नवरात्रि में नवमी व्रत 19 या 20 अक्टूबर कब रखना रहेगा उत्तम? पंचांग और उदयातिथि के अनुसार पंडित जी से जानिए सटीक तारीख और कन्या पूजन का शुभ मुहूर्त

शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व में मां भगवती के नौ स्वरूपों की उपासना के बाद अंतिम दिन महानवमी का व्रत और पूजन अत्यंत फलदायी माना जाता है। इस बार नवमी तिथि के प्रारंभ और समापन समय को लेकर भक्तों के बीच यह भ्रम की स्थिति बन रही है कि नवमी का व्रत 19 अक्टूबर को रखा जाए या 20 अक्टूबर को। हिंदू धर्म शास्त्रों और वैदिक पंचांग के अनुसार तिथियों के घटने-बढ़ने और उदयातिथि के संयोग के कारण यह स्थिति अक्सर बनती है। ज्योतिषाचार्यों और कर्मकांडी पंडितों के अनुसार व्रत, पूजन और कन्या भोज के लिए शास्त्रों में सूर्योदयकालीन उदयातिथि और तिथि की अवधि को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।

पंचांग के अनुसार नवमी तिथि का सही समय और सटीक तारीख

काशी और मिथिला पंचांग की गणना के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि का आरंभ 19 अक्टूबर की शाम या दोपहर से होकर 20 अक्टूबर के दिन तक व्याप्त रहेगा। शास्त्रों के स्पष्ट विधान के अनुसार, जो तिथि सूर्योदय के समय विद्यमान होती है, उसी दिन उस तिथि का मुख्य पर्व मनाया जाता है। 20 अक्टूबर को सूर्योदय के समय नवमी तिथि का पूर्ण प्रभाव रहने के कारण सनातन परंपरा के अनुयायियों, गृहस्थों और साधकों के लिए 20 अक्टूबर को ही महानवमी का उपवास रखना और मां सिद्धिदात्री की आराधना करना शास्त्रसम्मत व सर्वाधिक उत्तम है। जो साधक अष्टमी और नवमी संधि काल में पूजा करते हैं, वे 19 अक्टूबर की शाम को संधि पूजन कर सकते हैं, किंतु पूर्ण नवमी व्रत और कन्या पूजन का मुख्य आयोजन 20 अक्टूबर को ही श्रेष्ठ रहेगा।

नवमी पर मां सिद्धिदात्री की पूजा और कन्या पूजन का महत्व

नवरात्रि का नौवां दिन मां सिद्धिदात्री को समर्पित होता है। मान्यता है कि इनकी विधिवत आराधना करने से भक्तों को अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा सहित सभी आठों सिद्धियों की प्राप्ति होती है और जीवन के समस्त कष्टों का निवारण होता है। नवमी तिथि के दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालु प्रातः काल स्नान-ध्यान के पश्चात मां सिद्धिदात्री का षोडशोपचार पूजन करते हैं। नवमी के पूजन में माता को हलवा, पूरी, काले चने और खीर का भोग विशेष रूप से लगाया जाता है। इसके पश्चात नौ कन्याओं और एक बटुक (भैरव रूप) को घर बुलाकर उनके चरण पखारे जाते हैं, उन्हें यह सात्विक प्रसाद खिलाया जाता है और दक्षिणा व उपहार देकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। कन्या पूजन के बिना नवरात्रि का व्रत पूर्ण नहीं माना जाता है।

महानवमी पर कन्या पूजन और हवन के लिए शुभ मुहूर्त

पंडित जी के अनुसार 20 अक्टूबर को नवमी के दिन पूजा, हवन और कन्या खिलाने के लिए कई शुभ योग बन रहे हैं। प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त से लेकर अभिजीत मुहूर्त तक का समय पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ रहेगा। सुबह 6 बजकर 25 मिनट से लेकर सुबह 8 बजकर 40 मिनट तक अमृत और शुभ चौघड़िया का समय रहेगा, जो कन्या पूजन के लिए अति उत्तम है। इसके बाद दोपहर 11 बजकर 45 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 35 मिनट के बीच अभिजीत मुहूर्त में मां दुर्गा का हवन और पूर्णाहूति करना अत्यंत शुभ फलदायी माना गया है। इस निश्चित समय अवधि में किए गए जप, तप और दान से घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।

व्रत पारण के नियम और सावधानियां

जो श्रद्धालु पूरे नौ दिनों का अखंड उपवास रखते हैं, वे नवमी के दिन हवन और कन्या पूजन संपन्न होने के बाद ही अपना व्रत खोलते हैं। शास्त्रों के अनुसार नवमी के पूजनोपरांत या फिर दशमी तिथि के आरंभ पर सात्विक अन्न ग्रहण करके पारण किया जाता है। पारण करते समय तामसिक भोजन, लहसुन, प्याज या भारी तेल-मसाले से पूरी तरह परहेज करना चाहिए। माता के भोग लगे प्रसाद को ही सबसे पहले ग्रहण कर व्रत का समापन करें। ऐसा करने से मां जगदंबा की असीम कृपा पूरे वर्ष परिवार पर बनी रहती है।

Check Also

कल इन 5 राशियों की जिंदगी में मचेगी भारी हलचल, करियर और धन के मामले में खुलेंगे नए रास्ते

वैदिक पंचांग के अनुसार 15 अक्टूबर 2026 का दिन खगोलीय दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण रहने …