विवाह के झूठे वादे और सहमति से बने संबंध: इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, रद्द की रेप की FIR

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि शादी का वादा करके लंबे समय तक चले ‘सहमति आधारित’ (Consensual) संबंधों को हर मामले में दुष्कर्म (रेप) नहीं माना जा सकता। न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की पीठ ने मुरादाबाद की विशेष एससी/एसटी अदालत द्वारा जारी समन आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए यह व्यवस्था दी है।

कोर्ट की मुख्य टिप्पणी: कब बनता है दुष्कर्म का मामला?

अदालत ने कहा कि विवाह का झूठा वादा करना और विवाह का बाद में किसी कारणवश टूट जाना, ये दोनों बिल्कुल अलग स्थितियां हैं। दुष्कर्म का अपराध केवल तब सिद्ध होता है जब यह साबित हो जाए कि:

  • आरोपी की मंशा शुरुआत से ही विवाह करने की नहीं थी।

  • आरोपी ने केवल शारीरिक संबंध बनाने के उद्देश्य से ही विवाह का ‘झूठा वादा’ किया था।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि सहमति से बने संबंधों में शुरुआत से धोखाधड़ी की मंशा साबित नहीं होती, तो बाद में विवाह से इनकार करने मात्र से इसे रेप की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

केस की पृष्ठभूमि: क्यों रद्द हुई FIR?

  • आरोप: एक महिला ने इंस्टाग्राम के जरिए संपर्क में आए कपिल सोम नामक युवक पर विवाह का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने, मारपीट और जातिसूचक टिप्पणी करने के आरोप लगाए थे। वर्ष 2025 में दर्ज इस मुकदमे में आरोपी के पिता पर भी दुष्कर्म का आरोप था।

  • अदालत का विश्लेषण: सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि महिला एक 24 वर्षीय शिक्षित बालिग थी, जो स्वेच्छा से आरोपी के साथ रही। रिकॉर्ड के अनुसार, संबंध लंबे समय तक सहमति से चले।

  • कानूनी व्याख्या: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर असफल प्रेम संबंध को आपराधिक मुकदमे में नहीं बदला जा सकता, क्योंकि इससे न्याय प्रणाली पर अनावश्यक बोझ पड़ता है।

BNS और SC/ST एक्ट पर बड़ा फैसला

इस मामले में कोर्ट ने दो महत्वपूर्ण कानूनी बिंदुओं पर भी स्पष्टीकरण दिया:

  1. BNS का पूर्वव्यापी प्रभाव नहीं: अदालत ने कहा कि कथित घटनाएं 2022-23 की हैं, जबकि ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) 1 जुलाई 2024 से लागू हुई है। इसलिए, कानून का पूर्वव्यापी (Retrospective) प्रभाव नहीं हो सकता।

  2. SC/ST एक्ट का दुरुपयोग: कोर्ट ने कहा कि केवल जाति का उल्लेख करने या विवाह से इनकार करने मात्र से एससी/एसटी एक्ट की धाराएं लागू नहीं होतीं। जब तक सार्वजनिक रूप से अपमानित करने के स्पष्ट सबूत न हों, तब तक ये धाराएं आकर्षित नहीं होंगी।

हाईकोर्ट ने इसे न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए 5 जुलाई 2025 के समन आदेश को निरस्त कर दिया है। यह फैसला उन हजारों मामलों के लिए एक नजीर बन सकता है जहां संबंधों के टूटने के बाद आपसी सहमति के मामलों को बलात्कार के मुकदमों में परिवर्तित कर दिया जाता है।

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