नेहरू कैबिनेट से एक इस्तीफे ने बदली देश की सियासत: कैसे जनसंघ की राख से हुआ ‘कमल’ का उदय

नई दिल्ली: 6 अप्रैल 1980 को भारतीय राजनीति के क्षितिज पर एक नए दल का उदय हुआ था—भारतीय जनता पार्टी (BJP)। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया की इस सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी की जड़ें पंडित जवाहरलाल नेहरू की पहली कैबिनेट में हुए एक इस्तीफे से जुड़ी हैं? आज भाजपा अपना स्थापना दिवस मना रही है, ऐसे में यह जानना दिलचस्प है कि कैसे धारा 370 के विरोध और आरएसएस की विचारधारा को बचाने की जद्दोजहद ने भारतीय जनसंघ और फिर भाजपा को जन्म दिया।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी का इस्तीफा और जनसंघ की स्थापना

कहानी शुरू होती है आजादी के शुरुआती वर्षों से। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी नेहरू सरकार में उद्योग और आपूर्ति मंत्री (तत्कालीन श्रम मंत्री के रूप में भी संदर्भित) थे। जम्मू-कश्मीर के पूर्ण विलय, अनुच्छेद 370, ‘दो विधान, दो प्रधान और दो निशान’ के मुद्दे पर नेहरू से उनके मतभेद इतने गहरे हो गए कि उन्होंने कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे के बाद मुखर्जी एक ऐसे राजनीतिक विकल्प की तलाश में थे जो राष्ट्रवाद को सर्वोपरि रखे। इसी दौरान उन्होंने आरएसएस के तत्कालीन सरसंघचालक ‘श्री गुरुजी’ (एम.एस. गोलवलकर) से मुलाकात की। इस विचार-मंथन का नतीजा 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली के राघोमल माध्यमिक विद्यालय में ‘भारतीय जनसंघ’ के रूप में सामने आया।

दीपक चुनाव चिह्न और पहले चुनाव में मिली बड़ी कामयाबी

जनसंघ ने भगवा रंग को अपने झंडे और ‘दीपक’ को अपने चुनाव चिह्न के रूप में चुना। 1952 के पहले आम चुनाव में पार्टी ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए 3.06 प्रतिशत वोट हासिल किए और 3 सांसद संसद पहुंचे, जिनमें स्वयं डॉ. मुखर्जी शामिल थे। इसी चुनाव के बाद जनसंघ को राष्ट्रीय दल का दर्जा मिला। मुखर्जी ने संसद में अकाली दल और हिंदू महासभा जैसे दलों के साथ मिलकर ‘नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट’ बनाया, जिससे वे अनौपचारिक रूप से संसद के पहले नेता प्रतिपक्ष बने।

‘दोहरी सदस्यता’ का विवाद और भाजपा का उदय

1977 में आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी को हराने के लिए जनसंघ का विलय ‘जनता पार्टी’ में हो गया। सरकार भी बनी, लेकिन कुछ समय बाद आंतरिक कलह शुरू हो गई। जनता पार्टी के नेताओं ने शर्त रखी कि पार्टी का कोई भी सदस्य आरएसएस का सदस्य नहीं रह सकता। इस ‘दोहरी सदस्यता’ के मुद्दे पर समझौता करने के बजाय जनसंघ के गुट ने जनता पार्टी से बाहर निकलने का फैसला किया। 6 अप्रैल 1980 को नई दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में भाजपा का गठन हुआ और अटल बिहारी वाजपेयी इसके पहले अध्यक्ष चुने गए। वाजपेयी जी ने तब मुंबई के अधिवेशन में घोषणा की थी—”अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा और कमल खिलेगा।”

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