
नई दिल्ली: शक्ति की उपासना का महापर्व चैत्र (वासंतिक) नवरात्रि इस वर्ष 19 मार्च 2026, गुरुवार से शुरू होने जा रहा है। इसी दिन से हिंदू नव वर्ष यानी नवसंवत्सर 2083 ‘रौद्र’ का भी शुभारंभ होगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस बार माता का आगमन और प्रस्थान दोनों ही विशेष संकेत दे रहे हैं।
उत्थान ज्योतिष एवं आध्यत्म संस्थान के निदेशक ज्योतिर्विद डॉ. पं. दिवाकर त्रिपाठी पूर्वांचली के अनुसार, इस वर्ष प्रतिपदा तिथि का क्षय होने के बावजूद नवरात्रि पूरे नौ दिनों की होगी, जिसमें मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधिवत पूजा की जाएगी।
पालकी पर आगमन और हाथी पर विदाई: क्या है इसका अर्थ?
नवरात्रि में माता की सवारी का विशेष महत्व होता है। इस बार माता का पृथ्वी पर आगमन और गमन दोनों अलग-अलग संदेश दे रहे हैं:
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आगमन (पालकी/डोला): नवरात्रि की शुरुआत गुरुवार को हो रही है, इसलिए मां दुर्गा पालकी पर सवार होकर आएंगी। ज्योतिष शास्त्र में इसे शुभ नहीं माना जाता है। यह राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव, अशांति, रोग और कष्टों में वृद्धि का संकेत देता है।
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प्रस्थान (हाथी/गज): नवरात्रि का समापन शुक्रवार को हो रहा है, जिससे माता की विदाई हाथी पर होगी। ‘गज’ की सवारी सुख-समृद्धि, अच्छी बारिश और कष्टों के अंत का प्रतीक मानी जाती है। यानी माता जाते-जाते भक्तों के दुखों को हर लेंगी।
कलश स्थापना (घटस्थापना) के शुभ मुहूर्त
यद्यपि 19 मार्च को सूर्योदय से रात तक कलश स्थापना की जा सकती है, लेकिन श्रेष्ठ फल की प्राप्ति के लिए निम्न शुभ चौघड़िया मुहूर्त विशेष हैं:
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प्रातः काल: सुबह 06:48 बजे से 07:30 बजे तक।
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दोपहर (सबसे श्रेष्ठ): सुबह 10:30 बजे से दोपहर 03:00 बजे तक।
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अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:38 बजे से 12:26 बजे तक (यह सबसे उत्तम समय है)।
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सायं काल: शाम 04:30 बजे से 06:00 बजे तक।
नवरात्रि 2026 के अद्भुत संयोग
इस बार नवरात्रि के पहले दिन कई शुभ और महत्वपूर्ण संयोग बन रहे हैं:
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पंचक की शुभता: चंद्रमा पूरे दिन-रात मीन राशि में रहेगा। पंचक लगा होने के बावजूद, आध्यात्मिक और शुभ कार्यों के लिए इसे फलदायी माना गया है।
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शुक्ल योग: रात 01:57 बजे तक शुक्ल योग रहेगा, जो कार्यों में सफलता और शुभता प्रदान करता है।
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नक्षत्र: उत्तराभाद्रपद नक्षत्र रात 04:40 बजे तक रहेगा, जिसके बाद रेवती नक्षत्र शुरू होगा।
रौद्र नव संवत्सर 2083: गुरु होंगे राजा
हिंदू नव वर्ष 2083 ‘रौद्र’ के नाम से जाना जाएगा। इस संवत्सर के राजा देवगुरु बृहस्पति होंगे और मंत्री का पद मंगल संभालेंगे। राजा गुरु होने के कारण ज्ञान और धर्म की वृद्धि होगी, जबकि मंत्री मंगल होने से प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था में कड़े फैसले देखने को मिल सकते हैं।
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