राजनीति में कुछ फैसले ऐसे होते हैं जो या तो आपको अर्श पर पहुंचा देते हैं या फिर फर्श पर लाकर खड़ा कर देते हैं। केरल कांग्रेस के कद्दावर नेता वडास्सेरी दामोदर मेनन सतीशन (वी डी सतीशन) ने भी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले एक ऐसा ही ऐतिहासिक और बेहद जोखिम भरा दांव खेला था। उन्होंने सरेआम ऐलान कर दिया था कि अगर इस बार कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ (UDF) बहुमत हासिल नहीं कर पाया, तो वह हमेशा के लिए ‘राजनीतिक वनवास’ में चले जाएंगे। लेकिन आज केरल की तकदीर बदल चुकी है और सतीशन का वह वनवास का दांव उन्हें राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक ले आया है। सोमवार को उन्होंने केरल के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेकर इतिहास रच दिया।
कोच्चि के वकील से केरल के मुख्यमंत्री तक का सफर
सतीशन को उनके समर्थक प्यार से ‘वीडी’ या ‘वीडीएस’ कहकर पुकारते हैं। कोच्चि के एक साधारण वकील से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू करने वाले 61 वर्षीय सतीशन ने आज केरल कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे के रूप में खुद को स्थापित कर लिया है। वह राज्य की परावुर विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं। अपने तीखे और तार्किक भाषणों, अद्भुत कानूनी समझ और कड़े संगठनात्मक अनुशासन के दम पर उन्होंने पार्टी के भीतर अपनी यह मजबूत धाक जमाई है। सदन के भीतर वामपंथी सरकार पर उनके आक्रामक हमलों और जनता के बीच उनके संयमित व्यवहार ने उन्हें हर वर्ग का चहेता बना दिया।
राहुल गांधी का वो ‘एक फैसला’ जिसने बदल दी केरल कांग्रेस की किस्मत
केरल के राजनीतिक पंडितों की मानें तो कांग्रेस की इस बंपर जीत की नींव साल 2021 की करारी हार के बाद ही रख दी गई थी। उस कठिन दौर में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक बड़ा जोखिम उठाते हुए वी डी सतीशन को विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाने का पूरा समर्थन किया था। उस वक्त जिसे एक रिस्की फैसला माना जा रहा था, आज वह केरल कांग्रेस के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। विपक्ष के नेता के तौर पर सतीशन ने पिनराई विजयन सरकार को कथित भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार और वित्तीय संकट जैसे मुद्दों पर बैकफुट पर ला दिया।
एंटनी और चांडी के दौर के बाद उभरा केरल का नया जननेता
सतीशन की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने कभी मंत्री पद नहीं संभाला, इसके बावजूद उनकी नेतृत्व क्षमता कमाल की रही। केरल चुनाव के दौरान वह के. करुणाकरण, ए. के. एंटनी और ओमन चांडी जैसे दिग्गज कांग्रेसी नेताओं की विरासत को आगे बढ़ाते हुए एक बड़े जननेता के रूप में उभरे। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब मुख्यमंत्री पद के लिए दिल्ली में वरिष्ठ नेता के. सी. वेणुगोपाल के नाम पर चर्चा की खबरें आईं, तो सतीशन के समर्थन में हजारों कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए थे। आखिरकार हाईकमान ने उनके बेहतरीन ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए उन्हें ही राज्य की कमान सौंपी।
विरोधियों को पछाड़ा और खुद को साबित किया ‘सुलतान’
सतीशन का यह सफर इतना आसान भी नहीं था। चुनावी सफर के दौरान उन्हें कई आंतरिक और बाहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्हें राज्य के प्रभावशाली एझवा समुदाय के नेता वेल्लापल्ली नटेशन और अपनी ही सामुदायिक संस्था एनएसएस के प्रमुख जी. सुकुमारन नायर जैसे कद्दावर सामाजिक नेताओं के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। यही नहीं, पार्टी के भीतर भी उनके आलोचक उनकी केंद्रीयकृत कार्यशैली पर सवाल उठाते रहे हैं, जिससे कई सीनियर नेता नाराज भी हुए। लेकिन सतीशन ने युवाओं को आगे लाकर और चुनावी अभियान को एकदम आधुनिक और साफ-सुथरा रंग देकर सभी विरोधियों को चित कर दिया। एक दशक बाद केरल में यूडीएफ की सत्ता में वापसी कराकर उन्होंने साबित कर दिया कि वो राजनीति के असली बाजीगर हैं।
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