इजरायल में त्रिशंकु जनादेश के बाद सत्ता का महा-समीकरण: क्या कुर्सी बचाने के लिए धुर विरोधी गादी आइजनकोट से हाथ मिलाएंगे बेंजामिन नेतन्याहू?

इजरायल के 120 सदस्यीय संसद (नेसेट) के आम चुनावों के बाद देश एक बार फिर गंभीर राजनीतिक अनिश्चितता और गठबंधन के भारी गतिरोध के मुहाने पर आकर खड़ा हो गया है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की अगुवाई वाले दक्षिणपंथी ब्लॉक को 53 सीटें मिली हैं, जो 61 के जादुई आंकड़े से 8 सीटें कम है। वहीं दूसरी ओर पूर्व सेना प्रमुख (आईडीएफ चीफ) गादी आइजनकोट की नई पार्टी ‘यशार’ 21 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी ताकत बनकर उभरी है। किसी भी खेमे को पूर्ण बहुमत न मिलने के कारण अब यरुशलम से लेकर तेल अवीव तक इस बात की फुसफुसाहट तेज हो गई है कि क्या सत्ता में बने रहने के लिए नेतन्याहू अपने सबसे कट्टर आलोचक गादी आइजनकोट के साथ हाथ मिला सकते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता की चाहत और देश को बार-बार चुनावों के भंवर में फंसने से बचाने की मजबूरी ने दोनों धुर विरोधियों को एक बेहद असहज मोड़ पर ला खड़ा किया है।

कभी युद्ध कैबिनेट के साथी, आज एक-दूसरे के सबसे बड़े सियासी प्रतिद्वंद्वी

गादी आइजनकोट और बेंजामिन नेतन्याहू के बीच के रिश्ते बेहद जटिल और तल्ख रहे हैं। 7 अक्टूबर के हमलों के बाद जब गादी आइजनकोट ने एक जिम्मेदार पूर्व सैन्य प्रमुख के तौर पर आपातकालीन वॉर कैबिनेट में ऑब्जर्वर के रूप में प्रवेश किया था, तब पूरे देश ने उनके समर्पण को देखा था। उसी युद्ध के दौरान आइजनकोट ने गाजा में अपने बेटे और भतीजे दोनों को खो दिया। लेकिन जैसे-जैसे युद्ध लंबा खिंचता गया, आइजनकोट ने खुले तौर पर आरोप लगाया कि नेतन्याहू राष्ट्रीय सुरक्षा और बंधकों की सुरक्षित रिहाई से ज्यादा अपने निजी राजनीतिक अस्तित्व और सत्ता की कुर्सी को बचाने पर ध्यान दे रहे हैं। मतभेदों के चरम पर पहुंचने के बाद उन्होंने वॉर कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया और चुनावी अखाड़े में उतरकर नेतन्याहू के ‘झूठ के कल्चर’ को खत्म करने की सौगंध खा ली। ऐसे में आज उसी विरोधी के साथ गठबंधन की चर्चाओं ने इजरायली मतदाताओं को सकते में डाल दिया है।

‘रोटेशन फॉर्मूला’ और ‘चार शर्तें’: क्या सुलझ पाएगी गठबंधन की गांठ?

राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा एक ऐसी ‘राष्ट्रीय एकता सरकार’ (Unity Government) की है, जिसमें नेतन्याहू और आइजनकोट बारी-बारी से प्रधानमंत्री का पद संभालें। लिकुड और यशार की सीटें मिलकर 48 होती हैं, जो अन्य छोटे दलों के साथ मिलकर बहुत आसानी से 61 का आंकड़ा पार कर सकती हैं। हालांकि, इस फॉर्मूले के रास्ते में भारी अवरोध हैं। गादी आइजनकोट ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया है कि वे नेतन्याहू के अधीन किसी रोटेशन सरकार में शामिल नहीं होंगे। आइजनकोट ने सरकार गठन के लिए चार बुनियादी शर्तें रखी हैं—जिसमें 7 अक्टूबर की विफलताओं की स्वतंत्र जांच के लिए एक स्टेट कमीशन बनाना, अति-रूढ़िवादी (हरेदी) यहूदियों के लिए अनिवार्य सैन्य सेवा का कानून लाना और नेतन्याहू के न्यायिक सुधारों को रद्द करना शामिल है। ये तीनों ही शर्तें नेतन्याहू के पारंपरिक सहयोगियों (अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स और धुर-दक्षिणपंथी दलों) के सीधे खिलाफ जाती हैं।

तोड़-फोड़ की आशंका और अन्य दलों का कड़ा विरोध

नेतन्याहू के खेमे की ओर से यह भी कोशिशें चल रही हैं कि विपक्षी गुट से कुछ सांसदों को तोड़कर 61 का जादुई आंकड़ा जुटा लिया जाए। दूसरी ओर, आइजनकोट के साथी नेता जैसे अविग्दोर लीबरमैन और नफ्ताली बेनेट ने नेतन्याहू के साथ किसी भी समझौते का साफ विरोध किया है। वहीं अगर आइजनकोट अरब दलों (राम या जॉइंट लिस्ट) के बाहरी समर्थन से सरकार बनाने की कोशिश करते हैं, तो उनके अपने दक्षिणपंथी सहयोगी इसका कड़ा विरोध करेंगे। नेतन्याहू के लिए भी यह बेहद कठिन परीक्षा है; यदि वे आइजनकोट की शर्तों को मानकर गठबंधन करते हैं, तो उनके पुराने सहयोगी इतमार बेन-ग्विर और बेजलेल स्मोट्रिच बगावत कर देंगे।

राष्ट्रपति की मध्यस्थता पर टिकी नजरें, क्या फिर चुनाव की ओर बढ़ेगा देश?

इजरायल के राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती दोनों नेताओं को एक मेज पर लाकर किसी साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर सहमत कराने की है ताकि देश को छठे चुनाव के भारी आर्थिक और सामाजिक संकट से बचाया जा सके। यदि नेतन्याहू और आइजनकोट अपने निजी अहम् और राजनीतिक वादों से पीछे नहीं हटे, तो कोई भी सरकार विश्वास मत हासिल नहीं कर पाएगी। राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, लेकिन क्या नेतन्याहू अपनी कुर्सी बचाने के लिए उस आइजनकोट की शर्तों के आगे घुटने टेकेंगे जिसने उनके राजनीतिक अंत की कसम खाई थी, यह आने वाले कुछ दिनों की पर्दे के पीछे की वार्ताओं से पूरी तरह साफ हो जाएगा।

Check Also

US Midterm Election 2026: क्या हिलने वाली है डोनाल्ड ट्रंप की सत्ता? आज हो रहा मतदान, जानें भारत में कब और कैसे दिखेंगे नतीजे

अमेरिकी मिडटर्म चुनावों को लेकर दुनिया भर में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि …