नई दिल्ली: हिंदू धर्म में चैत्र मास की अष्टमी तिथि को ‘शीतला अष्टमी’ या ‘बसोड़ा’ के रूप में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। साल 2026 में यह पावन पर्व 11 मार्च, बुधवार को मनाया जाएगा। इस दिन माताएं शीतला माता की पूजा करती हैं और अपने बच्चों के माथे पर विशेष रूप से हल्दी का टीका लगाती हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस दिन लाल रोली का प्रयोग क्यों नहीं किया जाता? आइए, अमर उजाला की इस रिपोर्ट में जानते हैं इसके पीछे के गहरे धार्मिक और स्वास्थ्य संबंधी कारण।
शीतला माता का शीतल स्वरूप और रोली का परहेज
माता शीतला को ठंडक और आरोग्य की देवी माना जाता है। वे चेचक (Chickenpox), खसरा और त्वचा संबंधी रोगों की अधिष्ठात्री देवी हैं।
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गर्म तासीर से परहेज: रोली लाल रंग की होती है और इसमें चूने का अंश होने के कारण इसकी प्रकृति ‘गर्म’ मानी जाती है।
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शीतलता का सम्मान: चूंकि माता शीतला का स्वरूप अत्यंत शीतल है, इसलिए उनकी पूजा में किसी भी ऐसी वस्तु का प्रयोग वर्जित है जो शरीर में गर्मी पैदा करे। मान्यता है कि इस दिन रोली लगाने से बच्चे के शरीर में पित्त या गर्मी बढ़ सकती है, जो रोगों को न्योता देती है।
हल्दी का टीका ही क्यों? जानें धार्मिक कारण
धार्मिक दृष्टि से हल्दी को पवित्रता, सौभाग्य और शुद्धिकरण का प्रतीक माना गया है।
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नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा: बच्चों के माथे पर हल्दी का टीका लगाने से बुरी नजर, नकारात्मक शक्तियां और ग्रहों के अशुभ प्रभाव दूर रहते हैं।
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माता की कृपा: हल्दी शीतला माता को अत्यंत प्रिय है। इसे लगाने से बच्चे का मन शांत रहता है और एकाग्रता बढ़ती है।
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स्वास्तिक का महत्व: इस दिन घर की चौखट पर हल्दी से सात स्वास्तिक बनाने की भी परंपरा है, जिससे घर में सुख-शांति बनी रहती है।
वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
हमारे पूर्वजों ने इस परंपरा को आयुर्वेद के साथ बहुत खूबसूरती से जोड़ा है:
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प्राकृतिक एंटीसेप्टिक: हल्दी में ‘करक्यूमिन’ होता है, जो एक शक्तिशाली एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीसेप्टिक है। बसंत ऋतु के बाद जब संक्रामक रोगों (जैसे चेचक) का खतरा बढ़ता है, तब हल्दी का औषधीय प्रभाव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है।
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त्वचा की सुरक्षा: यह टीका त्वचा रोगों से बचाव करता है और शरीर की उष्णता को नियंत्रित कर शीतलता प्रदान करता है।
कैसे करें हल्दी से विशेष पूजा?
शीतला अष्टमी पर इन सरल चरणों से आप पूजा कर सकते हैं:
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पूजा की थाली में पिसी हुई हल्दी और चंदन रखें।
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माता शीतला को पहले हल्दी अर्पित करें, फिर उसी हल्दी से बच्चों को तिलक लगाएं।
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एक कोरे कागज पर हल्दी से 7 स्वास्तिक बनाएं और उसे घर के मुख्य द्वार पर लगाएं।
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माता को ठंडे बासी पकवानों (बसोड़ा) का भोग लगाएं।
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