
नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर देश की राजधानी दिल्ली से लेकर राज्यों की राजधानियों तक सियासी पारा चढ़ा हुआ है। विपक्षी दलों द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित गड़बड़ियों को लेकर लगातार विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। संसद से लेकर सड़कों तक जारी इस भारी गतिरोध के बीच अब भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी की भी अहम प्रतिक्रिया सामने आई है। लोकतंत्र, संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और चुनावी निष्पक्षता को लेकर उनके इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है।
निष्पक्ष चुनाव और पारदर्शी नौकरशाही ही लोकतंत्र की नींव: डॉ. जोशी
पद्म विभूषण से सम्मानित भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने चुनावी प्रक्रिया और प्रशासनिक व्यवस्था पर खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने लोकतंत्र के मूल सिद्धांत को याद दिलाते हुए अब्राहम लिंकन के ऐतिहासिक विचार का उल्लेख किया और कहा कि जनता की, जनता द्वारा और जनता के लिए चुनी गई सरकारें तभी सुरक्षित रह सकती हैं, जब चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष हों और देश की नौकरशाही पारदर्शी ढंग से काम करे। डॉ. जोशी ने स्पष्ट कहा कि लोकतंत्र के काम करने का आधार यही है कि संस्थाएं जनता के भरोसे पर खरी उतरें और किसी भी स्तर पर संदेह की गुंजाइश न रहे।
लोकतांत्रिक ढांचे में चुनावी शुचिता सबसे अहम पहलू है। जब देश की जनता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करती है, तो उसे यह पूरा भरोसा होना चाहिए कि उसका हर एक वोट सुरक्षित और निष्पक्ष तरीके से गिना जा रहा है। प्रशासनिक अधिकारियों और चुनाव आयोग की जिम्मेदारी बनती है कि वे किसी भी पक्षपात से परे हटकर सिर्फ और सिर्फ कानून और संविधान के प्रति जवाबदेह रहें।
संविधान के उल्लंघन पर सुप्रीम कोर्ट करे जांच: वरिष्ठ भाजपा नेता की दो टूक
ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की विपक्षी मांग और मौजूदा गतिरोध पर बात करते हुए डॉ. जोशी ने संवैधानिक मर्यादा का पाठ पढ़ाया। उन्होंने कहा कि पूरी राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था को संविधान के दायरे में ही संचालित होना चाहिए। अगर कहीं भी ऐसा लगता है कि नियमों की अनदेखी हुई है या संविधान का उल्लंघन हुआ है, तो देश की शीर्ष अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट को उसकी निष्पक्ष जांच करनी चाहिए।
वरिष्ठ नेता का मानना है कि विपक्ष लोकतंत्र का एक जिम्मेदार और जवाबदेह स्तंभ है। यदि विपक्ष किसी प्रक्रिया या संस्था पर सवाल खड़े कर रहा है, तो उन सवालों का समाधान पारदर्शी व्यवस्था के तहत होना चाहिए, न कि टकराव के जरिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि विपक्ष के पास भी केवल विरोध तक सीमित रहने के बजाय एक स्पष्ट और रचनात्मक वैकल्पिक कार्यक्रम होना जरूरी है, ताकि नीतिगत मुद्दों पर स्वस्थ संवाद स्थापित हो सके।
दिल्ली में SIR और CEC के खिलाफ विपक्ष का उग्र प्रदर्शन
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इंडिया (INDIA) गठबंधन के दल लगातार लामबंद हैं। विपक्षी दलों का सीधा आरोप है कि चुनाव आयोग द्वारा चलाए गए मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के दौरान व्यापक स्तर पर विसंगतियां हुई हैं, जिससे कई वैध मतदाताओं के नाम प्रभावित हुए हैं। इसी मांग को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा सहित विपक्षी सांसदों ने दिल्ली की सड़कों पर उतरकर चुनाव आयोग कार्यालय तक मार्च निकालने की कोशिश की।
प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए दिल्ली पुलिस ने कई शीर्ष नेताओं को हिरासत में भी लिया। विपक्षी नेताओं का कहना है कि वे आयोग की कार्यप्रणाली और चुनावी पारदर्शिता के मुद्दे पर समझौता नहीं करेंगे और जब तक निष्पक्ष जांच और उचित कदम नहीं उठाए जाते, तब तक उनका यह आंदोलन संसद से लेकर सड़क तक जारी रहेगा। दिल्ली के अलावा बिहार, मध्य प्रदेश और पूर्वोत्तर के राज्यों में भी इस मुद्दे पर विरोध मार्च निकाले जा रहे हैं।
छात्र आंदोलन और पुलिस कार्रवाई पर भी दी कड़ी नसीहत
चुनावी विवाद के साथ-साथ हाल के दिनों में छात्रों और युवाओं पर हुए लाठीचार्ज की घटनाओं पर भी डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने संवेदनशील रुख अपनाने की सलाह दी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि लाठीचार्ज किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। छात्र देश का भविष्य हैं और वे हमारे अपने बच्चे हैं। अगर उनकी कोई जायज मांग या पीड़ा है, तो शासन-प्रशासन को पूरी सहानुभूति और धैर्य के साथ उनकी बात सुननी चाहिए।
डॉ. जोशी ने एक घरेलू उदाहरण देते हुए समझाया कि जैसे कोई बच्चा जब अपने पिता से किसी वादे के पूरा न होने की शिकायत करता है, तो पिता उसे डांटकर भगा नहीं देता, बल्कि समझाता है कि देरी क्यों हुई और उसे जल्द पूरा करने का भरोसा दिलाता है। उसी तरह सरकारों और प्रशासन का व्यवहार भी नौजवानों के प्रति एक संरक्षक जैसा होना चाहिए। बल प्रयोग से केवल असंतोष बढ़ता है, जबकि बातचीत और संवाद से बड़े से बड़े संकट का समाधान निकाला जा सकता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) पर डॉ. जोशी का संतुलित दृष्टिकोण
पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री रहे डॉ. जोशी से जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP) के प्रभाव पर राय मांगी गई, तो उन्होंने कहा कि किसी भी दूरगामी नीति का इतनी जल्दी अंतिम मूल्यांकन करना जल्दबाजी होगी। NEP अभी कार्यान्वयन के दौर से गुजर रही है और पूरे देश के शैक्षणिक तंत्र में इसे व्यवस्थित रूप से लागू करने में वक्त लगेगा। यह केवल एक शुरुआत है, और इसके वास्तविक नतीजे आने वाले वर्षों में ही स्पष्ट रूप से सामने आएंगे।
मुरली मनोहर जोशी के इस पूरे बयान को विश्लेषक बेहद नपे-तुले और संवैधानिक दृष्टिकोण के रूप में देख रहे हैं। एक ओर जहां सत्तारूढ़ दल और विपक्ष के बीच तीखे आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है, वहीं भाजपा के एक वरिष्ठ मार्गदर्शक द्वारा संस्थागत पारदर्शिता, निष्पक्ष चुनाव और सुप्रीम कोर्ट की सर्वोच्चता को रेखांकित किया जाना राष्ट्रीय राजनीति में दूरगामी संदेश देता है।
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