आज पूरे दिन पूर्णिमा तिथि रहने पर भी कल क्यों मनाया जाएगा रक्षाबंधन? भद्रा के साए से लेकर उदयातिथि के शास्त्रीय नियम तक

भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का महापर्व रक्षाबंधन हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष तिथियों की गणना और ग्रह-नक्षत्रों के संयोग को लेकर श्रद्धालुओं के बीच भारी संशय की स्थिति बनी हुई है। पंचांग के अनुसार पूर्णिमा तिथि आज से ही प्रारंभ हो चुकी है और पूरे दिन प्रभावी रहेगी, लेकिन इसके बावजूद देश के कई हिस्सों में रक्षाबंधन का पर्व कल मनाने की सलाह दी जा रही है। आम जनमानस के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब पूर्णिमा आज पूरे दिन उपस्थित है, तो फिर रक्षा सूत्र बांधने के लिए कल का दिन क्यों चुना जा रहा है? ज्योतिष शास्त्रियों, पंचांग कर्ताओं और प्रख्यात धर्माचार्यों के अनुसार इसके पीछे दो सबसे बड़े कारण हैं—पहला आज दिनभर रहने वाला ‘भद्रा काल’ का साया और दूसरा सनातन धर्म में मान्य ‘उदयातिथि’ का अकाट्य सिद्धांत।

भद्रा का साया: शास्त्रों में क्यों वर्जित है भद्रा काल में राखी बांधना?

वैदिक ज्योतिष और धर्मग्रंथों में भद्रा को सूर्य देव की पुत्री और शनि देव की सगी बहन माना गया है। भद्रा का स्वभाव अत्यंत उग्र, संहारक और चंचल माना जाता है, इसलिए इनके प्रभाव काल में किसी भी प्रकार का मांगलिक या शुभ कार्य करना पूरी तरह निषिद्ध होता है। धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में स्पष्ट निर्देश दिया गया है: “भद्रायां द्वे न कर्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा, श्रावणी नृपतिं हन्ति ग्रामं दहति फाल्गुनी।” इसका अर्थ है कि भद्रा काल में श्रावणी (रक्षाबंधन) और फाल्गुनी (होलिका दहन) कदापि नहीं करने चाहिए। यदि भद्रा में रक्षा सूत्र बांधा जाए तो राजा और राज्य (अर्थात् भाई और उसके कुल) का अनिष्ट होता है, और फाल्गुनी करने से जन-धन की हानि होती है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, रावण की बहन शूर्पणखा ने अपने भाई रावण को भद्रा काल में ही रक्षा सूत्र बांधा था, जिसके परिणाम स्वरूप रावण के संपूर्ण साम्राज्य और कुल का विनाश हो गया था। इसी कारण जब तक भद्रा का प्रभाव रहता है, तब तक बहनें अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र नहीं बांधती हैं। आज पूर्णिमा तिथि के प्रारंभ होने के साथ ही भद्रा का अशुभ काल भी सक्रिय हो गया है, जिसने दिन के सबसे अनुकूल समय को रक्षाबंधन के लिए बाधित कर दिया है।

उदयातिथि का शास्त्रीय महत्व: सूर्योदय की तिथि क्यों मानी जाती है सर्वमान्य?

सनातन धर्म और हिंदू पंचांग में ‘उदयातिथि’ यानी सूर्योदय के समय उपस्थित तिथि को सबसे अधिक पवित्र, प्रामाणिक और मान्य माना गया है। शास्त्रों का नियम है कि जिस तिथि में सूर्योदय होता है, वह तिथि पूरे दिन के धार्मिक कृत्यों, व्रत, उपवास और त्योहारों के लिए फलदायी मानी जाती है।

पंचांग गणना के अनुसार, यद्यपि पूर्णिमा आज प्रारंभ हो चुकी है, लेकिन कल सुबह सूर्योदय के समय भी पूर्णिमा तिथि विद्यमान रहेगी। चूंकि कल सूर्योदय पूर्णिमा तिथि में ही होगा, इसलिए उदयातिथि के सिद्धांत के अनुसार कल का पूरा दिन स्वतः ही पूर्णिमा के प्रभाव से युक्त और पवित्र माना जाएगा। इसके अलावा सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि कल भद्रा का साया पूरी तरह समाप्त हो चुका होगा। प्रातः काल से ही वातावरण शुद्ध, दोषमुक्त और मांगलिक कार्यों के अनुकूल रहेगा, जिसके कारण धर्माचार्य कल उदयातिथि में पर्व मनाने को सर्वश्रेष्ठ बता रहे हैं।

पंडित जी का मत: आज रात या कल सुबह, कब राखी बांधना है सबसे उत्तम?

