15 साल से संविदा पर कार्यरत शिक्षकों के नियमितीकरण की क्या है योजना? हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से मांगा जवाब, 8 सितंबर को होगी अगली सुनवाई

उत्तर प्रदेश में पिछले डेढ़ दशक से अधिक समय से संविदा के आधार पर अपनी सेवाएं दे रहे हजारों शिक्षकों के भविष्य और नियमितीकरण को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक बेहद कड़ा और महत्वपूर्ण रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से स्पष्ट रूप से पूछा है कि 15 साल या उससे अधिक समय से संविदा पर कार्यरत शिक्षकों को पक्का (नियमित) करने के लिए सरकार के पास क्या कोई ठोस नीति या योजना है।

यह मामला केवल एक शिक्षिका की नौकरी तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश के विभिन्न सरकारी और अर्द्ध-सरकारी विद्यालयों में वर्षों से अल्प मानदेय पर काम कर रहे हजारों संविदा शिक्षकों की आजीविका और भविष्य से जुड़ा हुआ है। न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकल पीठ ने अमेठी जिले के कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय (KGBV) में तैनात एक संविदा शिक्षिका की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया है।

15 साल की लंबी सेवा के बाद शिक्षकों को बेसहारा नहीं छोड़ सकती सरकार: हाईकोर्ट

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि समाज में शिक्षक को ‘राष्ट्र निर्माता’ का दर्जा दिया जाता है। ऐसे में यदि कोई शिक्षक 15-16 वर्षों तक निष्ठापूर्वक अपनी सेवाएं देता है, तो राज्य सरकार का यह कर्तव्य बनता है कि वह उसके भविष्य को लेकर संवेदनशील और न्यायसंगत नीति अपनाए। अदालत ने कहा कि इतनी लंबी सेवा के बाद किसी शिक्षक को अचानक बिना किसी ठोस कारण या व्यक्तिगत आरोप के नौकरी से हटा देना और उसे बेसहारा छोड़ देना पूरी तरह से अनुचित है।

यह पूरा विवाद अमेठी जिले के कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय में कार्यरत संविदा शिक्षिका अर्चना बूध की याचिका से शुरू हुआ। याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता सक्षम अग्रवाल ने कोर्ट को बताया कि याची 16 जनवरी 2010 से उक्त विद्यालय में लगातार शिक्षिका के रूप में अपनी सेवाएं दे रही थीं। पिछले 16 वर्षों से हर साल उनकी संविदा का नवीनीकरण (Contract Renewal) किया जाता रहा। हालांकि, 16 जून 2026 को बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा एक आदेश जारी कर उनकी संविदा का नवीनीकरण करने से मना कर दिया गया।

अधिवक्ता ने अदालत के सामने तर्क रखा कि शिक्षिका की उम्र अब लगभग 39 वर्ष हो चुकी है। इस उम्र में वे किसी भी नई सरकारी या गैर-सरकारी शिक्षक भर्ती के लिए आवेदन करने की अधिकतम आयु सीमा को पार कर चुकी हैं। ऐसे में इतने सालों की समर्पित सेवा के बाद अचानक संविदा समाप्त कर देने से उनके सामने और उनके परिवार के सामने जीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए यह भी पाया कि शिक्षिका के खिलाफ न तो कार्यप्रणाली को लेकर कोई शिकायत थी और न ही कोई व्यक्तिगत आरोप या अनुशासनात्मक कार्रवाई का मामला था।

शिक्षिका को बड़ी राहत देते हुए न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की पीठ ने 16 जून 2026 के उस विभागीय आदेश के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी, जिसके तहत संविदा नवीनीकरण से इनकार किया गया था। इसके साथ ही कोर्ट ने निर्देश दिया कि शिक्षिका को उनके पद पर संविदा के आधार पर कार्य जारी रखने दिया जाए और उनका वेतन न रोका जाए।

इसके साथ ही, मामले की व्यापकता को देखते हुए हाईकोर्ट ने बेसिक शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव को अपना व्यक्तिगत हलफनामा (Personal Affidavit) दाखिल करने का निर्देश दिया है। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि 15 वर्ष या उससे अधिक समय से सेवा दे रहे संविदा शिक्षकों के नियमितीकरण और सेवा सुरक्षा के लिए राज्य स्तर पर क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

अदालत ने इस बड़े नीतिगत मामले पर अगली सुनवाई के लिए 8 सितंबर 2026 की तारीख तय की है, जो कि 5 सितंबर को मनाए जाने वाले शिक्षक दिवस के ठीक तीन दिन बाद है। 8 सितंबर को होने वाली यह सुनवाई उत्तर प्रदेश के हजारों संविदा शिक्षकों के भविष्य की दिशा तय करने में बेहद निर्णायक साबित हो सकती है।

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