
सनातन परंपरा में पितृ पक्ष (महालय) की अवधि पूर्वजों के प्रति आभार, सम्मान और पिंडदान-तर्पण के लिए समर्पित सबसे पावन समय मानी जाती है। मान्यता है कि भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि से लेकर आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) तक कुल 16 दिनों के लिए पितर सूक्ष्म रूप में अपने परिजनों के घर आते हैं। इस दौरान पितरों की शांति और संतुष्टि के लिए किए जाने वाले श्राद्ध कर्म में ‘भोजन’ का सबसे बड़ा और केंद्रीय महत्व होता है।
अक्सर लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि पितृ पक्ष कब से शुरू हो रहा है और जिस दिन घर में श्राद्ध की तिथि हो, उस दिन रसोई में क्या पकाना चाहिए और क्या पकाना शास्त्रों के अनुसार सर्वथा अनुचित माना गया है। भोजन की शुद्धता और सही सामग्री का चयन न होने पर पितर भोजन स्वीकार किए बिना ही लौट जाते हैं। इसलिए श्राद्ध के दिन क्या बनाएं और किन चीजों को बनाने से सख्त परहेज करें, इसकी पूरी सूची जान लेना आवश्यक है।
पितृ पक्ष कब से शुरू: जानिए तिथियों का महत्व
शास्त्रों के अनुसार, पितृ पक्ष की शुरुआत हर वर्ष भाद्रपद पूर्णिमा से होती है और इसका समापन आश्विन अमावस्या यानी सर्वपितृ अमावस्या के दिन होता है। इन 16 दिनों में लोग अपने पूर्वजों की देहावसान तिथि के अनुसार श्राद्ध कर्म, तर्पण और ब्राह्मण भोज का आयोजन करते हैं।
यदि किसी कारणवश परिवार को अपने पूर्वजों की सटीक तिथि ज्ञात न हो, तो वे सर्वपितृ अमावस्या के दिन सभी पितरों के निमित्त श्राद्ध कर सकते हैं। इसके अलावा अकाल मृत्यु या दुर्घटना में दिवंगत हुए परिजनों के लिए चतुर्दशी तिथि पर श्राद्ध करने का विधान शास्त्रों में बताया गया है।
श्राद्ध के दिन भोजन में क्या न बनाएं? (वर्जित खाद्य पदार्थों की लिस्ट)
गरुड़ पुराण और श्राद्ध मीमांसा जैसे धर्मग्रंथों में स्पष्ट उल्लेख है कि पितरों के निमित्त बनने वाले भोजन में कुछ विशेष सब्जियों, दालों और मसालों का प्रयोग पूरी तरह वर्जित होता है। श्राद्ध के दिन भूलकर भी इन चीजों को रसोई में न पकाएं:
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जमीन के नीचे उगने वाली सब्जियां (कंदमूल): श्राद्ध के भोजन में आलू, मूली, गाजर, अरबी (घुइयां), शलजम और चुकंदर जैसी जमीन के भीतर पैदा होने वाली सब्जियों का प्रयोग शास्त्रों में वर्जित माना गया है। खासकर मूली और गाजर पितरों के भोजन में कतई शामिल नहीं करनी चाहिए।
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तामसिक सामग्रियां (प्याज और लहसुन): प्याज, लहसुन, मशरूम और हींग का अत्यधिक तीखा छौंक श्राद्ध के भोजन में पूरी तरह प्रतिबंधित है। भोजन पूरी तरह सात्विक होना चाहिए।
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वर्जित दालें: पितरों के भोजन में मसूर की दाल, चना, चने का बेसन, उड़द (कुछ क्षेत्रों में छोड़कर), कुल्थी और सत्तू का प्रयोग नहीं किया जाता। मसूर की दाल को धार्मिक कर्मकांडों में तामसिक माना गया है, इसलिए श्राद्ध में इसका इस्तेमाल पाप माना जाता है।
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सब्जियों में बैंगन, परवल और लौकी की कुछ प्रजातियां: शास्त्रों में बैंगन (वाताक) को पितृ कर्म में अशुद्ध और पित्तकारक माना गया है। इसके अलावा पत्तागोभी, ब्रोकली, कुम्हड़ा (पेठा) के कुछ रूप या सड़े-गले फल-सब्जियां न बनाएं।
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सफेद और काला नमक का नियम: श्राद्ध के भोजन में सामान्य आयोडाइज्ड या समुद्री नमक की जगह केवल सेंधा नमक (Rock Salt) का ही प्रयोग किया जाना श्रेष्ठ माना गया है। तेज मिर्च, गरम मसाला और सरसों के तेल का जरूरत से ज्यादा छौंक लगाने से बचना चाहिए।
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भैंस का दूध और मांसाहार: श्राद्ध के दिन खीर या अन्य मिष्ठान बनाते समय भैंस, बकरी, ऊंटनी या भेड़ के दूध का उपयोग गलती से भी न करें। मांसाहार और मदिरा का तो श्राद्ध पक्ष में नाम लेना भी महापाप माना गया है।
श्राद्ध की थाली में क्या बनाना सबसे शुभ माना जाता है?
