भारतीय सेना की सबसे घातक यूनिट IBG चीन सीमा पर तैनात! पूरा हुआ देश के पहले CDS जनरल बिपिन रावत का सपना

भारतीय सेना ने ड्रैगन (चीन) को सीमा पर करारा जवाब देने के लिए अपनी सबसे घातक और आधुनिक लड़ाकू यूनिट ‘इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप’ (IBG) को वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर ऑपरेशनल एरिया में तैनात कर दिया है। इसे सेना की सबसे नई माउंटेन स्ट्राइक कोर के तहत खड़ा किया गया है, जिसे ‘ब्रह्मास्त्र कोर’ के नाम से भी जाना जाता है। इस रणनीतिक तैनाती के साथ ही देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) दिवंगत जनरल बिपिन रावत का वह बड़ा सपना आखिरकार सच हो गया है, जिसकी योजना उन्होंने साल 2019 में बनाई थी।

क्या होता है आईबीजी (IBG) और यह पारंपरिक कोर से अलग क्यों है?

सामान्य तौर पर सेना की ‘स्ट्राइक कोर’ युद्ध के समय दुश्मन की सीमा में घुसकर हमला करने के लिए जानी जाती हैं, जबकि अन्य कोर डिफेंसिव रोल निभाती हैं। लेकिन शांति-काल में ये स्ट्राइक कोर बॉर्डर से काफी दूर तैनात रहती हैं, जिससे युद्ध जैसी आपातकालीन स्थिति में इन्हें सीमा तक पहुंचने में लंबा वक्त लग जाता है।

इसी कमी को दूर करने के लिए जनरल रावत ने आईबीजी का ढांचा तैयार किया था:

  • छोटा और घातक स्वरूप: आईबीजी सेना की एक पारंपरिक ब्रिगेड से थोड़ी बड़ी फॉर्मेशन होती है, जो आकार में छोटी होने के कारण बेहद गतिशील (Mobile) होती है।

  • ऑल-इन-वन कॉम्बैट यूनिट: इसमें इंफैन्ट्री (पैदल सेना) के साथ-साथ टैंक, तोपखाना (आर्टिलरी), आर्मी एविएशन के अटैक हेलीकॉप्टर और एयर-डिफेंस सिस्टम एक साथ शामिल होते हैं।

  • अपने इसी कॉम्पैक्ट स्वरूप के कारण आईबीजी बिना वक्त गंवाए पल भर में दुश्मन के खिलाफ मोर्चा संभालने के लिए सीधे बॉर्डर पर तैनात रहती है।

कहां है आईबीजी का हेडक्वार्टर और क्या है इसका जिम्मा?

इस घातक इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप (IBG) का मुख्य हेडक्वार्टर पश्चिम बंगाल के पानागढ़ में स्थापित किया गया है। इसका एरिया ऑफ रिस्पॉन्सिबिलिटी (AOR) उत्तर-पूर्व से सटी पूरी चीन सीमा (LAC) है। सेना ने शुरुआत में इस माउंटेन स्ट्राइक कोर के तहत कुल 5 आईबीजी को तैयार किया है। हालांकि सेना की ऑपरेशनल तैनाती बेहद क्लासीफाइड (गोपनीय) होती है, इसलिए इनकी सटीक लोकेशन सार्वजनिक नहीं की जा सकती, लेकिन ये सभी चीन सीमा के संवेदनशील ऑपरेशनल इलाकों में पूरी तरह तैनात हो चुकी हैं।

डोकलाम विवाद और गलवान झड़प के बाद महसूस हुई थी जरूरत

साल 2017 में जब चीनी सेना (PLA) ने सिक्किम से सटे डोकलाम में घुसपैठ की कोशिश की थी, तब भारतीय सेना ने बेहद मुस्तैदी से 72 दिनों तक चीनी सैनिकों को आगे बढ़ने से रोके रखा था। इसके बाद साल 2020 में गलवान घाटी की हिंसक झड़प के दौरान भी भारत को अपनी पूरी एक भारी-भरकम स्ट्राइक कोर को एलएसी पर एयरलिफ्ट कर तैनात करना पड़ा था। इन अनुभवों के बाद ही जनरल बिपिन रावत ने चीनी सेना की ‘सलामी-स्लाइसिंग’ (धीरे-धीरे जमीन हड़पने की नीति) को हमेशा के लिए दफन करने के लिए आईबीजी की वकालत की थी। दिसंबर 2021 में एक दुखद हेलीकॉप्टर क्रैश में जनरल रावत के शहीद होने के बाद भी सेना ने इस बेहद महत्वपूर्ण प्लान को ठंडे बस्ते में नहीं जाने दिया।

ब्यूरोक्रेसी का अड़ंगा और सेना का कड़ा रुख: क्यों लगे बनने में 7 साल?

सेना के इस मूलभूत और ऐतिहासिक पुनर्गठन (Re-structuring) को अमलीजामा पहनाने में पूरे 7 साल का लंबा वक्त लग गया। दरअसल, सेना के ढांचे में इतने बड़े बदलाव के लिए नए अधिकारियों की नियुक्ति और भारी-भरकम फंड की जरूरत होती है, जिसके चलते सरकारी ब्यूरोक्रेसी (नौकरशाही) की तरफ से इस फाइल को आगे बढ़ाने में काफी अड़ंगा लगाया गया था।

हालाँकि, हाल ही में रिटायर हुए तत्कालीन थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने जब इस प्रशासनिक ढिलाई को लेकर सार्वजनिक तौर पर अपनी कड़ी नाराजगी जाहिर की, तब जाकर सरकार ने तुरंत इस री-स्ट्रक्चरिंग की अंतिम मंजूरी दी। चीन सीमा पर इस ट्रायल के सफल रहने के बाद भारतीय सेना इसी तर्ज पर पाकिस्तान बॉर्डर पर भी आईबीजी तैनात करने की तैयारी कर रही है।

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