
पश्चिम एशिया का कूटनीतिक और रणनीतिक परिदृश्य एक बार फिर बेहद संवेदनशील मोड़ पर आ गया है। तेहरान और रियाद के बीच लंबे समय से जारी छद्म युद्ध और कूटनीतिक रस्साकशी के बीच ईरान की ओर से आया ताजा बयान वैश्विक मीडिया और सैन्य विश्लेषकों के बीच चर्चा का केंद्र बन गया है। ईरान के शीर्ष सुरक्षा तंत्र और राजनीतिक नेतृत्व ने सऊदी अरब को स्पष्ट शब्दों में आगाह किया है कि इस्लामाबाद और अंकारा के साथ किए गए उसके सुरक्षा समझौते महज कागजी दस्तावेज हैं, जो जमीनी संघर्ष की स्थिति में रियाद की रक्षा करने में पूरी तरह असमर्थ साबित होंगे।
ईरान का यह बयान ऐसे समय में आया है जब सऊदी अरब अपनी पारंपरिक अमेरिकी सुरक्षा निर्भरता को कम करते हुए क्षेत्रीय मुस्लिम शक्तियों—विशेष रूप से परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान और उन्नत ड्रोन व सैन्य तकनीक वाले तुर्की—के साथ बहुस्तरीय रक्षा समझौते बढ़ा रहा है। तेहरान ने इस कदम को अपने खिलाफ एक नया गुट बनाने की कोशिश के रूप में देखा है और बेहद आक्रामक अंदाज में जवाब दिया है।
मध्य पूर्व की सियासत में नया भूचाल: ईरान का कड़ा रुख
पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता के बीच ईरान के इस कड़े रुख ने रणनीतिक विशेषज्ञों को चौंका दिया है। तेहरान ने बेहद स्पष्ट लहजे में कहा है कि खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा केवल क्षेत्रीय देशों के आपसी सहयोग से ही संभव है, न कि बाहरी ताकतों या दूर-दराज के देशों के साथ किए गए सैन्य समझौतों से। ईरान के विश्लेषकों का मानना है कि सऊदी अरब द्वारा पाकिस्तान के सैन्य बल और तुर्की की आधुनिक तकनीक का सहारा लेने की नीति एक ऐसा सुरक्षा भ्रम पैदा कर रही है जो संकट के समय ध्वस्त हो जाएगा।
ईरानी रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि तुर्की और पाकिस्तान दोनों ही अपनी घरेलू आर्थिक और राजनीतिक प्राथमिकताओं से बंधे हुए हैं। ऐसे में यदि खाड़ी क्षेत्र में कोई प्रत्यक्ष संघर्ष भड़कता है, तो ये देश अपनी सेनाओं को किसी दूसरे देश की संप्रभुता बचाने के लिए ईरान जैसे मजबूत प्रतिद्वंद्वी के सामने झोंकने का जोखिम कभी नहीं उठाएंगे। ईरान का यह संदेश सीधे तौर पर रियाद के राजघरानों के लिए एक रणनीतिक चेतावनी माना जा रहा है।
पाकिस्तान और तुर्की का ‘सुरक्षा कवच’: हकीकत या कागजी भ्रम?