पितरों की तृप्ति के लिए बनाए जाने वाले भोजन में ऐसी सामग्रियां शामिल होनी चाहिए जो सात्विक, सुपाच्य और शास्त्रों द्वारा अनुमोदित हों। श्राद्ध के दिन यह भोजन बनाना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है:
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गाय के दूध और चावल की खीर: शास्त्रों के अनुसार पितरों को खीर अत्यंत प्रिय होती है। देशी गाय के शुद्ध दूध, चावल और मिश्री या देसी खांड से बनी खीर श्राद्ध की थाली का सबसे अनिवार्य हिस्सा है। माना जाता है कि खीर की सुगंध से ही पितर तृप्त हो जाते हैं।
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उड़द की दाल की कचौड़ी या पूड़ी: गेहूं के शुद्ध आटे में देशी घी का मोयन देकर बनी सात्विक पूड़ियां और कई परंपराओं में उड़द की दाल की सात्विक कचौड़ी (बिना लहसुन-प्याज के) बनाई जाती है।
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सब्जियों में ये हैं सबसे उत्तम विकल्प: तोरी (तोरई), लौकी (घिया), कद्दू (सीताफल), अरवी के पत्ते, कुंदरू और कच्चे केले की सात्विक सब्जी बनाई जानी चाहिए। इन सब्जियों को देशी घी या मूंगफली/तिल के तेल में सेंधा नमक और जीरे के साथ पकाना चाहिए।
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मूंग की दाल: यदि दाल बनानी हो तो छिलके वाली या धुली हुई मूंग की दाल सबसे सात्विक और उत्तम मानी जाती है।
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जौ, तिल और कुशा का महत्व: भोजन अर्पित करते समय और तर्पण में काले तिल (कृष्ण तिल) और जौ का प्रयोग अनिवार्य होता है। तिल पितरों को राक्षसी व नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षित रखते हैं।
पंचबलि भोग निकाले बिना अधूरा रहता है श्राद्ध का भोजन
श्राद्ध के दिन जब भोजन पूरी तरह बनकर तैयार हो जाए, तो परिजनों या ब्राह्मणों को भोजन कराने से पहले ‘पंचबलि’ यानी पांच भागों में भोजन निकालना अनिवार्य होता है:
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गोबलि: गाय के लिए भोजन का पहला पत्तल या हिस्सा निकाला जाता है।
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श्वानबलि: दूसरा हिस्सा कुत्ते के लिए रखा जाता है।
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काकबलि: तीसरा हिस्सा कौवे के लिए छत या खुली जगह पर रखा जाता है। मान्यता है कि कौवे के माध्यम से भोजन सीधे पितर तक पहुंचता है।
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देवादिबलि: चौथा हिस्सा अग्निदेव और देवताओं के निमित्त अंगीठी या कंडे के अंगारे पर गाय के घी और खीर की आहुति देकर समर्पित किया जाता है।
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पिपीलिकादिबलि: पांचवां हिस्सा चींटियों और कीट-पतंगों के लिए जमीन पर मीठे अन्न के रूप में डाला जाता है।
भोजन बनाने और परोसने के कड़े नियम
श्राद्ध का भोजन बनाते समय शुद्धता और मानसिक शांति का विशेष ध्यान रखें:
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लोहे या स्टील के बर्तन का निषेध: श्राद्ध का खाना बनाने और परोसने में लोहे, प्लास्टिक या स्टील के बर्तनों का इस्तेमाल करने से बचें। भोजन पकाने के लिए पीतल या मिट्टी के बर्तन और परोसने के लिए पलाश (ढाक) या केले के पत्तों का उपयोग सबसे उत्तम माना गया है।
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गुस्से या जूठे मुंह न पकाएं: भोजन बनाते समय मन में किसी के प्रति ईर्ष्या, क्रोध या अशांति नहीं होनी चाहिए। भोजन बनाते समय चखना (जूठा करना) सख्त मना है।
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दोपहर के कुतुप काल में ही कराएं भोजन: श्राद्ध का भोजन कराने का सबसे सही समय दोपहर 11:30 बजे से 12:30 बजे (कुतुप काल) के बीच होता है। सुबह-सुबह या सूर्यास्त के बाद श्राद्ध का भोजन कभी नहीं कराया जाता।
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