
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे विनाशकारी सैन्य संघर्ष को शुरू हुए चार साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका है, लेकिन वैश्विक महाशक्तियां इस युद्ध को रोकने में पूरी तरह लाचार साबित हुई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जिन्होंने 24 घंटे में जंग खत्म कराने के बड़े-बड़े दावे किए थे, उनकी आक्रामक बयानबाजी और शर्तें भी मॉस्को और कीव के बीच शांति की कोई राह नहीं निकाल सकीं। अमेरिका, तुर्की और मिस्र की ओर से पेश किए गए कई पिछले प्रस्ताव जब खारिज हो गए, तब पूरी दुनिया की निगाहें भारत पर टिक गईं। नई दिल्ली ने अब इस जटिल अंतरराष्ट्रीय संकट को सुलझाने के लिए सीधे तौर पर कूटनीतिक जिम्मा संभाल लिया है और दोनों पक्षों के सामने एक व्यावहारिक शांति प्रस्ताव रखा है।
भारत की इस कूटनीतिक पहल को मॉस्को और कीव दोनों तरफ से बेहद गंभीरता से लिया जा रहा है। रूसी नेतृत्व ने भारत के शांति प्रयासों का स्वागत करते हुए कहा है कि वे अपने भारतीय मित्रों की तत्परता और रचनात्मक सुझावों के प्रति आभारी हैं। वहीं यूक्रेन ने भी संकेत दिया है कि वह बुनियादी ढांचे और समुद्री व्यापार से जुड़े चरणबद्ध युद्धविराम पर विचार करने के लिए तैयार है, बशर्ते शर्तों को निष्पक्षता के साथ लागू किया जाए। वैश्विक विश्लेषक मान रहे हैं कि जो काम पश्चिमी देश हथियारों और प्रतिबंधों के दम पर नहीं कर पाए, उसे भारत की संतुलित कूटनीति मुमकिन बना सकती है।
क्या है भारत का 3-सूत्रीय शांति प्रस्ताव? सीधे जमीन से जुड़े हैं समाधान
भारत ने किसी काल्पनिक या एकतरफा राजनीतिक समाधान के बजाय उन तीन सबसे संवेदनशील और व्यावहारिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया है, जो दोनों देशों और वैश्विक अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहे हैं:
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ऊर्जा और बुनियादी ढांचे पर हमलों पर तुरंत रोक: भारत के प्रस्ताव का पहला बिंदु यह है कि रूस और यूक्रेन दोनों एक-दूसरे के बिजली संयंत्रों (पावर ग्रिड), तेल रिफाइनरियों, गैस पाइपलाइनों और महत्वपूर्ण नागरिक बुनियादी ढांचों पर हवाई व मिसाइल हमले तुरंत बंद करें। इससे आने वाली सर्दियों में आम नागरिकों को मानवीय त्रासदी से बचाया जा सकेगा।
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ब्लैक सी (काला सागर) से निर्बाध व्यापार की बहाली: प्रस्ताव में जोर दिया गया है कि काला सागर के प्रमुख बंदरगाहों से अनाज, उर्वरक और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षित आवाजाही को सुनिश्चित किया जाए। इससे ग्लोबल साउथ और गरीब देशों में गहराते खाद्य संकट को टाला जा सकेगा।
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कमर्शियल शिपिंग की पूर्ण सुरक्षा: तीसरे महत्वपूर्ण बिंदु के तहत काला सागर और अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में आवाजाही करने वाले सभी वाणिज्यिक जहाजों (Commercial Vessels) पर गोलाबारी, ड्रोन हमलों और समुद्री बारूदी सुरंगों के खतरों को तत्काल प्रभाव से समाप्त करने की बात कही गई है।
दोनों पक्षों का भरोसा: क्यों केवल भारत ही बन सकता है सफल मध्यस्थ?
इस पूरे संकट में भारत की भूमिका इसलिए सबसे अलग और मजबूत है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की दोनों के साथ सीधा संवाद और गहरा विश्वास बनाए हुए है। जहां पश्चिमी देशों ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाकर बातचीत के सभी दरवाजे बंद कर दिए, वहीं भारत ने रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) बनाए रखी। भारत ने स्पष्ट किया कि “यह युग युद्ध का नहीं है” और किसी भी संघर्ष का समाधान केवल संवाद और कूटनीति के जरिए ही संभव है।
मास्को और कीव दोनों की यात्राएं कर चुके भारतीय कूटनीतिक तंत्र ने पर्दे के पीछे कई महीनों तक मेहनत करके इस मसौदे को तैयार किया है। भारतीय विदेश नीति ने साबित कर दिया है कि वह केवल एक मूकदर्शक नहीं, बल्कि एक सक्रिय शांतिदूत (Peace Builder) के रूप में दुनिया के सबसे जटिल युद्ध को खत्म कराने की क्षमता रखती है।
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