इंसानों की लापरवाही से बंदरों में फैला जानलेवा टीबी: रीसस मैकाक में मिला ‘ह्यूमन स्ट्रेन’, वैज्ञानिकों ने दी बड़े खतरे की चेतावनी

प्रकृति और वन्यजीवों के साथ इंसानी दखलअंदाजी का एक बेहद खौफनाक और चौंकाने वाला परिणाम सामने आया है। इंसानों की लापरवाही, जंगलों में प्लास्टिक व जूठा भोजन फेंकने और धार्मिक स्थलों व पर्यटन केंद्रों पर बंदरों को अनियंत्रित रूप से खिलाने की आदत ने वन्यजीवों को एक घातक बीमारी के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। वन्यजीव वैज्ञानिकों और पशु रोग विशेषज्ञों के हालिया शोध में यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में रहने वाले बंदरों (विशेषकर रीसस मैकाक) में इंसानों से फैलने वाला तपेदिक यानी ट्यूबरकुलोसिस (Human TB Strain) तेजी से फैल रहा है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह इंसानों से जानवरों में फैलने वाले संक्रमण यानी ‘रिवर्स जूनोसिस’ (Reverse Zoonosis) का एक बेहद गंभीर मामला है। यदि इस पर तुरंत नियंत्रण नहीं पाया गया, तो यह न केवल बंदरों की आबादी को खत्म कर सकता है, बल्कि म्यूटेट होकर इंसानों में वापस लौटकर और अधिक घातक रूप ले सकता है।

जूठा खाना, थूकना और नजदीकी संपर्क बना संक्रमण का मुख्य जरिया

शोधकर्ताओं के अनुसार, प्राकृतिक जंगलों में रहने वाले बंदरों में आमतौर पर टीबी का संक्रमण नहीं पाया जाता। यह संक्रमण केवल उन्हीं बंदरों में बड़े पैमाने पर देखा जा रहा है जो मंदिरों, पर्यटन स्थलों, राजमार्गों के ढाबों और मानवीय बस्तियों के इर्द-गिर्द रहते हैं।

इसके पीछे इंसानों की मुख्य लापरवाहियां सामने आई हैं:

  1. जूठा भोजन और आधा खाया फल फेंकना: लोग अक्सर सड़कों या पार्कों में आधा खाया सेब, केला, बिस्किट या अन्य खाद्य पदार्थ बंदरों की ओर फेंक देते हैं। यदि उस भोजन को छूने या चबाने वाला व्यक्ति टीबी से संक्रमित है, तो लार के जरिए बैक्टीरिया तुरंत भोजन में चला जाता है। जब बंदर उसे खाते हैं, तो वे आसानी से माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस (Mycobacterium tuberculosis) की चपेट में आ जाते हैं।

  2. सार्वजनिक स्थानों पर थूकना: इंसानों द्वारा खुले में थूकने की आदत भी इस बैक्टीरिया को हवा और जमीन में फैलाती है। जमीन पर गिरा भोजन उठाते समय बंदर इस बैक्टीरिया के संपर्क में आ जाते हैं।

  3. हाथ से सीधे खाना खिलाना: पर्यटन स्थलों पर लोग शौक या धार्मिक आस्था के चलते बंदरों को अपने हाथों से सीधे खाना खिलाते हैं। इस दौरान इंसानों की सांस, छींक या खांसी की सूक्ष्म बूंदों (ड्रॉपलेट्स) के जरिए यह श्वसन संक्रमण सीधे बंदरों के फेफड़ों तक पहुंच जाता है।

बंदरों में कैसे दिख रहे हैं टीबी के लक्षण?

पशु चिकित्सकों के अनुसार, बंदरों की शारीरिक और आनुवंशिक संरचना इंसानों से काफी मिलती-जुलती होती है, जिसके कारण वे टीबी बैक्टीरिया के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। बंदरों में इस बीमारी के लक्षण काफी भयावह हैं:

  • संक्रमित बंदरों का वजन तेजी से घटने लगता है और उनकी पसलियां दिखने लगती हैं।

  • उन्हें लगातार सूखी खांसी, सांस लेने में तकलीफ और अत्यधिक सुस्ती का सामना करना पड़ता है।

  • शरीर के बाल झड़ने लगते हैं और त्वचा पर संक्रमण दिखने लगता है।

  • झुंड में रहने की उनकी सामाजिक प्रवृत्ति के कारण एक बीमार बंदर अपनी छींक और खांसी से पूरे कुनबे को कुछ ही हफ्तों में संक्रमित कर देता है।

‘रिवर्स जूनोसिस’ का सबसे बड़ा खतरा: म्यूटेशन का डर

स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह चक्र केवल बंदरों तक सीमित नहीं रहेगा। वैज्ञानिक इसे ‘स्पिलओवर’ और ‘स्पिलबैक’ प्रक्रिया कहते हैं।

  • जब इंसानी टीबी का बैक्टीरिया किसी जानवर के शरीर में जाता है, तो वह वहां के वातावरण के अनुसार खुद को म्यूटेट (जीन में बदलाव) कर सकता है।

  • यदि यह म्यूटेटेड बैक्टीरिया बंदरों के काटने, खरोंचने या उनकी विष्ठा (मल-मूत्र) के जरिए वापस इंसानों में फैला, तो वर्तमान टीबी रोधी दवाएं (Antibiotics) उस पर बेअसर साबित हो सकती हैं।

  • इससे ‘मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट टीबी’ (MDR-TB) का एक नया और लाइलाज प्रकार समाज में फैलने की आशंका बढ़ जाएगी।

विशेषज्ञों की सख्त सलाह: बंद हो इंसानी भोजन देना

इस गंभीर खतरे को देखते हुए पर्यावरणविदों और वन विभाग ने आम जनता के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी करने की वकालत की है:

  • बंदरों को कुछ भी खिलाने पर पूर्ण रोक: मंदिरों, हाईवे और जंगलों के आसपास बंदरों को फल, चना, ब्रेड या कोई भी इंसानी भोजन देने पर कानूनी प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।

  • कचरा प्रबंधन: पर्यटन स्थलों पर खाद्य अपशिष्ट को खुले में न फेंककर बंदरों से सुरक्षित (Monkey-proof) ढक्कन वाले डस्टबिन में ही डाला जाए।

  • संक्रमित बंदरों का क्वारंटीन: वन विभाग को आबादी वाले इलाकों के बंदरों के रैंडम सीरोलॉजिकल सैंपल लेने चाहिए और संक्रमित पाए जाने वाले बंदरों को रेस्क्यू कर अलग उपचार केंद्रों में रखना चाहिए।

अगर इंसानों ने अपनी इस लापरवाही पर समय रहते रोक नहीं लगाई, तो वन्यजीवों के साथ-साथ यह इंसानी आबादी के लिए भी एक नए स्वास्थ्य संकट का कारण बन सकता है।

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