‘शरीफ’ समझने की भूल पड़ी भारी? जेल की सलाखों से इमरान खान ने आसिम मुनीर की रणनीति पर फेरा पानी, पाकिस्तान में पलटा सियासी पासा

पाकिस्तान की सत्ता के गलियारों और रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय (जीएचक्यू) में यह माना जा रहा था कि पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के मुखिया और पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को जेल की कालकोठरी में बंद करके, दर्जनों मुकदमों में उलझाकर और पार्टी को तोड़कर उनकी राजनीति का हमेशा के लिए अंत कर दिया जाएगा। सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर और शहबाज शरीफ की गठबंधन सरकार ने जिस ‘माइनस इमरान’ फॉर्मूले को लागू करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, आज वही दांव उलटा पड़ता दिखाई दे रहा है। रावलपिंडी की बेहद सख्त अदियाला जेल में तीन साल से अधिक समय बिताने के बावजूद इमरान खान न तो टूटे और न ही झुके। इसके विपरीत, जेल की चारदीवारी से चले उनके राजनीतिक और कानूनी ‘माइंड गेम’ ने जनरल आसिम मुनीर के रणनीतिक ब्लूप्रिंट पर पूरी तरह पानी फेर दिया है।

‘माइनस इमरान’ फॉर्मूले की नाकामी: पार्टी टूटने के बावजूद जनता का अटूट भरोसा

साल 2022 में अविश्वास प्रस्ताव के जरिए इमरान खान की सरकार गिराए जाने और 9 मई 2023 की हिंसा के बाद सैन्य प्रतिष्ठान ने बेहद आक्रामक रुख अपनाया था। पीटीआई के शीर्ष नेताओं को जेलों में डाला गया, कई बड़े चेहरों से जबरन प्रेस कॉन्फ्रेंस कराकर पार्टी छुड़वाई गई और इमरान खान पर तोशाखाना, अल-कादिर ट्रस्ट व सिफर केस जैसे 150 से अधिक मुकदमे थोप दिए गए। सेना और सरकार का आकलन था कि नेतृत्व विहीन होते ही पार्टी बिखर जाएगी और इमरान खान जनता की यादों से गायब हो जाएंगे।

लेकिन यह आकलन पूरी तरह गलत साबित हुआ। चुनाव चिन्ह ‘बल्ला’ छीने जाने और स्वतंत्र उम्मीदवारों के रूप में मैदान में उतरने के बावजूद पीटीआई समर्थित प्रत्याशियों को जनता ने जिस तरह ऐतिहासिक जनसमर्थन दिया, उसने सैन्य प्रतिष्ठान की सभी योजनाओं को ध्वस्त कर दिया। इमरान खान की गैर-मौजूदगी में भी उनका नाम ही चुनाव में सबसे बड़ा नैरेटिव बन गया, जिसने यह साबित कर दिया कि पाकिस्तान की आम जनता आज भी पारंपरिक राजनीतिक परिवारों के बजाय इमरान के आक्रामक रुख के साथ खड़ी है।

अदियाला जेल से चलाया मनोवैज्ञानिक युद्ध, सोशल मीडिया पर खाई मात

जनरल आसिम मुनीर के सामने सबसे बड़ी चुनौती इमरान खान का डिजिटल नैरेटिव और उनका जबरदस्त जनसंपर्क रहा है। जेल में होने के बावजूद इमरान खान अपनी कानूनी टीम, बहनों और पार्टी नेताओं के जरिए जो संदेश बाहर भेजते हैं, वह मिनटों में सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगता है।

सैन्य प्रतिष्ठान ने टीवी चैनलों और मुख्यधारा के प्रिंट मीडिया पर इमरान खान का नाम लेने और उनकी तस्वीर दिखाने पर पूरी तरह अघोषित प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन पीटीआई के सोशल मीडिया विंग ने एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) और डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल करके पारंपरिक मीडिया सेंसरशिप को पूरी तरह निष्प्रभावी कर दिया। नतीजतन, सरकार की हर दलील और सेना का हर नैरेटिव जनता के बीच अविश्वास का शिकार होता चला गया। पाकिस्तान की युवा आबादी ने सैन्य प्रतिष्ठान के इस दबाव को एकतरफा जुल्म के रूप में देखा, जिससे इमरान खान की लोकप्रियता घटने के बजाय और तेजी से बढ़ गई।

डील या निर्वासन? जब इमरान खान ने ठुकरा दी लंदन की राह

पाकिस्तान की राजनीति का यह पुराना इतिहास रहा है कि जब भी किसी पूर्व प्रधानमंत्री या बड़े नेता पर सेना का शिकंजा कसता है, तो वह किसी गुप्त समझौते (एनआरओ) के तहत या तो विदेश चला जाता है या कुछ वर्षों के लिए राजनीति से दूरी बना लेता है। नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो से लेकर परवेज मुशर्रफ तक ने संकट के समय यही रास्ता चुना था। सैन्य प्रतिष्ठान को उम्मीद थी कि अदियाला जेल की सख्त परिस्थितियां, एकांत कारावास और लगातार गिरती सेहत के दबाव में आकर इमरान खान भी देश छोड़ने या सत्ता से समझौता करने के लिए तैयार हो जाएंगे।

