11 अक्टूबर को घटस्थापना के 2 सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त, जानें प्रात:काल और अभिजित का शुभ समय

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से जगतजननी मां जगदंबा की उपासना का महापर्व यानी शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ हो रहा है। नौ दिनों तक चलने वाले इस पावन अनुष्ठान में मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों—मां शैलपुत्री से लेकर मां सिद्धिदात्री तक—की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना (घटस्थापना) का विधान सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। शास्त्रों में कलश को भगवान गणेश, त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) और समस्त 33 कोटि देवी-देवताओं का प्रतीक रूप माना गया है। इसलिए सही नक्षत्र, शुभ लग्न और उचित चौघड़िया मुहूर्त में स्थापित किया गया कलश ही पूरे नौ दिनों तक घर में सकारात्मक ऊर्जा, सुख, शांति और समृद्धि का संचार करता है। पंचांगीय गणनाओं के अनुसार, इस वर्ष 11 अक्टूबर को घटस्थापना के लिए प्रात:काल और दोपहर में अत्यंत कल्याणकारी मुहूर्त बन रहे हैं।

11 अक्टूबर को घटस्थापना के 2 सबसे शुभ मुहूर्त: प्रात:काल और अभिजित काल

धार्मिक मान्यताओं और वैदिक पंचांग के अनुसार, प्रतिपदा तिथि के पहले एक-तिहाई भाग में या द्विस्वभाव लग्न (कन्या लग्न) में घटस्थापना करना सर्वश्रेष्ठ फलदायी माना जाता है। यदि कोई भक्त किसी कारणवश प्रात:काल में पूजन संपन्न न कर पाए, तो दोपहर में आने वाला ‘अभिजित मुहूर्त’ हर प्रकार के दोष को दूर करने वाला और अबूझ माना गया है।

  • प्रात:काल घटस्थापना मुहूर्त: 11 अक्टूबर की सुबह सूर्योदय के बाद प्रातः 06:18 बजे से लेकर सुबह 10:14 बजे तक कलश स्थापना का पहला और अत्यंत पावन समय रहेगा। इस दौरान द्विस्वभाव लग्न और शुभ चौघड़िया का मेल होने से पूजा का संकल्प लेना अति उत्तम रहेगा।

  • अभिजित मुहूर्त (सर्वश्रेष्ठ समय): शास्त्रों के अनुसार अभिजित मुहूर्त को भगवान श्रीहरि विष्णु का परम प्रिय काल माना जाता है, जिसमें किसी भी प्रकार के ग्रह-दोष का प्रभाव नहीं रहता। यह मुहूर्त दोपहर 11:44 बजे से लेकर दोपहर 12:31 बजे तक रहेगा। जो लोग सुबह जल्दी पूजा नहीं कर पाते, वे इस 47 मिनट की अवधि में निश्चिंत होकर कलश स्थापित कर सकते हैं।

  • चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग का विचार: घटस्थापना करते समय चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग के समय का त्याग करना श्रेयस्कर माना जाता है। पंचांग के अनुसार प्रात:काल का उपयुक्त समय इन दोषों से मुक्त होकर पूजा संपन्न करने के लिए श्रेष्ठ है।

कलश स्थापना की सही और सरल पूजा विधि

घटस्थापना के लिए शुद्ध मिट्टी, तांबे या पीतल का कलश सबसे उत्तम माना जाता है; लोहे या स्टील के बर्तनों का प्रयोग पूजा में वर्जित है।

सबसे पहले पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें और पूर्व या उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) दिशा में लकड़ी की एक साफ चौकी बिछाकर उस पर लाल वस्त्र बिछाएं। एक मिट्टी के चौड़े पात्र में साफ बालू या मिट्टी भरकर उसमें ‘सप्तधान्य’ (जौ) बो दें। इसके बाद कलश में शुद्ध जल, थोड़ा गंगाजल, सुपारी, सिक्का, दूर्वा, अक्षत और हल्दी की गांठ डालें। कलश के कंठ पर कलावा (मौली) बांधें और उस पर स्वास्तिक का शुभ चिह्न बनाएं। कलश के मुख पर 5 या 7 आम अथवा अशोक के पत्ते रखें और उसके ऊपर लाल चुनरी में लिपटा हुआ जटा वाला नारियल (श्रीफल) स्थापित करें। ध्यान रखें कि नारियल का मुख हमेशा पूजा करने वाले साधक की तरफ होना चाहिए।

अखंड ज्योति और संकल्प के जरूरी नियम

कलश स्थापना के साथ ही कई भक्त पूरे नौ दिनों के लिए अखंड ज्योति प्रज्वलित करते हैं। अखंड दीप को देवी मां की चौकी के आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व) में रखना चाहिए।

ज्योति प्रज्वलित करने से पहले गाय के शुद्ध घी या तिल के तेल का प्रयोग करें और रक्षा सूत्र की बाती बनाएं। दीप प्रज्वलित करते समय ‘शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यम् धनसंपदा’ मंत्र का उच्चारण करें। हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर मां दुर्गा के समक्ष नौ दिनों के व्रत अथवा दैनिक पूजन का संकल्प लें और प्रथम दिन मां शैलपुत्री की स्तुति, दुर्गा सप्तशती का पाठ अथवा ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे’ मंत्र का जप अवश्य करें। पूरे विधि-विधान और शुद्ध भाव से की गई यह साधना जीवन की सभी बाधाओं को दूर कर मां भगवती का वरदान दिलाती है।

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