‘इस्लामपुरा’ फिर से ‘कृष्णनगर’ बनने से रुका; कट्टरपंथियों के दबाव में झुकी मरियम नवाज सरकार, नाम बदलने का फैसला रद्द

लाहौर, पाकिस्तान: पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में एक साहसी प्रशासनिक पहल को कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेकते हुए वापस ले लिया गया है। मरियम नवाज की सरकार ने हाल ही में लाहौर के कई ऐतिहासिक स्थानों और सड़कों के नाम बदलकर उन्हें 1947 से पहले वाले नामों पर बहाल करने का फैसला किया था, लेकिन अब इस फैसले को ‘ठंडे बस्ते’ में डाल दिया गया है। इस्लामिक कट्टरपंथियों और सोशल मीडिया ब्लॉगर्स के तीखे विरोध के बाद सरकार ने पीछे हटने का निर्णय लिया है।

विवाद की जड़: क्या था सरकार का ऐतिहासिक प्लान?

बीते 20 मई को ‘लाहौर हेरिटेज एरियाज रिवाइवल’ की बैठक में नवाज शरीफ की अध्यक्षता में यह निर्णय लिया गया था कि लाहौर की करीब 20 सड़कों, चौराहों और मोहल्लों के नाम बदलकर उनकी पुरानी पहचान लौटाई जाएगी। इस योजना के तहत ‘इस्लामपुरा’ को वापस ‘कृष्णनगर’, ‘मौलाना जफर अली खान चौक’ को ‘लक्ष्मी चौक’, और ‘मुस्तफाबाद’ को ‘धरमपुरा’ के नाम से जाना जाना था। इसके अलावा ‘बाबरी मस्जिद चौक’ का नाम बदलकर ‘जैन मंदिर रोड’ करने की तैयारी थी, जबकि ‘फातिमा जिन्ना रोड’ और ‘अल्लामा इकबाल रोड’ जैसे नामों को भी बदला जाना था।

कट्टरपंथियों का दबाव और सरकार की चुप्पी

जैसे ही मरियम नवाज सरकार का यह आदेश सार्वजनिक हुआ, पाकिस्तान में हंगामा मच गया। कट्टरपंथी समूहों और सोशल मीडिया ब्लॉगर्स ने इसे ‘पाकिस्तान की इस्लामी विरासत को मिटाने’ और ‘हिंदू-सिख पहचान को फिर से थोपने’ की साजिश करार दिया। विरोध इतना तीव्र था कि सरकार को अपने कदम वापस खींचने पड़े। हालांकि, सरकार की तरफ से अभी तक कोई आधिकारिक औपचारिक बयान नहीं आया है, लेकिन स्थानीय प्रशासन के संकेत बताते हैं कि नाम बदलने की इस प्रक्रिया पर फिलहाल रोक लगा दी गई है।

जमीन की हकीकत: सरकारी आदेश बनाम जनता की जुबान

इस पूरे विवाद के बीच एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि सरकारी फेरबदल के बावजूद, स्थानीय जनता ने अधिकांश जगहों के नए नामों को कभी अपनाया ही नहीं। भले ही आधिकारिक दस्तावेजों में नाम बदल गए थे, लेकिन लोग आज भी इन चौराहों और मोहल्लों को उनके 1947 से पहले वाले पुराने नामों (जैसे कृष्णनगर या लक्ष्मी चौक) से ही पुकारते हैं। सरकार का यह कदम इतिहास को वर्तमान से जोड़ने की एक कोशिश थी, जिसे कट्टरपंथ के आगे हार माननी पड़ी। विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना पाकिस्तान की राजनीति में धर्म की गहरी पैठ और सांस्कृतिक इतिहास को लेकर जारी कशमकश को दर्शाती है।

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