धर्माचार्यों और विद्वान पंडितों के अनुसार इस विषय पर दो अलग-अलग शास्त्रीय दृष्टिकोण हैं, और दोनों ही अपनी-अपनी जगह शास्त्र सम्मत हैं:

पहला मत यह है कि जो लोग आज ही रक्षाबंधन मनाना चाहते हैं, उन्हें दिन में राखी बांधने से पूरी तरह बचना होगा। आज शाम को जैसे ही भद्रा समाप्त होगी, उसके बाद प्रदोष काल में या रात्रि के शुभ चौघड़िया में रक्षा सूत्र बांधा जा सकता है। प्रदोष काल (शाम का गोधूलि समय) को भगवान शिव की कृपा का समय माना जाता है, इसलिए भद्रा समाप्ति के तुरंत बाद राखी बांधी जा सकती है।

दूसरा मत, जिसे अधिकांश पंडित और ज्योतिषाचार्य प्राथमिकता दे रहे हैं, वह यह है कि रक्षाबंधन एक सात्विक, पारिवारिक और उल्लास का महापर्व है। इसे रात्रि के अंधकार में मनाने के बजाय अगले दिन प्रातः काल के दिव्य सूर्य के प्रकाश में उदयातिथि के दौरान मनाना कहीं अधिक श्रेयस्कर और मंगलकारी होता है। रात्रि के समय कई परिवारों में बहनें या भाई यात्रा नहीं कर पाते, और पारंपरिक रूप से दिन के उजाले में पूजा-अर्चना करना श्रेष्ठ माना जाता है। इसलिए कल सुबह स्नान-ध्यान के बाद निर्विघ्न रूप से रक्षाबंधन मनाना सबसे उत्तम विकल्प है।

कल पूरे दिन रहेगा पंचक: क्या पंचक में रक्षाबंधन मनाना शास्त्र सम्मत है?

कई श्रद्धालुओं के मन में यह आशंका भी है कि कल पूरे दिन ‘पंचक’ का प्रभाव रहने वाला है, तो क्या पंचक में भाई को राखी बांधी जा सकती है? ज्योतिष शास्त्रियों ने इस भ्रम को पूरी तरह दूर किया है।

ज्योतिष में जब चंद्रमा कुंभ और मीन राशि में गोचर करता है, तो धनिष्ठा से रेवती तक के पांच नक्षत्रों को पंचक कहा जाता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार पंचक में केवल पांच विशिष्ट सांसारिक कार्यों पर प्रतिबंध होता है: दक्षिण दिशा की यात्रा करना, घर की छत डालना, नया पलंग या चारपाई बनवाना, ईंधन व घास-लकड़ी एकत्र करना और दाह संस्कार के समय विशेष शांति विधान न करना।

पंचक का रक्षाबंधन, भाई-बहन के तिलक, रक्षा सूत्र बांधने, देव पूजन या किसी भी प्रकार के पारिवारिक उत्सव से कोई नकारात्मक संबंध नहीं है। पंचक दोष रक्षाबंधन के पावन अनुष्ठान को बिल्कुल भी प्रभावित नहीं करता। इसलिए पंचक का भय मन से निकालकर कल पूरे दिन निश्चिंत भाव से रक्षाबंधन मनाया जा सकता है।

कल राखी बांधने के सबसे शुभ मुहूर्त: राहुकाल का रखें विशेष ध्यान

कल उदयातिथि में रक्षाबंधन मनाते समय केवल दिन के डेढ़ घंटे रहने वाले ‘राहुकाल’ से बचना आवश्यक है। राहुकाल को छोड़कर कल दिनभर राखी बांधने के कई अत्यंत शुभ चौघड़िया मुहूर्त उपलब्ध रहेंगे:

  • प्रातः काल का अमृत व शुभ चौघड़िया: सुबह 06:00 बजे से लेकर सुबह 09:15 बजे तक रहेगा। यह समय दिन का सबसे उत्तम और दिव्य मुहूर्त है।

  • पूर्वाह्न का लाभ चौघड़िया: सुबह 09:15 बजे से सुबह 10:30 बजे तक रहेगा।

  • दोपहर का सर्वदोषनाशक ‘अभिजीत मुहूर्त’: दोपहर 11:58 बजे से लेकर दोपहर 12:48 बजे तक रहेगा। अभिजीत मुहूर्त में किसी भी प्रकार के ग्रह दोष का प्रभाव नहीं रहता।

  • अपराह्न और गोधूलि वेला मुहूर्त: दोपहर 01:45 बजे से दोपहर 03:30 बजे तक और शाम 05:00 बजे से शाम 06:45 बजे तक रहेगा।

राखी बांधते समय इन शास्त्रीय नियमों और रक्षा मंत्र का करें पालन

रक्षाबंधन के दिन बहनों को पूजा की थाली में रोली, अक्षत (अखंडित चावल), पीला चंदन, दीपक, रक्षा सूत्र और ताजी मिठाइयां रखनी चाहिए। भाई को हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बिठाएं, क्योंकि दक्षिण दिशा की ओर मुख करके राखी बंधवाना वर्जित माना गया है।

सर्वप्रथम भाई के माथे पर रोली और चंदन का तिलक लगाएं और उस पर अक्षत लगाएं। इसके बाद भाई की दाहिनी कलाई पर तीन गांठें लगाते हुए रक्षा सूत्र बांधें। तीन गांठें त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) के आशीर्वाद का प्रतीक हैं। राखी बांधते समय बहनों को यह पौराणिक रक्षा मंत्र अवश्य बोलना चाहिए:

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥

इसके बाद घी के दीपक से भाई की आरती उतारें, मिठाई खिलाकर मुंह मीठा कराएं और भाई अपनी बहन के चरण स्पर्श कर या आशीर्वाद देकर उसकी आजीवन रक्षा का संकल्प ले तथा उपहार भेंट करे।

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