटी-वेस्टर्न’ नहीं, गैर-पश्चिमी विकल्प

इस पूरे मॉडल को अंतिम रूप देने में भारत की भूमिका बेहद अहम रही है। रूस और चीन जहां इस सिस्टम को पश्चिमी प्रतिबंधों और स्विफ्ट के सीधे विकल्प के रूप में आक्रामक तरीके से पेश करना चाहते थे, वहीं भारत ने इसे स्पष्ट रूप से केवल ‘सुलभ और किफायती व्यापारिक सहूलियत’ का नाम दिया है।

भारत का स्पष्ट मानना है कि ब्रिक्स को अमेरिका या पश्चिमी देशों के खिलाफ किसी ‘एंटी-वेस्टर्न ब्लॉक’ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। भारत की प्राथमिकता अपनी अर्थव्यवस्था की सुरक्षा, रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण (Internationalization of Rupee) और अपने मजबूत यूपीआई मॉडल को वैश्विक स्तर पर स्थापित करना है, न कि किसी नई चीनी युआन-आधारित निर्भरता में फंसना।

अमेरिका और पश्चिमी देशों की नींद क्यों उड़ी?

वाशिंगटन और वॉल स्ट्रीट के विश्लेषक इस नए ब्रिक्स पेमेंट कॉरिडोर पर पैनी नजर बनाए हुए हैं:

  • प्रतिबंधों की काट (Sanctions Ineffective): अमेरिका की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक ताकत अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग पर उसकी पकड़ और डॉलर के जरिए प्रतिबंध लगाने की क्षमता रही है। यदि ब्रिक्स देश स्वतंत्र सीबीडीसी प्लेटफॉर्म पर व्यापार करने लगे, तो अमेरिका के वित्तीय प्रतिबंधों का प्रभाव निष्प्रभावी हो जाएगा।

  • वैश्विक रिजर्व करेंसी का दबाव: कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस, खाद्यान्न और उर्वरक के दुनिया के सबसे बड़े आयातक और निर्यातक अब ब्रिक्स+ समूह में शामिल हैं। यदि ऊर्जा और कृषि व्यापार अपनी स्थानीय मुद्राओं में होने लगा, तो वैश्विक स्तर पर विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की मांग तेजी से घटेगी।

  • समानांतर वित्तीय राजमार्ग (Parallel Financial Highway): बिना डॉलर के व्यापार करने का यह सुरक्षित मॉडल लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य विकासशील देशों के लिए भी एक बड़ा आकर्षण बन सकता है।

हालांकि इस सिस्टम को पूरी तरह क्रियान्वित करने के लिए तकनीकी मानकों, लिक्विडिटी प्रबंधन और डेटा सुरक्षा से जुड़ी कई कसौटियों को पार करना बाकी है, लेकिन ब्रिक्स देशों का यह एकजुट प्रयास स्पष्ट संकेत दे रहा है कि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था अब एकतरफा नहीं रहने वाली।

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