सऊदी अरब पिछले कुछ वर्षों से अपनी सैन्य क्षमताओं के विविधीकरण (Diversification) पर तेजी से काम कर रहा है। पाकिस्तान के साथ रियाद के ऐतिहासिक और गहरे सैन्य संबंध रहे हैं, जिसके तहत पाकिस्तानी सेना के प्रशिक्षित जवान सऊदी अरब में तैनात रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, तुर्की के साथ हाल के वर्षों में रक्षा क्षेत्र में हुए समझौतों ने रियाद को बेयरकतार (Bayraktar) जैसे अत्याधुनिक ड्रोन और उन्नत मिसाइल सिस्टम तक पहुंच प्रदान की है।
हालांकि, ईरान का तर्क है कि ये तमाम समझौते केवल वित्तीय लेनदेन और कागजी प्रतिबद्धताओं तक सीमित हैं। तेहरान का मानना है कि तुर्की खुद नाटो का सदस्य है और उसकी अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं सीरिया से लेकर अज़रबैजान तक फैली हुई हैं। वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान भारी आर्थिक संकट और आंतरिक आतंकवाद से जूझ रहा है। ऐसी स्थिति में ईरान की आधुनिक बैलिस्टिक मिसाइल तकनीक, हाइपरसोनिक हथियारों और क्षेत्रीय नेटवर्क (एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस) के सामने ये त्रिपक्षीय गठबंधन टिक नहीं पाएगा।
ईरान की मिसाइल ताकत और क्षेत्रीय कूटनीति का गणित
ईरान ने हाल के वर्षों में आत्मनिर्भर सैन्य तकनीक पर अभूतपूर्व काम किया है। उसकी सटीक निशाना साधने वाली बैलिस्टिक मिसाइलें, कम लागत वाले आत्मघाती ड्रोन और अंडरग्राउंड ‘मिसाइल सिटीज’ ने खाड़ी क्षेत्र में शक्ति संतुलन को बदल दिया है। ईरान का दावा है कि उसके पास ऐसे हथियार मौजूद हैं जो किसी भी रक्षा प्रणाली को भेदकर खाड़ी के महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर और तेल शोधन कारखानों को मिनटों में तबाह कर सकते हैं।
तेहरान का यह भी मानना है कि सऊदी अरब अपनी सुरक्षा चिंताओं के समाधान के लिए गलत दिशा में कदम बढ़ा रहा है। चीन की मध्यस्थता में रियाद और तेहरान के बीच हुए ऐतिहासिक समझौते के बाद उम्मीद जताई जा रही थी कि दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार होगा, लेकिन सऊदी अरब द्वारा तुर्की और पाकिस्तान के साथ गुपचुप सैन्य वार्ताओं ने ईरान के संदेह को फिर से बढ़ा दिया है। ईरान का स्पष्ट कहना है कि यदि रियाद अपनी जमीन का इस्तेमाल तेहरान के खिलाफ किसी रणनीति के लिए होने देता है, तो उसे इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।
खाड़ी देशों में शक्ति का संतुलन और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर
इस भू-राजनीतिक खींचतान का सीधा असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। पारस की खाड़ी और होर्मुज की जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक हैं। यदि ईरान और सऊदी अरब के बीच तनाव बढ़ता है, तो कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में भारी उछाल आना तय है, जिससे भारत सहित दुनिया भर के विकसित और विकासशील देशों में महंगाई का संकट गहरा सकता है।
अंतर्राष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि ईरान का यह रुख सऊदी अरब पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की एक सोची-समझी रणनीति है। तेहरान चाहता है कि रियाद अपनी विदेश और रक्षा नीति में ईरान के हितों का ध्यान रखे और ऐसा कोई भी नया गुट बनाने से बचे जो तेहरान की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बने। दूसरी तरफ, सऊदी अरब अपनी सुरक्षा को किसी एक देश या शक्ति के भरोसे छोड़ने का जोखिम नहीं उठाना चाहता, जिसके कारण वह बहुपक्षीय गठबंधन बनाने में जुटा हुआ है।
कूटनीतिक गलियारों में हलचल: आगे क्या होगा?
ईरान के इस आक्रामक बयान के बाद इस्लामाबाद, अंकारा और रियाद के कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। हालांकि अभी तक सऊदी अरब की ओर से आधिकारिक तौर पर ईरान के इस बयान पर कोई तीखी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन माना जा रहा है कि बैकचैनल डिप्लोमेसी के जरिए इस तनाव को शांत करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया की राजनीति अब एक नए चौराहे पर खड़ी है। एक तरफ जहां पारंपरिक गठजोड़ कमजोर हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ नए क्षेत्रीय समीकरण बन रहे हैं। ईरान की यह सीधी धमकी यह साफ करती है कि वह क्षेत्र में किसी भी तीसरी शक्ति या बहुराष्ट्रीय सैन्य गठबंधन की मौजूदगी को सहने के मूड में नहीं है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि सऊदी अरब अपने इन रक्षा समझौतों को किस दिशा में ले जाता है और क्या तेहरान तथा रियाद के बीच जारी वार्ता का सिलसिला इस तनाव को कम करने में सफल हो पाता है या नहीं।
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