
देवभूमि उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के प्रवेश द्वार हल्द्वानी में आयोजित कांग्रेस की चुनावी रैली के बाद उठे एक राजनीतिक बवंडर ने पूरे देश की सियासत में हलचल मचा दी है। 8 अगस्त को हल्द्वानी के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में 2027 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव की तैयारियों का बिगुल फूंकने के लिए ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (AICC) के अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे पहुँचे थे। रैली के समापन के बाद स्थानीय स्तर पर कथित तौर पर बीजेपी और आरएसएस से जुड़े कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा उस मंच पर ‘गंगाजल’ छिड़ककर और हवन कराकर ‘शुद्धिकरण’ का कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस घटना की जानकारी जैसे ही सामने आई, कांग्रेस खेमे में भारी उबाल आ गया।
कांग्रेस पार्टी ने इसे देश के मुख्य विपक्षी दल के प्रमुख और एक वरिष्ठ दलित नेता का सार्वजनिक तौर पर अपमान करार दिया है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह केवल एक राजनीतिक विरोध नहीं है, बल्कि भारतीय संविधान के मूल्यों, समानता के अधिकार और सामाजिक न्याय पर सीधा हमला है। इस घटना के विरोध में अब कांग्रेस पार्टी ने उत्तराखंड की सड़कों से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ एक विशाल और व्यापक जन-आंदोलन का खाका तैयार कर लिया है।
प्रियंका गांधी का केंद्र और आरएसएस पर सीधा हमला: ‘यह कैसी घटिया राजनीति है?’
कांग्रेस सांसद और पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने हल्द्वानी की घटना पर बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। प्रियंका गांधी ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों के माध्यम से इस कृत्य की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि एक तरफ तो सरकार ‘तिरंगा यात्रा’ और ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बातें करती है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष के सबसे बड़े नेता और कांग्रेस अध्यक्ष के भाषण देने के बाद मंच का शुद्धिकरण कराया जाता है।
प्रियंका गांधी ने इस घटना को बीजेपी-आरएसएस की ‘संकीर्ण, सामंती और जातिवादी मानसिकता’ का प्रत्यक्ष प्रमाण बताया। उन्होंने सीधे तौर पर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री को इस घटिया कृत्य की सार्वजनिक रूप से निंदा करनी चाहिए और देश से माफी मांगनी चाहिए। प्रियंका गांधी ने कहा कि जब देश के इतने बड़े संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के साथ इस प्रकार का व्यवहार किया जा सकता है, तो आम दलितों और शोषित वर्ग के लोगों के साथ कैसी मानसिकता रखी जाती होगी, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
राज्यसभा में गूंजा छुआछूत का मुद्दा: मल्लिकार्जुन खरगे ने उठाई गिरफ्तारी की मांग
यह मुद्दा केवल सड़कों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि देश की संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा में भी इस पर जोरदार हंगामा देखने को मिला। कांग्रेस अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने खुद उच्च सदन में इस मुद्दे को बेहद भावुक और कड़े शब्दों में उठाया। खरगे ने सदन को संबोधित करते हुए कहा कि वे पिछले कई दशकों से संसद में हैं, लेकिन उन्होंने कभी खुद को दलित बताकर सुरक्षा या सहानुभूति नहीं मांगी है, क्योंकि वे अपनी लड़ाई खुद लड़ने में पूरी तरह सक्षम हैं।
लेकिन हल्द्वानी के रामलीला मैदान में उनके जाने के बाद हुए इस ‘शुद्धिकरण’ और हवन ने यह साबित कर दिया है कि सत्ताधारी दल के कुछ लोगों की सोच में आज भी छुआछूत की भावना गहराई से बैठी हुई है। खरगे ने मांग की कि इस मामले को केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित न रखा जाए, बल्कि छुआछूत निवारण अधिनियम (Untouchability Offences Act) के तहत मामला दर्ज करके ऐसा कृत्य करने वाले दोषियों को तुरंत गिरफ्तार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में वैचारिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन किसी व्यक्ति की पृष्ठभूमि या जाति के आधार पर ऐसी हरकत करना हमारे लोकतंत्र के लिए कलंक है।
संसद में बीजेपी की सफाई और जेपी नड्डा का बयान: ‘हम ऐसी हरकतों की निंदा करते हैं’
राज्यसभा में विपक्ष के भारी हंगामे और नारेबाजी के बीच सत्ता पक्ष की ओर से सदन के नेता और केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने अपनी पार्टी का रुख स्पष्ट करने का प्रयास किया। जेपी नड्डा ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी इस प्रकार की किसी भी गतिविधि या मानसिकता का समर्थन नहीं करती है। उन्होंने इस घटना को दर्दनाक और दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि मल्लिकार्जुन खरगे देश के वरिष्ठ नेता हैं और उनका अपमान किसी एक दल का नहीं, बल्कि संपूर्ण सदन के लिए पीड़ादायक है।
जेपी नड्डा ने आश्वासन दिया कि केंद्र सरकार और उत्तराखंड की राज्य सरकार इस मामले की तह तक जाकर निष्पक्ष जांच कराएगी और जो भी दोषी पाया जाएगा उस पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। वहीं, मामले की संवेदनशीलता और गंभीरता को देखते हुए राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन ने भी सरकार को निर्देश जारी किए कि हल्द्वानी में घटित इस पूरे घटनाक्रम की गहन जांच रिपोर्ट तैयार की जाए और संसद को सूचित किया जाए, क्योंकि नेता प्रतिपक्ष का अपमान पूरे देश के गरिमापूर्ण ढांचे का अपमान है।
उत्तराखंड 2027 चुनाव पर असर और देशभर में कांग्रेस के ‘सत्याग्रह’ का रोडमैप
उत्तराखंड में साल 2027 की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिहाज से इस घटना ने राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह से गरमा दिया है। हल्द्वानी और समूचा कुमाऊं मंडल ऐतिहासिक रूप से राज्य की राजनीति का एक अहम केंद्र रहा है। कांग्रेस पार्टी अब इस मुद्दे को राज्य स्तर पर बीजेपी के खिलाफ एक बड़े नैतिक और सामाजिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की रणनीति बना रही है।
कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने इस अपमानजनक घटना के विरोध में देश के हर राज्य के मुख्यालयों और जिला स्तरों पर एक विशाल ‘सत्याग्रह आंदोलन’ चलाने का फैसला किया है। इस सत्याग्रह के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ता गांधी प्रतिमाओं के समक्ष बैठकर धरने देंगे, रैलियां निकालेंगे और जनता के बीच जाकर बीजेपी की विचारधारा को बेनकाब करेंगे। पूर्व केंद्रीय मंत्रियों और महिला कांग्रेस की इकाइयों ने भी इस सत्याग्रह में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने की घोषणा की है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ‘शुद्धिकरण’ विवाद ने आगामी चुनाव से काफी पहले ही उत्तराखंड में बीजेपी के लिए एक रक्षात्मक स्थिति पैदा कर दी है, जबकि कांग्रेस इस बहाने अपने पारंपरिक और सामाजिक वोट बैंक को एकजुट करने की पुरजोर कोशिश कर रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार द्वारा दिए गए जांच के आदेशों के बाद इस मामले में क्या कार्रवाई होती है और कांग्रेस का यह सत्याग्रह देश की राजनीति को किस दिशा में मोड़ता है।
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