Supreme Court Decision: कर्मचारियों के लिए बड़ी खबर! मुआवजे में देरी हुई तो मालिक को अपनी जेब से भरनी होगी पेनल्टी; बीमा कंपनी नहीं होगी जिम्मेदार

नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारी हितों की रक्षा के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम (Employee’s Compensation Act) के तहत यदि किसी कर्मचारी को मुआवजे के भुगतान में देरी होती है, तो उस पर लगने वाली भारी पेनल्टी (जुर्माना) सीधे एम्प्लॉयर (मालिक) को ही चुकानी होगी। भले ही उस वाहन या कार्यस्थल का बीमा (Insurance) हो, बीमा कंपनी इस देरी के जुर्माने के लिए उत्तरदायी नहीं होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने पलटा दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी बी वराले की बेंच ने यह फैसला ‘न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी’ द्वारा दायर एक याचिका पर सुनाया। दरअसल, दिल्ली हाई कोर्ट ने पहले आदेश दिया था कि देरी की पेनल्टी भी बीमा कंपनी को ही भरनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यह एक सामाजिक कल्याण कानून (Social Welfare Law) है और इसकी व्याख्या हमेशा कर्मचारियों के हक में उदार तरीके से की जानी चाहिए।

क्या था पूरा मामला?

यह विवाद फरवरी 2017 की एक दुर्घटना से जुड़ा है, जिसमें एक कर्मचारी की अपने मालिक का वाहन चलाते समय मौत हो गई थी। पीड़ित परिवार को समय पर मुआवजा नहीं मिला, जिसके बाद उन्होंने लेबर कमिश्नर का दरवाजा खटखटाया।

  • कमिश्नर का फैसला: लेबर कमिश्नर ने 7.36 लाख रुपये का मुआवजा तय किया।

  • ब्याज और पेनल्टी: देरी के कारण इस रकम पर 12 फीसदी ब्याज और 35 फीसदी पेनल्टी भी लगाई गई।

    चूंकि वाहन का बीमा था, इसलिए मुआवजे की मूल राशि तो बीमा कंपनी ने दे दी, लेकिन पेनल्टी को लेकर कानूनी लड़ाई छिड़ गई कि इसे मालिक भरेगा या बीमा कंपनी।

1995 के कानून में बदलाव का दिया हवाला

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में 1995 में हुए कानूनी संशोधनों का जिक्र किया। कोर्ट ने बताया कि पहले बीमा कंपनियों पर अनावश्यक बोझ पड़ता था, क्योंकि पेनल्टी भी उनके खाते से जाती थी।

  • मालिकों की लापरवाही: पहले एम्प्लॉयर मुआवजे में देरी की परवाह नहीं करते थे क्योंकि उन्हें पता था कि पेनल्टी का पैसा भी बीमा कंपनी ही देगी।

  • नया नियम: अब सेक्शन 4A(3)(b) के तहत पेनल्टी की जिम्मेदारी पूरी तरह एम्प्लॉयर की है। इसका मकसद मालिकों पर दबाव बनाना है ताकि वे एक महीने की तय समय सीमा के भीतर कर्मचारी या उसके परिवार को सहायता राशि प्रदान करें।

कर्मचारियों के परिवारों को मिलेगी राहत

अदालत ने जोर देकर कहा कि दुर्घटना होने पर कर्मचारी या उसके परिवार को तत्काल आर्थिक मदद की जरूरत होती है। यदि मालिक मुआवजे में देरी करता है, तो उसे इसका दंड भुगतना होगा। इस फैसले से उन हजारों परिवारों को संबल मिलेगा जो वर्षों तक मुआवजे के लिए अदालतों और दफ्तरों के चक्कर काटते रहते हैं। अब मालिकों को अपनी जेब ढीली होने के डर से समय पर भुगतान करना होगा।

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