लेकिन इमरान खान ने अपने रुख से सभी को चौंका दिया। उन्होंने कई मौकों पर अपनी वकीलों की टीम के जरिए सार्वजनिक किया कि वह किसी भी हाल में पाकिस्तान छोड़कर नहीं जाएंगे और न ही किसी ‘डील’ पर हस्ताक्षर करेंगे। उन्होंने साफ कह दिया कि वह जेल में अपनी पूरी जिंदगी गुजारने के लिए तैयार हैं, लेकिन अपने सिद्धांतों और समर्थकों के भरोसे से समझौता नहीं करेंगे। उनके इस अडिग रवैये ने जनरल मुनीर के सामने सबसे बड़ा संकट खड़ा कर दिया, क्योंकि सेना के पास अब उन्हें पीछे हटाने का कोई आसान विकल्प नहीं बचा था।

सुप्रीम कोर्ट के कड़े फैसले और संवैधानिक मोर्चे पर सरकार की घेराबंदी

इमरान खान की रणनीति का दूसरा सबसे मजबूत स्तंभ न्यायपालिका और संवैधानिक नियमों का सहारा लेना रहा। हालांकि सरकार और सुरक्षा एजेंसियों ने अदालतों पर दबाव बनाने की कई कोशिशें कीं, लेकिन पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों के कई फैसलों ने सत्तापक्ष को बैकफुट पर ला खड़ा किया। आरक्षित सीटों (रिजर्व्ड सीट्स) के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पीटीआई के पक्ष में दिए गए ऐतिहासिक फैसले ने संसद में सरकार के दो-तिहाई बहुमत के सपने को चकनाचूर कर दिया।

इसके अलावा, इमरान खान की सेहत को लेकर सुप्रीम कोर्ट की हालिया सख्त टिप्पणियों और उनके मानवीय अधिकारों की रक्षा के निर्देशों ने सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी असहज स्थिति में डाल दिया है। मानवाधिकार संगठनों और विदेशी संसदों (खासकर अमेरिकी कांग्रेस और ब्रिटिश संसद) से उठ रही आवाजों ने सेना पर वैश्विक कूटनीतिक दबाव को काफी बढ़ा दिया है, जिससे सरकार के लिए इमरान खान के खिलाफ कोई भी गैर-संवैधानिक या अत्यधिक दमनकारी कदम उठाना लगभग नामुमकिन हो गया है।

आर्थिक संकट और जनता का आक्रोश: जनरल आसिम मुनीर के सामने विकट चुनौती

मौजूदा समय में पाकिस्तान इतिहास के सबसे गंभीर आर्थिक संकट, रिकॉर्ड तोड़ महंगाई, ऊर्जा की आसमान छूती कीमतों और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से बेलआउट पैकेज मिलने के बावजूद आम जनता का जीवन दूभर हो चुका है। ऐसे में अवाम का गुस्सा सीधे तौर पर शहबाज शरीफ सरकार और उनका समर्थन करने वाले सैन्य प्रतिष्ठान पर फूट रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर जिस राजनीतिक स्थिरता की उम्मीद कर रहे थे, वह इमरान खान को नजरअंदाज करके हासिल नहीं की जा सकी। देश के सबसे बड़े प्रांत पंजाब और रणनीतिक रूप से संवेदनशील खैबर पख्तूनख्वा में इमरान खान का जनाधार इतना मजबूत है कि बिना किसी राजनीतिक समझौते के देश को सामान्य स्थिति में लाना असंभव साबित हो रहा है। इमरान खान ने साफ संदेश दे दिया है कि जब तक जनादेश का सम्मान नहीं होगा और निष्पक्ष चुनाव नहीं कराए जाएंगे, तब तक पाकिस्तान में कोई भी सरकार चैन से काम नहीं कर पाएगी।

पाकिस्तान की सियासत का अंतिम सच: कौन मारेगा अंतिम बाजी?

इमरान खान और जनरल आसिम मुनीर के बीच जारी यह शक्ति परीक्षण केवल दो व्यक्तियों की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान के भविष्य, उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था और सेना के पारंपरिक वर्चस्व के बीच का ऐतिहासिक टकराव है। इमरान खान ने यह साबित कर दिया है कि उन्हें केवल एक पारंपरिक राजनेता समझकर किनारे लगाने की रणनीति पूरी तरह विफल हो चुकी है।

आने वाले दिनों में पीटीआई के प्रस्तावित राष्ट्रव्यापी आंदोलनों, अदालती सुनवाइयों और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच यह देखना बेहद अहम होगा कि सैन्य प्रतिष्ठान अपनी रणनीति में क्या बदलाव करता है। क्या सेना इमरान खान के साथ किसी सम्मानजनक बातचीत की मेज पर आने को मजबूर होगी या यह राजनीतिक गतिरोध देश को एक और बड़े संवैधानिक व सामाजिक संकट की ओर धकेल देगा? फिलहाल, इस सियासी शतरंज की बिसात पर इमरान खान ने अपने धैर्य और जनसमर्थन के दम पर सत्ता और सेना के गठबंधन को पूरी तरह मात दे दी है।

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