त्रिकूट पर्वत पर 600 फीट ऊपर विराजीं ‘अल्हा की आराध्य’, आज भी अनसुलझा है यहां का सबसे बड़ा रहस्य…

मैहर। मध्य प्रदेश के नवनिर्मित जिले मैहर की पहचान सिर्फ इसके नाम से नहीं, बल्कि त्रिकूट पर्वत पर विराजमान ‘मां शारदा’ के प्रताप से है। लगभग 600 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस दिव्य मंदिर की ख्याति पूरी दुनिया में फैली हुई है। विंध्य पर्वत श्रृंखलाओं के बीच बसा यह शक्तिपीठ न केवल अपनी धार्मिक दिव्यता के लिए जाना जाता है, बल्कि एक ऐसे अनसुलझे रहस्य को अपने भीतर समेटे हुए है जिसे विज्ञान और आधुनिक तर्क आज तक नहीं सुलझा पाए हैं।

त्रिकूट पर्वत पर मां का वास: 1063 सीढ़ियों का सफर

ऊंचे पहाड़ की चोटी पर स्थित मां शारदा का यह मंदिर भक्तों की आस्था का बड़ा केंद्र है। मंदिर तक पहुँचने के लिए श्रद्धालुओं को 1063 सीढ़ियों की कठिन चढ़ाई पूरी करनी होती है, हालांकि अब रोपवे की सुविधा ने इसे सुगम बना दिया है। मंदिर की ऊंचाई से दिखने वाला विहंगम नजारा और चारों ओर फैली हरियाली भक्तों को एक अलग ही रूहानी सुकून का अहसास कराती है। मान्यता है कि यहां मां के दर्शन मात्र से भक्तों की सूनी गोद भर जाती है और सभी संकटों का नाश होता है।

आज भी रात में आते हैं ‘आल्हा और उदल’: विज्ञान के पास नहीं जवाब

मैहर मंदिर से जुड़ा सबसे बड़ा और रोमांचक रहस्य अमर सेनानी ‘आल्हा और उदल’ से जुड़ा है। स्थानीय मान्यताओं और पुजारियों के अनुसार, जब रात में मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और वहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता, तब भी सुबह कपाट खुलने पर मां के चरणों में ताजे फूल और पूजन सामग्री चढ़ी हुई मिलती है। कहा जाता है कि आज भी मां के परम भक्त आल्हा सबसे पहले आकर मां की पूजा करते हैं। सदियों से चले आ रहे इस दावे की पुष्टि के लिए कई बार कोशिशें हुईं, लेकिन रहस्य आज भी बरकरार है।

शक्तिपीठ की महिमा: जहां गिरा था सती का हार

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, मैहर को 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। कहा जाता है कि जब भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से खंडित होकर माता का ‘हार’ (Maihar = Mai+Har) इसी स्थान पर गिरा था। यही कारण है कि इस स्थान का नाम ‘मैहर’ पड़ा। शारदीय और चैत्र नवरात्रि के दौरान यहां लाखों की संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं, और मंदिर परिसर ‘जय माता दी’ के जयकारों से गुंजायमान रहता है।

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