1 मार्च को है प्रदोष व्रत: शिव-पार्वती की कृपा और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए जरूर करें इस अचूक चालीसा का पाठ!

नई दिल्ली। वैदिक पंचांग के अनुसार हर महीने के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखने का विधान है। यह पावन दिन देवों के देव महादेव और माता पार्वती की विशेष पूजा-अर्चना के लिए समर्पित होता है। धार्मिक ग्रंथों में बताया गया है कि इस दिन प्रदोष काल में विधि-विधान से व्रत और शिव-गौरी की उपासना करने से जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।

1 मार्च को रखा जाएगा प्रदोष व्रत, दूर होंगे सारे भय

इस बार प्रदोष व्रत 01 मार्च (Pradosh Vrat 2026) को किया जा रहा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन जो भी साधक सच्चे मन से भगवान शिव की साधना करता है, उसे मृत्यु और संकटों के सभी प्रकार के भयों से हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाती है। महादेव के आशीर्वाद से भक्त के जीवन में सदैव सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।

पूजा में जरूर करें पार्वती चालीसा का पाठ, रिश्ते में आएगी मधुरता

प्रदोष व्रत की पूजा के दौरान ‘पार्वती चालीसा’ का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है। ऐसी मान्यता है कि इस सिद्ध चालीसा का पाठ करने से वैवाहिक जीवन से जुड़ी सभी परेशानियां खत्म हो जाती हैं और खुशियों का आगमन होता है। इसके प्रभाव से पति-पत्नी के रिश्ते में आपसी समझ और मधुरता बढ़ती है। अपनी पूजा को सफल बनाने के लिए आप नीचे दी गई पार्वती चालीसा का पाठ कर सकते हैं:

॥ पार्वती चालीसा ॥

॥ दोहा ॥

जय गिरी तनये दक्षजे,शम्भु प्रिये गुणखानि।

गणपति जननी पार्वती,अम्बे! शक्ति! भवानि॥

॥ चौपाई ॥

ब्रह्मा भेद न तुम्हरो पावे। पंच बदन नित तुमको ध्यावे॥

षड्मुख कहि न सकत यश तेरो। सहसबदन श्रम करत घनेरो॥

तेऊ पार न पावत माता। स्थित रक्षा लय हित सजाता॥

अधर प्रवाल सदृश अरुणारे। अति कमनीय नयन कजरारे॥

ललित ललाट विलेपित केशर। कुंकुम अक्षत शोभा मनहर॥

कनक बसन कंचुकी सजाए। कटी मेखला दिव्य लहराए॥

कण्ठ मदार हार की शोभा। जाहि देखि सहजहि मन लोभा॥

बालारुण अनन्त छबि धारी। आभूषण की शोभा प्यारी॥

नाना रत्न जटित सिंहासन। तापर राजति हरि चतुरानन॥

इन्द्रादिक परिवार पूजित। जग मृग नाग यक्ष रव कूजित॥

गिर कैलास निवासिनी जय जय। कोटिक प्रभा विकासिन जय जय॥

त्रिभुवन सकल कुटुम्ब तिहारी। अणु अणु महं तुम्हारी उजियारी॥

हैं महेश प्राणेश! तुम्हारे। त्रिभुवन के जो नित रखवारे॥

उनसो पति तुम प्राप्त कीन्ह जब। सुकृत पुरातन उदित भए तब॥

बूढ़ा बैल सवारी जिनकी। महिमा का गावे कोउ तिनकी॥

सदा श्मशान बिहारी शंकर। आभूषण हैं भुजंग भयंकर॥

कण्ठ हलाहल को छबि छायी। नीलकण्ठ की पदवी पायी॥

देव मगन के हित अस कीन्हों। विष लै आपु तिनहि अमि दीन्हों॥

ताकी तुम पत्नी छवि धारिणि। दूरित विदारिणी मंगल कारिणि॥

देखि परम सौन्दर्य तिहारो। त्रिभुवन चकित बनावन हारो॥

भय भीता सो माता गंगा। लज्जा मय है सलिल तरंगा॥

सौत समान शम्भु पहआयी। विष्णु पदाब्ज छोड़ि सो धायी॥

तेहिकों कमल बदन मुरझायो। लखि सत्वर शिव शीश चढ़ायो॥

नित्यानन्द करी बरदायिनी। अभय भक्त कर नित अनपायिनी॥

अखिल पाप त्रयताप निकन्दिनि। माहेश्वरी हिमालय नन्दिनि॥

काशी पुरी सदा मन भायी। सिद्ध पीठ तेहि आपु बनायी॥

भगवती प्रतिदिन भिक्षा दात्री। कृपा प्रमोद सनेह विधात्री॥

रिपुक्षय कारिणि जय जय अम्बे। वाचा सिद्ध करि अवलम्बे॥

गौरी उमा शंकरी काली। अन्नपूर्णा जग प्रतिपाली॥

सब जन की ईश्वरी भगवती। पतिप्राणा परमेश्वरी सती॥

तुमने कठिन तपस्या कीनी। नारद सों जब शिक्षा लीनी॥

न्न न नीर न वायु अहारा। अस्थि मात्रतन भयउ तुम्हारा॥

पत्र घास को खाद्य न भायउ। उमा नाम तब तुमने पायउ॥

तप बिलोकि रिषि सात पधारे। लगे डिगावन डिगी न हारे॥

तब तव जय जय जय उच्चारेउ। सप्तरिषि निज गेह सिधारेउ॥

सुर विधि विष्णु पास तब आए। वर देने के वचन सुनाए॥

मांगे उमा वर पति तुम तिनसों। चाहत जग त्रिभुवन निधि जिनसों॥

एवमस्तु कहि ते दोऊ गए। सुफल मनोरथ तुमने लए॥

करि विवाह शिव सों हे भामा। पुनः कहाई हर की बामा॥

जो पढ़ि है जन यह चालीसा। धन जन सुख देइहै तेहि ईसा॥

॥ दोहा ॥

कूट चन्द्रिका सुभग शिर,जयति जयति सुख खानि।

पार्वती निज भक्त हित,रहहु सदा वरदानि॥?

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