
नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन से पहले प्रशासनिक पाबंदियों और सुरक्षा बलों की तैनाती को लेकर सियासी सरगर्मी चरम पर पहुंच गई है। नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों और आयोजकों ने सीधे तौर पर पुलिस प्रशासन पर लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलने का आरोप लगाया है। सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) समेत कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का दावा है कि शहर में कानून व्यवस्था के नाम पर अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति बना दी गई है।
दिल्ली की सीमाओं पर कड़ी नाकेबंदी, 10,000 लोगों को डिटेन करने का दावा
प्रोटेस्ट के आयोजकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से कड़ा बयान सामने आया है। एक्टिविस्ट रांका और अन्य समन्वयकों ने सनसनीखेज दावा करते हुए कहा कि प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से पहले ही दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं, रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों से करीब 10,000 से अधिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों को हिरासत में लिया गया है।
कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जंतर-मंतर की ओर आने वाले सभी प्रमुख मार्गों पर बैरिकेडिंग कर दी गई है और लोगों को बिना किसी ठोस कानूनी आधार के डिटेंशन सेंटरों और थानों में भेजा जा रहा है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे संविधान के दायरे में रहकर शांतिपूर्ण मार्च निकालना चाहते थे, लेकिन प्रशासन ने पूरी राजधानी को छावनी में बदल दिया है।
‘देश में इमरजेंसी लग चुकी है’: CJP का प्रशासन पर तीखा हमला
सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) के प्रतिनिधियों ने प्रशासन के इस कड़े रवैये पर सख्त नाराजगी जताते हुए कहा कि आज की स्थिति देखकर ऐसा लगता है मानो देश में आपातकाल लागू हो चुका है। उनका कहना है कि जब नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने, एकत्रित होने और असहमति जताने के मौलिक अधिकार से ही वंचित कर दिया जाए, तो यह सीधे तौर पर संवैधानिक मर्यादाओं का हनन है।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का तर्क है कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण प्रदर्शन की स्वतंत्रता देता है। लेकिन जिस तरह से बड़े पैमाने पर लोगों की धरपकड़ की गई है, वह प्रशासनिक मनमानी का जीता-जागता उदाहरण है। उन्होंने मांग की कि हिरासत में लिए गए सभी नागरिकों को तुरंत रिहा किया जाए और लोकतांत्रिक संवाद के रास्ते खोले जाएं।
सुरक्षा व्यवस्था पर दिल्ली पुलिस का सख्त रुख
दूसरी तरफ, कानून-व्यवस्था बनाए रखने को लेकर दिल्ली पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का रुख पूरी तरह स्पष्ट है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, राष्ट्रीय राजधानी के संवेदनशील इलाकों में बिना वैध अनुमति के बड़े जमावड़े की इजाजत नहीं दी जा सकती। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि किसी भी प्रकार की अव्यवस्था, यातायात जाम और सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान को रोकने के लिए एहतियातन कदम उठाए गए हैं।
पुलिस ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षा घेरा केवल शांति व्यवस्था बनाए रखने और आम जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लगाया गया है। कानून हाथ में लेने वाले किसी भी व्यक्ति या समूह के खिलाफ नियमानुसार कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
मानवाधिकार बनाम प्रशासनिक सुरक्षा: बड़ा राष्ट्रीय विमर्श
जंतर-मंतर के इस हालिया घटनाक्रम ने एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर असहमति के अधिकार और प्रशासनिक नियंत्रण के बीच संतुलन पर बहस छेड़ दी है। विपक्षी दलों और नागरिक अधिकार समूहों का मानना है कि असंतोष की आवाज दबाना लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए घातक है, जबकि प्रशासन का तर्क है कि राजधानी में सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन अनिवार्य है। आने वाले दिनों में यह टकराव कानूनी और राजनीतिक रूप से और गहराने के आसार हैं।
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