निर्जला एकादशी पर पानी कब पीना है सही? जानें ज्योतिर्विद का मत और प्राण संकट में जल ग्रहण के विशेष नियम

ज्येष्ठ महीने की तपती गर्मी में बिना पानी रहे व्रत करना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। सनातन धर्म में सभी 24 एकादशियों में ‘निर्जला एकादशी’ को सबसे कठिन और सर्वोच्च स्थान दिया गया है। साल 2026 में यह पावन व्रत 25 जून 2026 को रखा जाएगा। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है—’निर्जला’ अर्थात जिसमें जल की एक बूंद भी ग्रहण न की जाए।

लेकिन कई बार भीषण गर्मी, डिहाइड्रेशन या अचानक स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण व्रती के सामने असमंजस की स्थिति पैदा हो जाती है। आइए जानते हैं ज्योतिर्विद पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार, किन परिस्थितियों में जल ग्रहण करने की छूट मिलती है और इस महाव्रत के कड़े नियम क्या हैं।

क्या निर्जला एकादशी में पानी पिया जा सकता है? जानिए शास्त्रों का मत

शास्त्रों के अनुसार, निर्जला एकादशी व्रत का संकल्प सूर्योदय से शुरू होकर अगले दिन के सूर्योदय यानी पारण काल तक चलता है। इस दौरान अन्न के साथ-साथ जल का पूरी तरह त्याग करना अनिवार्य होता है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु इस कठिन व्रत को पूर्ण निष्ठा से रखता है, उसे साल भर की सभी एकादशियों के बराबर पुण्य फल अकेले इस एक व्रत से मिल जाता है। नियमानुसार, इस व्रत का पारण (व्रत खोलना) करते समय ही सबसे पहले जल ग्रहण करना उचित माना गया है।

इन विशेष परिस्थितियों और लोगों को मिलती है जल की छूट

पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार, सनातन धर्म का मूल सिद्धांत ही मानवता और जीवन की रक्षा है। इसलिए कुछ खास विषम परिस्थितियों में शास्त्रों ने नियमों में लचीलापन दिया है:

  • बीमार, बुजुर्ग और बच्चे: यदि कोई व्यक्ति गंभीर बीमारी से पीड़ित है, वृद्ध है या बच्चे हैं, तो उन्हें इस कड़े नियम से छूट है।

  • गर्भवती महिलाएं: स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए गर्भवती महिलाओं को भी बिना पानी के व्रत न रखने की सलाह दी जाती है।

  • फलाहारी विकल्प: यदि आप पूरी तरह निर्जल रहने में असमर्थ हैं, तो केवल प्रभु विष्णु की भक्ति भाव से आराधना करते हुए फलाहार या जलीय आहार (लौकिक छूट के साथ) लेकर भी व्रत का संकल्प पूरा कर सकते हैं। हालांकि, इसका पूर्ण फल निर्जल व्रत जितना नहीं होता, लेकिन पूजा का पुण्य अवश्य मिलता है।

अगर प्यास के कारण प्राणों पर आ जाए संकट, तो क्या करें?

पंडित जी का स्पष्ट मत है कि “व्रत या किसी भी नियम से ऊपर मनुष्य के प्राणों की रक्षा है।” यदि व्रत के दौरान अत्यधिक गर्मी के कारण चक्कर आने लगें, ब्लड प्रेशर (BP) अचानक लो हो जाए, या शरीर में डिहाइड्रेशन (पानी की गंभीर कमी) की स्थिति बन जाए, तो तुरंत पानी पी लेना चाहिए। ऐसी स्थिति में प्राण संकट में डालकर व्रत जारी रखना अनुचित माना गया है।

विशेष उपाय: यदि गला बहुत ज्यादा सूख रहा हो, तो शास्त्रों में आचमन करने या कुल्ला करने की अनुमति है। आचमन के दौरान जल की कुछ बूंदें कंठ तक ले जाई जा सकती हैं, जिससे प्राणों को थोड़ी शांति मिलती है और इसे सामान्य रूप से व्रत का पूर्ण खंडन नहीं माना जाता।

निर्जला एकादशी व्रत के मुख्य नियम और सावधानियां

यदि आप 25 जून को यह व्रत रख रहे हैं, तो इन महत्वपूर्ण बातों का ध्यान अवश्य रखें:

  1. चावल और तामसिक भोजन का त्याग: एकादशी व्रत से एक दिन पहले (दशमी तिथि को) ही चावल खाने से परहेज करना चाहिए। साथ ही तामसिक भोजन (लहसुन, प्याज आदि) से पूरी तरह दूरी बना लेनी चाहिए।

  2. तुलसी पत्र न तोड़ें: एकादशी के दिन तुलसी दल (पत्ते) तोड़ना पूरी तरह वर्जित होता है। भगवान विष्णु के भोग के लिए एक दिन पहले (दशमी) को ही तुलसी के पत्ते तोड़कर रख लें।

  3. महादान का महत्व: ज्येष्ठ मास की गर्मी में इस दिन प्यासों को पानी पिलाना, राहगीरों के लिए शरबत की व्यवस्था करना, मिट्टी का घड़ा (कलश), वस्त्र और मौसमी फल (जैसे आम, तरबूज) दान करना अत्यंत शुभ और अक्षय पुण्य देने वाला माना जाता है।

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