
शारदीय नवरात्रि का महापर्व अपने अंतिम और सबसे ऊर्जावान पड़ाव पर पहुंच चुका है। नौ दिनों तक चलने वाली आदिशक्ति मां भगवती की उपासना में अष्टमी और नवमी तिथि का स्थान सर्वोपरि माना गया है। धर्म शास्त्रों और दुर्गा सप्तशती के अनुसार, महाअष्टमी के दिन मां महागौरी और महानवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की साधना से साधक को संपूर्ण ब्रह्मांडीय ऊर्जा और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। यह वह समय होता है जब देवी शक्ति का प्रभाव पृथ्वी तत्व पर सबसे प्रखर होता है। इस पवित्र काल में यदि कोई साधक पूरे विधि-विधान से मां दुर्गा के बत्तीस दिव्य नामों (दुर्गा द्वात्रिंशन्नाममाला) का जप करता है, तो उसके जीवन के बड़े से बड़े संकट, भय, कर्ज, असाध्य रोग और अज्ञात बाधाएं तत्काल शांत हो जाती हैं।
क्या है मां दुर्गा के 32 नामों का पौराणिक रहस्य और महिमा
देवी पुराण और मार्कंडेय पुराण के अंतर्गत आने वाले इस गुप्त स्तोत्र को ‘दुर्गा द्वात्रिंशन्नाममाला’ के नाम से जाना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब देवताओं पर घोर विपत्ति आई थी और महिषासुर जैसे महाबलशाली असुरों के अत्याचार से तीनों लोक कांप उठे थे, तब स्वयं भगवान शिव और सभी देवताओं ने आदिशक्ति की कृपा पाने के लिए इन 32 नामों का संकीर्तन किया था। मां जगदंबा ने प्रसन्न होकर देवताओं को यह वरदान दिया था कि जो भी मनुष्य कठिन से कठिन विपत्ति, शत्रु भय, घोर दरिद्रता या राज्य संकट में इन 32 नामों का नियमित या संकटकाल में पाठ करेगा, उसके समस्त अमंगलों का नाश होगा और उसे जीवन में कभी पराजय का मुख नहीं देखना पड़ेगा।
दुर्गा द्वात्रिंशन्नाममाला: मां दुर्गा के 32 पवित्र नाम
नवरात्रि की अष्टमी और नवमी के पावन दिन लाल चंदन, रुद्राक्ष या कमलगट्टे की माला से इन 32 नामों का शांत चित्त होकर उच्चारण करना चाहिए:
-
दुर्गा
-
दुर्गातिशमनी
-
दुर्गापद्धिनिवारिणी
-
दुर्गमच्छेदिनी
-
दुर्गसाधिनी
-
दुर्गनाशिनी
-
दुर्गतोद्धारिणी
-
दुर्गनिहन्त्री
-
दुर्गमापहा
-
दुर्गमज्ञानदा
-
दुर्गदैत्यलोकदवानला
-
दुर्गमा
-
दुर्गमालोका
-
दुर्गमात्मस्वरुपिणी
-
दुर्गमार्गप्रदा
-
दुर्गमविद्या
-
दुर्गमाश्रिता
-
दुर्गमज्ञानसंस्थाना
-
दुर्गमध्यानभासिनी
-
दुर्गमोहा
-
दुर्गमगा
-
दुर्गमार्थस्वरूपिणी
-
दुर्गमासुरसंहन्त्री
-
दुर्गमायुधधारिणी
-
दुर्गमांगी
-
दुर्गमता
-
दुर्गम्या
-
दुर्गमेश्वरी
-
दुर्गभीमा
-
दुर्गभामा
-
दुर्गभोभा
-
दुर्गोद्धारिणी
अष्टमी और नवमी पर जप करने की सही शास्त्रीय विधि
इस नामावली का संपूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए शुद्धता और सही दिशा का ध्यान रखना अनिवार्य है। अष्टमी या नवमी के दिन प्रातः काल स्नान कर लाल या पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के पूजा स्थल में पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊन के लाल आसन पर बैठें। मां दुर्गा की प्रतिमा या यंत्र के समक्ष शुद्ध देसी घी का दीपक प्रज्वलित करें। माता को लाल गुड़हल का पुष्प, रोली, अक्षत, धूप और नैवेद्य (खीर, हलवा या बताशा) अर्पित करें। आचमन कर हाथ में जल लेकर अपनी मनोकामना का संकल्प लें और फिर पूरी श्रद्धा के साथ कम से कम 11, 21 या 108 बार इन 32 नामों का पाठ करें। पाठ समाप्त होने के बाद कर्पूर से आरती करें और क्षमा याचना अवश्य करें।
किस मनोकामना के लिए कैसे करें इन नामों का प्रयोग
ज्योतिष और तंत्र शास्त्रों में इन 32 नामों के अलग-अलग अनुष्ठानों का विशेष फल बताया गया है। यदि घर में निरंतर कलह, आर्थिक तंगी या भारी कर्ज की समस्या बनी हुई है, तो अष्टमी की रात्रि को 108 बार इस नामावली का पाठ कर देवी को मखाने की खीर का भोग लगाना अत्यंत शुभकारी माना जाता है। किसी गंभीर बीमारी या दुर्घटना के योग से मुक्ति पाने के लिए नवमी के दिन हवन करते समय इन 32 नामों के साथ आहुतियां दी जाती हैं। जिन युवक-युवतियों के विवाह या करियर में लंबे समय से अड़चनें आ रही हैं, वे अष्टमी और नवमी दोनों दिन कन्या पूजन के पूर्व इस पाठ को संपन्न करें, जिससे मां सिद्धिदात्री की कृपा से सभी रुके हुए कार्य निर्विघ्न पूरे हो जाते हैं।
कन्या पूजन और हवन के साथ पाठ का समापन
महाअष्टमी और महानवमी की पूजा बिना कन्या पूजन और हवन के पूर्ण नहीं मानी जाती। जो साधक इस नामावली का पाठ करें, वे पाठ के समापन पर नौ कन्याओं और एक छोटे बटुक को आमंत्रित कर उनके चरण धोएं और उन्हें हलवा-पूरी, काले चने का सात्विक प्रसाद खिलाएं। कन्याओं को उपहार और दक्षिणा देकर उनका चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें। ऐसा विश्वास है कि नवरात्रि की संधि बेला में निष्कपट भाव से किया गया यह 32 नामावली का पाठ मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पापों को धोकर उसके घर में सुख, शांति, समृद्धि और अखंड ऐश्वर्य की स्थापना करता है।
Shashwat Lokwarta – State News,Up News देश-दुनिया