1956 की इस फिल्म के एक गाने में किशोर कुमार ने 21 बार बदली थी अपनी आवाज

भारतीय सिनेमा और संगीत के इतिहास में जब भी बहुमुखी प्रतिभा (Versatility) और बेमिसाल गायकी का जिक्र होता है, तो सबसे पहला नाम किशोर कुमार (Kishore Kumar) का ही आता है। किशोर दा न केवल एक बेहतरीन और रूहानी गायक थे, बल्कि वे एक शानदार अभिनेता, संगीतकार और वॉयस ओवर आर्टिस्ट भी थे। किशोर कुमार की जिंदगी और उनके गानों से जुड़े न जाने कितने ही मजेदार और दिलचस्प किस्से फिल्म इंडस्ट्री के गलियारों में मशहूर हैं।

अक्सर लोग उनके गाने ‘आके सीधी लगी दिल पे’ में उनके द्वारा मेल और फीमेल दोनों आवाजों में गाए गए प्रयोग की बात करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि साल 1956 में आई एक फिल्म के गाने में किशोर दा ने एक या दो नहीं, बल्कि पूरे 21 बार अपनी आवाज (Voice Variations) को बदला था? आइए जानते हैं किशोर कुमार के इस बेहद अनूठे, मजेदार और आइकॉनिक गाने के बारे में, जिसे आपने बचपन से आज तक कई बार जरूर सुना होगा।

“कुवे में कूद के मर जाना…” जानिए इस जादुई गाने की पूरी दास्तां

हम किशोर कुमार के जिस सुपरहिट और एवरग्रीन गाने की बात कर रहे हैं, वह साल 1956 में रिलीज हुई फिल्म ‘परिवार’ का प्रसिद्ध गीत “कुवे में कूद के मर जाना, यार तुम शादी मत करना” है। इस गाने की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि किशोर दा ने न सिर्फ अपनी आवाज में हैरान कर देने वाले बदलाव किए, बल्कि स्क्रीन पर हर नई आवाज के साथ अपना गेटअप और हाव-भाव भी उसी किरदार के अनुसार ढाल लिया था।

इस बेहद मनोरंजक गाने को संगीत की दुनिया के दिग्गज संगीतकार सलिल चौधरी (Salil Chowdhury) ने कंपोज किया था, जबकि इसके अनोखे और मजेदार बोल महान गीतकार शैलेंद्र ने लिखे थे। इस ट्रैक में किशोर कुमार ने वॉयस मॉड्यूलेशन (Voice Modulation) की वो कला दिखाई जो आज के दौर के मिमिक्री आर्टिस्ट्स के लिए भी एक बहुत बड़ा सबक है।

कभी बच्चे तो कभी बूढ़े की आवाज निकालकर सबको किया मंत्रमुग्ध

यह पूरा गाना तकरीबन 8 मिनट से भी ज्यादा लंबा है। गाने के दौरान अलग-अलग किरदारों, भावनाओं और परिस्थितियों को पर्दे पर जीवंत करने के लिए किशोर कुमार ने 21 से भी अधिक बार अपनी आवाज में वैरिएशन दिए।

गाने में जहां वे कुंवारे लड़कों को शादी न करने की सलाह दे रहे हैं, वहीं किरदारों को समझाने के लिए वे कभी एक नन्हे बच्चे की तोतली आवाज निकालते हैं, तो कभी एक लाचार और खांसते हुए बूढ़े की आवाज में गाने लगते हैं। इतना ही नहीं, गाने के बीच-बीच में उन्होंने रोने, गिड़गिड़ाने और पागलों की तरह हंसने जैसी कई हास्यपूर्ण आवाजों का ऐसा बेहतरीन इस्तेमाल किया कि सुनने वाला हंसते-हंसते लोटपोट हो जाए। यह गाना साबित करता है कि किशोर कुमार सिर्फ गाते नहीं थे, बल्कि अपने गानों के जरिए पूरा नाटक रच देते थे।

क्या थी 1956 में आई फिल्म ‘परिवार’ की कहानी?

जिस फिल्म का यह गाना है, उसका नाम ‘परिवार’ था। यह फिल्म उस दौर के भारतीय समाज के एक आदर्श संयुक्त परिवार (Joint Family) की कहानी पर आधारित थी। फिल्म में एक ही छत के नीचे रहने वाले चार भाइयों, उनकी पत्नियों और बच्चों की खूबसूरत बॉन्डिंग दिखाई गई थी। इन भाइयों में से कोई वकील था, कोई डॉक्टर तो कोई बड़ा बिजनेसमैन। सब कुछ बेहद खुशहाल चल रहा होता है और सब एक-दूसरे का सुख-दुख बांटते हैं।

लेकिन फिर कहानी में एक ट्विस्ट आता है, जब महज ‘एक गिलास दूध’ को लेकर घर की महिलाओं में बहस शुरू हो जाती है और देखते ही देखते वह पूरा सुखी परिवार बिखरने की कगार पर आ जाता है। इस फिल्म में किशोर कुमार के अलावा दुर्गा खोटे, सज्जन लाल पुरोहित, सुलोचना लाटकर और ऊषा किरण जैसे गुजरे जमाने के कई दिग्गज कलाकारों ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं।

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