विजयनगर में 15 अगस्त को तिरंगा फहराने से कर्नाटक के मंत्री जमीर अहमद खान ने मांगी छूट, भड़की BJP बोली— ‘कांग्रेस के लिए राष्ट्र नहीं वोट बैंक और चुनाव पहले’; कैबिनेट से बर्खास्तगी की मांग

देश भर में 80वें स्वतंत्रता दिवस के जश्न और ‘हर घर तिरंगा’ अभियान को लेकर जब राष्ट्रभक्ति का माहौल अपने चरम पर है, वहीं दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक से एक बड़ा राजनीतिक और वैचारिक विवाद सामने आ गया है। कर्नाटक सरकार में आवास मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता बी. जेड. जमीर अहमद खान ने 15 अगस्त को उत्तर कर्नाटक के नवगठित विजयनगर जिले में आयोजित होने वाले आधिकारिक स्वतंत्रता दिवस समारोह में राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा) फहराने की जिम्मेदारी से छूट मांग ली है। मंत्री ने इसके साथ ही विजयनगर जिले के प्रभारी मंत्री के पद से भी खुद को मुक्त रखने की गुजारिश की है। इस फैसले के बाद राज्य का सियासी पारा अचानक गरमा गया है। विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने कांग्रेस सरकार और मंत्री पर चौतरफा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि कांग्रेस के लिए राष्ट्र के प्रति कर्तव्य से बढ़कर चुनावी राजनीति और संकीर्ण वोट बैंक की चिंता है। भाजपा ने मुख्यमंत्री से जमीर अहमद खान को तत्काल मंत्रिमंडल से बर्खास्त करने की मांग कर दी है।

मुख्यमंत्री को लिखा पत्र: समय की कमी और चुनावी व्यस्तता का दिया हवाला

बेंगलुरु के चामराजपेट विधानसभा क्षेत्र से विधायक और नवनियुक्त आवास मंत्री बी. जेड. जमीर अहमद खान ने मुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार को एक औपचारिक पत्र लिखकर इन दोनों अहम जिम्मेदारियों से खुद को अलग रखने का अनुरोध किया। पत्र में उन्होंने लिखा कि आगामी दिनों में राज्य के भीतर कई स्थानीय निकायों—विशेष रूप से बेंगलुरु महानगर पालिका (बीबीएमपी, जिसे अब ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी यानी जीबीए का स्वरूप दिया गया है)—के चुनाव, संभावित विधानसभा उपचुनाव और पार्टी के व्यापक संगठनात्मक कार्यक्रम प्रस्तावित हैं।

जमीर अहमद खान ने अपने पत्र में तर्क दिया, “आने वाले दिनों में कई संगठनात्मक जिम्मेदारियों और चुनाव प्रबंधन को देखते हुए मेरे पास जिला प्रभारी मंत्री के रूप में पर्याप्त समय दे पाना संभव नहीं होगा। इसलिए मेरा अनुरोध है कि मुझे राज्य के किसी भी जिले के प्रभारी मंत्री का प्रभार न सौंपा जाए। इसके साथ ही, मुझे 15 अगस्त को विजयनगर जिले में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने का दायित्व दिया गया है। चूंकि मैं इस कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाऊंगा, इसलिए मुझे इस जिम्मेदारी से भी मुक्त किया जाए और किसी अन्य मंत्री को यह दायित्व सौंपा जाए।”

सरकार ने बदला फैसला: मंत्री के. एस. बसवंथप्पा को सौंपी विजयनगर की कमान

मंत्री जमीर अहमद खान के इस पत्र के सार्वजनिक होते ही जब विवाद गहराने लगा, तो कर्नाटक सरकार ने आनन-फानन में 15 अगस्त के आधिकारिक रोस्टर में संशोधन किया। राज्य सरकार के नए आदेश के अनुसार, अब विजयनगर जिले में स्वतंत्रता दिवस के मुख्य समारोह में राष्ट्रीय ध्वज फहराने की जिम्मेदारी मंत्री के. एस. बसवंथप्पा को सौंपी गई है।

गौरतलब है कि बसवंथप्पा को इससे पहले उडुपी जिले में ध्वजारोहण का दायित्व सौंपा गया था, लेकिन विजयनगर में हुए इस बदलाव के बाद उडुपी की कमान मंत्री रिजवान अरशद को दे दी गई है। हालांकि, सरकार द्वारा व्यवस्था बदल दिए जाने के बावजूद इस मामले पर उपजा सियासी तूफान थमने का नाम नहीं ले रहा है।

