
नई दिल्ली के भारत मंडपम में 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के भव्य आयोजन और उसमें दुनिया भर के ताकतवर नेताओं के ऐतिहासिक जमावड़े के बाद बांग्लादेश के कूटनीतिक हलकों में खलबली मच गई है। बिम्सटेक (BIMSTEC) का अध्यक्ष होने के बावजूद भारत के आमंत्रण पर शिखर सम्मेलन में न पहुंचकर बांग्लादेश के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने जो कड़ा रुख दिखाने की कोशिश की थी, वह अब ढाका के लिए भारी पड़ता दिख रहा है। वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती धमक, पुतिन और शी जिनपिंग जैसे दिग्गजों की दिल्ली में मौजूदगी और क्षेत्रीय स्तर पर बांग्लादेश के अलग-थलग पड़ने के बाद तारिक रहमान सरकार के सुर अचानक 180 डिग्री बदल गए हैं। ब्रिक्स खत्म होते ही बांग्लादेश सरकार के शीर्ष मंत्रियों ने भारत के साथ संबंधों को फिर से पटरी पर लाने और नए सिरे से द्विपक्षीय वार्ता शुरू करने की जोरदार वकालत शुरू कर दी है।
ब्रिक्स सम्मेलन का बहिष्कार या प्रोटोकॉल का बहाना?
नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन से पहले बांग्लादेश ने यह कहकर प्रधानमंत्री तारिक रहमान की यात्रा से इनकार कर दिया था कि उन्हें बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के तौर पर नहीं, बल्कि केवल बिम्सटेक (BIMSTEC) के चेयरमैन के तौर पर बुलाया गया है।
ढाका ने तर्क दिया था कि वे किसी बहुपक्षीय (Multilateral) मंच के बजाय भारत के साथ सीधे द्विपक्षीय (Bilateral) दौरे को प्राथमिकता देना चाहते हैं। इतना ही नहीं, बांग्लादेश की सत्तारूढ़ बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के मुख्य सचेतक नुरुल इस्लाम मोनी ने भारत के साथ पूर्ववर्ती शेख हसीना सरकार के समय हुए 101 समझौतों (MoUs) और चट्टोग्राम-मोंगला पोर्ट डील्स की समीक्षा करने तक की धमकी दे डाली थी। लेकिन भारत ने इस दबाव की परवाह किए बिना वैश्विक नेताओं के साथ सम्मेलन को अभूतपूर्व सफलता दिलाई, जिससे ढाका की कूटनीतिक चाल उल्टी पड़ गई।
ब्रिक्स खत्म होते ही ढाका को क्यों हुई ‘उपरती’?
वैश्विक कूटनीति के जानकारों के अनुसार, ब्रिक्स सम्मेलन के बाद बांग्लादेश को अपनी रणनीतिक गलती का एहसास हुआ है:
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अंतरराष्ट्रीय मंच गंवाने का मलाल: ब्रिक्स जैसे विशाल आर्थिक और भू-राजनीतिक मंच पर अपनी अनुपस्थिति से बांग्लादेश ने रूस, चीन, ब्राजील और खाड़ी देशों के शीर्ष नेतृत्व से एक साथ मिलने और निवेश जुटाने का सुनहरा अवसर गंवा दिया।
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भूगोल और जमीनी हकीकत: बांग्लादेश तीन तरफ से भारत से घिरा हुआ है। भोजन, जरूरी दवाइयां, बिजली आपूर्ति, मेडिकल टूरिज्म और सीमाई व्यापार के लिए बांग्लादेश पूरी तरह भारत पर निर्भर है। भारत को दरकिनार करके ढाका अपनी अर्थव्यवस्था को नहीं संभाल सकता।
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गंगा जल समझौते की समयसीमा: वर्ष 1996 में हुआ ऐतिहासिक 30 वर्षीय गंगा जल समझौता (Ganga Water Sharing Treaty) इसी वर्ष दिसंबर में समाप्त हो रहा है। यदि भारत से संबंध तल्ख रहे, तो आगामी सूखे के मौसम में बांग्लादेश को जल संकट का सामना करना पड़ सकता है।
विदेश राज्य मंत्री हुमायूं कबीर का बदला हुआ बयान
ब्रिक्स सम्मेलन समाप्त होते ही बांग्लादेश के विदेश राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने भारतीय मीडिया और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने सुलह का रुख अपनाया है।
हुमायूं कबीर ने स्पष्ट किया कि बांग्लादेश भारत के साथ अपने संबंधों को शून्य से दोबारा शुरू करने (Fresh Bilateral Reset) का इच्छुक है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के रिश्ते किसी एक राजनीतिक दल या एकतरफा निर्भरता पर आधारित नहीं होने चाहिए, बल्कि यह ‘पारस्परिक सम्मान और साझा हितों’ की ठोस जमीन पर टिके होने चाहिए। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि दोनों देशों के बीच व्यापार और कूटनीतिक चैनलों पर सकारात्मक बातचीत जारी है और तारिक रहमान जल्द ही भारत की पूर्ण द्विपक्षीय यात्रा के लिए तैयार हैं।
शेख हसीना फैक्टर और भारत का दृढ़ रुख
दरअसल, तारिक रहमान सरकार की मुख्य नाराजगी भारत में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की मौजूदगी और वहां से दिए जा रहे उनके बयानों को लेकर थी। ढाका चाहता था कि भारत पहले शेख हसीना के प्रत्यर्पण या उनके बयानों पर रोक लगाने का भरोसा दे, तभी पीएम रहमान भारत आएंगे।
लेकिन नई दिल्ली ने स्पष्ट कर दिया कि भारत किसी तीसरे पक्ष के दबाव या पूर्व शर्तों (Pre-conditions) के आगे नहीं झुकता। भारत ने व्यावहारिक विदेश नीति अपनाते हुए साफ संदेश दिया कि वह ढाका की चुनी हुई सरकार के साथ काम करने को तैयार है, लेकिन ताली दोनों हाथों से बजती है। भारत के इस कड़े और अडिग रुख ने बांग्लादेश के रणनीतिकारों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि भारत से दूरी बनाकर बांग्लादेश का ही दीर्घकालिक नुकसान होगा।
आर्थिक और रणनीतिक संतुलन की मजबूरी
बांग्लादेश इस समय मुद्रास्फीति, गिरते विदेशी मुद्रा भंडार और निर्यात की चुनौतियों से जूझ रहा है। चीन और अमेरिका के बीच संतुलन साधना तारिक रहमान सरकार के लिए आसान नहीं रहा है। ऐसे नाजुक दौर में अपने सबसे बड़े और प्रभावशाली पड़ोसी भारत से दुश्मनी मोल लेना बांग्लादेश के आर्थिक हितों के खिलाफ है। यही कारण है कि ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल न होने की अकड़ अब पछतावे में बदलती दिख रही है और तारिक रहमान का प्रशासन अब नई दिल्ली के साथ कूटनीतिक बर्फ पिघलाने के लिए हाथ-पैर मार रहा है।
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