
नई दिल्ली। देश की न्यायपालिका के सामने एक ऐसा कानूनी सवाल खड़ा हुआ है जो न केवल संवैधानिक मर्यादाओं बल्कि जीव जगत के अस्तित्व की नई परिभाषा लिख सकता है। एक जनहित याचिका के माध्यम से अदालत से यह मांग की गई है कि जानवरों की हत्या को मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन माना जाए। याचिका में दी गई दलीलों ने कानूनी गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है, जिसमें पशु क्रूरता और उनके जीवन के अधिकार को सीधे संविधान के रक्षक ‘अनुच्छेद 21’ से जोड़कर देखा जा रहा है। यदि अदालत इन तर्कों को स्वीकार करती है, तो यह देश के न्यायिक इतिहास में एक युगांतरकारी मोड़ साबित होगा।
अनुच्छेद 21 की नई व्याख्या: केवल इंसान ही क्यों?
याचिकाकर्ता ने भारतीय संविधान के सबसे शक्तिशाली स्तंभ, अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए एक अत्यंत गंभीर तर्क पेश किया है। याचिका में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि संविधान का यह अनुच्छेद प्रत्येक व्यक्ति के ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ की रक्षा करता है। याचिका के अनुसार, ‘जीवन’ शब्द की परिभाषा केवल मानव जाति तक ही सीमित नहीं रखी जानी चाहिए। याचिकाकर्ता का दावा है कि प्रकृति में मौजूद हर जीव के पास प्राण हैं और उनके जीवन की सुरक्षा करना भी इसी संवैधानिक दायरे का हिस्सा है। इस तर्क के जरिए जानवरों की हत्या को असंवैधानिक घोषित करने की पुरजोर मांग की गई है।
मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का दावा
कानूनी बारीकियों को रेखांकित करते हुए याचिका में तर्क दिया गया है कि जिस प्रकार मनुष्यों को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार है, उसी प्रकार बेजुबान जानवरों को भी पीड़ा और मृत्यु के भय से मुक्त रहने का अधिकार मिलना चाहिए। याचिका के मुताबिक, जानवरों की हत्या करना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है, क्योंकि जीवन की सुरक्षा का अधिकार सार्वभौमिक होना चाहिए। इस अर्जी ने पशु अधिकार कार्यकर्ताओं के बीच एक नई उम्मीद जगा दी है, जो लंबे समय से पशु क्रूरता निवारण अधिनियम (PCA Act) को और अधिक सख्त बनाने की वकालत कर रहे हैं।
न्यायपालिका के रुख पर टिकी निगाहें
अदालत के समक्ष पेश की गई इस चुनौती ने विशेषज्ञों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। जानकारों का मानना है कि यदि अनुच्छेद 21 का विस्तार जानवरों तक किया जाता है, तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे। इससे न केवल बूचड़खानों और मांस उद्योग पर असर पड़ेगा, बल्कि वन्यजीव संरक्षण के नियमों में भी आमूल-चूल बदलाव करने होंगे। फिलहाल, हर किसी की नजरें अदालत की अगली टिप्पणी पर टिकी हैं कि क्या कानून की देवी बेजुबानों के हक में ‘जीवन के अधिकार’ की नई व्याख्या करेगी।
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