‘तिरंगा फहराना प्रशासनिक काम नहीं, पवित्र कर्तव्य है’: भाजपा का तीखा प्रहार

विपक्षी दल भाजपा ने इस मुद्दे को सीधे तौर पर राष्ट्रीय गौरव और देशभक्ति के प्रति अनादर से जोड़ते हुए कांग्रेस आलाकमान को भी लपेटे में ले लिया है। कर्नाटक विधानसभा में विपक्ष के नेता और पूर्व उप मुख्यमंत्री आर. अशोक ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर राष्ट्रीय ध्वज फहराना केवल कोई साधारण प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक और विशेषकर संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का सबसे पवित्र राष्ट्रीय कर्तव्य है।

आर. अशोक ने कहा, “कांग्रेस बेशर्मी से राष्ट्रहित के ऊपर अपनी पार्टी की राजनीति और चुनाव प्रबंधन को प्राथमिकता दे रही है। एक कैबिनेट मंत्री यह कहकर तिरंगा फहराने से इनकार कर रहा है कि उसके पास समय नहीं है क्योंकि उसे पार्टी के संगठन और निकाय चुनावों की चिंता है। यह देश के स्वाभिमान और हमारे राष्ट्रीय ध्वज का खुला अपमान है। मुख्यमंत्री को ऐसे गैर-जिम्मेदार मंत्री को एक मिनट भी पद पर बनाए रखने का अधिकार नहीं है और उन्हें तुरंत बर्खास्त किया जाना चाहिए।”

भाजपा के राष्ट्रीय आईटी विभाग के प्रमुख अमित मालवीय ने भी इस घटना को ‘शर्मनाक और राष्ट्र के प्रति घोर अपमानजनक’ करार दिया। भाजपा नेताओं का आरोप है कि जमीर अहमद खान किसी खास वर्ग और अपने वोट बैंक को साधने के लिए विजयनगर जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण जिले में जाने से कतरा रहे हैं।

विजयनगर का ऐतिहासिक महत्व और विवाद की संवेदनशीलता

विजयनगर जिला केवल एक प्रशासनिक इकाई नहीं है, बल्कि यह भारत के समृद्ध इतिहास और गौरवशाली विजयनगर साम्राज्य की धरोहर (हम्पी) से जुड़ा हुआ क्षेत्र है। ऐसे ऐतिहासिक महत्व वाले जिले में राज्य सरकार के मंत्री द्वारा 15 अगस्त के सबसे बड़े राष्ट्रीय पर्व के दिन जाने से मना करना स्थानीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पिछली सरकार में भी जमीर अहमद खान के पास विजयनगर जिले का प्रभार था। हाल ही में हुए कैबिनेट विस्तार में उन्हें दोबारा आवास विभाग की जिम्मेदारी दी गई थी। ऐसे में अचानक स्वतंत्रता दिवस से ठीक एक दिन पहले पत्र लिखकर इस राष्ट्रीय दायित्व से पल्ला झाड़ लेना राजनीतिक रूप से कांग्रेस के लिए गले की फांस बनता जा रहा है।

कांग्रेस का पलटवार: ‘मुद्दे को बेवजह तूल दे रही है भाजपा’

इस पूरे घटनाक्रम पर जहां मंत्री जमीर अहमद खान की ओर से अब तक कोई सीधा सार्वजनिक स्पष्टीकरण नहीं आया है, वहीं कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ताओं और राज्य सरकार के अन्य मंत्रियों ने भाजपा के आरोपों का खंडन किया है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि मंत्री ने केवल अपने अत्यधिक व्यस्त कार्यक्रम और पार्टी के आगामी चुनाव दायित्वों की वजह से प्रशासनिक सुविधा के तहत मुख्यमंत्री से अनुरोध किया था, जिसे बेवजह राष्ट्रभक्ति से जोड़कर देखा जा रहा है।

कांग्रेस नेताओं ने पलटवार करते हुए कहा कि स्वतंत्रता दिवस समारोह में सरकार का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कर दिया गया है और तिरंगा पूरी गरिमा व सम्मान के साथ फहराया जाएगा। कांग्रेस को किसी से भी देशभक्ति का प्रमाण पत्र लेने की आवश्यकता नहीं है और भाजपा केवल विभाजनकारी राजनीति और सुर्खियों में बने रहने के लिए इस सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया को तूल दे रही है।

15 अगस्त से पहले गर्माया राष्ट्रवाद बनाम तुष्टिकरण का विमर्श

कर्नाटक की राजनीति में यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस की तैयारियां जोरों पर हैं। भाजपा इस पूरे प्रकरण को राष्ट्रीय स्तर पर उठाकर कांग्रेस की कार्यशैली और उसकी प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करने में जुट गई है।

आने वाले दिनों में ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी (GBA) के स्थानीय निकाय चुनाव और विभिन्न विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनावों में भी यह मुद्दा प्रमुखता से गूंजने के पूरे आसार हैं। राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान, संवैधानिक जिम्मेदारियों और राजनीतिक व्यस्तताओं के बीच छिड़ी यह रार आने वाले दिनों में कर्नाटक के सियासी गलियारों में और अधिक उग्र रूप ले सकती है।

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