हिंदू धर्म में आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को ‘देवशयनी एकादशी’ (Devshayani Ekadashi) के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र दिन से भगवान श्रीहरि विष्णु चार महीनों के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं और इसी के साथ चातुर्मास का आरंभ हो जाता है।
पद्मपुराण के अनुसार, देवशयनी एकादशी पर व्रत रखने और भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा करने से पापों का नाश होता है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। इस साल एकादशी तिथि को लेकर भक्तों के बीच थोड़ा भ्रम है, आइए जानते हैं व्रत की सही तिथि, पारण का समय और पूजन के 5 मुख्य नियम।
कब है देवशयनी एकादशी व्रत 2026? (सही तारीख)
पंचांग के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल एकादशी तिथि की शुरुआत 24 जुलाई 2026 को सुबह 05:42 बजे होगी और इसका समापन 25 जुलाई 2026 को सुबह 08:04 बजे होगा। शास्त्रों में उदया तिथि की मान्यता होने के कारण देवशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई 2026, शनिवार को ही रखा जाएगा। इसी दिन से चातुर्मास भी शुरू होगा।
व्रत पारण का सही समय और मुहूर्त
एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि में करना अनिवार्य और अत्यंत शुभ माना जाता है।
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पारण की तारीख: 26 जुलाई 2026, रविवार
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शुभ पारण समय: सुबह 06:16 बजे से सुबह 09:20 बजे तक
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द्वादशी तिथि समाप्त: सुबह 10:27 बजे
देवशयनी एकादशी व्रत के 5 महत्वपूर्ण नियम
1. संकल्प और स्नान
व्रती को एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान ध्यान करना चाहिए। इसके बाद साफ कपड़े पहनकर हाथ में जल और चावल लेकर भगवान विष्णु के सामने पूरे भक्ति भाव से व्रत का संकल्प लेना चाहिए।
2. पीले वस्त्र और तुलसी दल अर्पण
भगवान विष्णु की पूजा में पीले रंग का विशेष महत्व है। पूजा के दौरान श्रीहरि को पीले फूल, चंदन, हल्दी, पंचामृत और तुलसी पत्र जरूर चढ़ाएं। ध्यान रहे कि बिना तुलसी दल के भगवान विष्णु भोग स्वीकार नहीं करते हैं।
3. खान-पान और सात्विकता
एकादशी का व्रत निर्जला या फलाहार रहकर किया जा सकता है। इस दिन चावल और लहसुन-प्याज़ जैसी तामसिक चीजों का सेवन पूरी तरह वर्जित है। यह व्रत केवल फलाहार तक सीमित नहीं है, बल्कि मन और इंद्रियों के संयम का प्रतीक भी है।
4. दान-पुण्य का महत्व
एकादशी के पावन अवसर पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों या ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र, जल, तिल या धन का दान अवश्य करें। इस दिन किया गया दान कई गुना पुण्य फल प्रदान करता है।
5. वाणी और आचरण पर नियंत्रण
व्रत के दौरान किसी की निंदा न करें और न ही किसी को अपशब्द कहें। क्रोध और अहंकार से दूर रहकर पूरा दिन भगवान विष्णु के मंत्रों (‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’) और विष्णु सहस्रनाम के पाठ में व्यतीत करें।
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