इमरान खान के समर्थन में बोलने वाले विदेशी सांसदों पर भीषण ‘बॉट अटैक’: पाकिस्तानी सत्ता तंत्र पर लगा सोशल मीडिया पर बदनामी और दुष्प्रचार अभियान चलाने का आरोप, जानें क्या है पूरी डिजिटल साजिश

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के संस्थापक इमरान खान की अदियाला जेल में लगातार कैद और उनके साथ हो रहे कथित अमानवीय व्यवहार पर दुनिया भर के लोकतांत्रिक मंचों से आवाजें उठ रही हैं। लेकिन अब इस मामले ने एक नया और खतरनाक मोड़ ले लिया है। इमरान खान की रिहाई, उनके मानवाधिकारों और उन्हें उचित चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराने की वकालत करने वाले विदेशी सांसदों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों को एक सुनियोजित डिजिटल हमले का शिकार बनाया जा रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (विशेष रूप से एक्स/ट्विटर) पर हजारों फर्जी और स्वचालित ‘बॉट’ खातों के जरिए इन विदेशी जनप्रतिनिधियों के खिलाफ आक्रामक और अपमानजनक अभियान छेड़ा गया है।

यह डिजिटल दुष्प्रचार किसी आकस्मिक ट्रोलिंग का नतीजा नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक संगठित साइबर तंत्र काम कर रहा है जिसका मकसद विदेशी राजनेताओं की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करना और पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति में ‘विदेशी साजिश’ का नैरेटिव गढ़ना है।

कौन चला रहा है यह संगठित ‘बॉट अटैक’ और दुष्प्रचार अभियान?

डिजिटल फॉरेंसिक विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे अभियान की कार्यप्रणाली बेहद परिष्कृत और केंद्रित है। जैसे ही ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा या यूरोपीय संसद का कोई भी सदस्य इमरान खान की हिरासत या पाकिस्तान में लोकतंत्र की स्थिति पर कोई बयान, पत्र या सोशल मीडिया पोस्ट जारी करता है, वैसे ही चंद मिनटों के भीतर हजारों की संख्या में समन्वित खाते सक्रिय हो जाते हैं।

इन खातों की प्रोफाइल का विश्लेषण करने पर यह पाया गया है कि इनमें से अधिकांश खाते हाल ही में बनाए गए हैं, जिनके कोई वास्तविक फॉलोअर्स नहीं हैं और जो एक ही समय पर हूबहू कॉपी-पेस्ट किए गए संदेशों को ट्रेंड कराने में जुट जाते हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों और मानवाधिकार संगठनों का सीधा आरोप है कि पाकिस्तान का सत्ता समर्थक तंत्र और सुरक्षा प्रतिष्ठान से जुड़े डिजिटल विंग इन अभियानों को संचालित कर रहे हैं। इसका प्राथमिक उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान सरकार और सेना के खिलाफ बनने वाले किसी भी आलोचनात्मक दबाव को बेअसर करना है।

ब्रिटिश और अमेरिकी सांसदों को बनाया जा रहा निशाना: जैक गोल्डस्मिथ का मामला

इस डिजिटल हमले का सबसे बड़ा शिकार ब्रिटेन और अमेरिका के वे प्रमुख राजनेता बने हैं जिन्होंने हाल के महीनों में इमरान खान के समर्थन में खुलकर पत्र लिखे थे। उदाहरण के लिए, ब्रिटेन के पूर्व पर्यावरण मंत्री और लॉर्ड्स सभा के सदस्य जैक गोल्डस्मिथ (जो इमरान खान की पूर्व पत्नी जेमिमा गोल्डस्मिथ के भाई हैं) ने जब इमरान खान के साथ जेल में हो रहे व्यवहार और उनकी सुरक्षा को लेकर ब्रिटिश सरकार और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप की अपील की, तो उनके खिलाफ सोशल मीडिया पर तीखा बदनामी अभियान शुरू कर दिया गया।

पाकिस्तानी हुकूमत और सत्ता समर्थक सोशल मीडिया हैंडल्स ने जैक गोल्डस्मिथ और अन्य ब्रिटिश सांसदों पर पाकिस्तान की संप्रभुता, न्यायिक प्रक्रिया और आंतरिक राजनीति में अवैध हस्तक्षेप करने का आरोप मढ़ना शुरू कर दिया। इसी तरह, अमेरिकी कांग्रेस के दर्जनों सांसदों द्वारा अमेरिकी विदेश मंत्रालय को लिखे गए उस पत्र के बाद भी भारी साइबर हमला देखा गया, जिसमें पाकिस्तान में निष्पक्ष चुनाव और राजनीतिक बंदियों की रिहाई की मांग की गई थी। इन सांसदों को ‘पीटीआई की लॉबिंग का बिकाऊ हिस्सा’ बताकर बदनाम करने की कोशिश की गई।

इमरान खान के स्वास्थ्य और मानवाधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय चिंता

इस साइबर अभियान की पृष्ठभूमि में इमरान खान के स्वास्थ्य और उनकी चिकित्सा जांच को लेकर खड़ा हुआ विवाद है। अदियाला जेल में बंद 70 वर्षीय पूर्व प्रधानमंत्री को एकांत कारावास में रखने, उनकी कानूनी टीम और परिवार से मिलने पर पाबंदियां लगाने और बुनियादी स्वास्थ्य जांच में देरी को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंताएं जताई जा रही थीं।

हालांकि, पाकिस्तान सरकार और पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (PIMS) के अधिकारियों ने दावा किया कि इमरान खान को डॉक्टरों और नेत्र विशेषज्ञों की नियमित देखरेख उपलब्ध कराई जा रही है और उनकी जांच के दौरान उनकी बहन और विशेषज्ञ चिकित्सक मौजूद थे। इसके बावजूद, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार पर्यवेक्षकों का कहना है कि आधिकारिक बयान स्वतंत्र निगरानी का विकल्प नहीं हो सकते। जब भी कोई विदेशी निकाय स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड की मांग करता है, तो उसे राज्य विरोधी प्रचार बताकर खारिज कर दिया जाता है।

विदेशी धरती पर पाकिस्तानी प्रवासियों और पत्रकारों पर दबाव

यह डिजिटल और मनोवैज्ञानिक युद्ध केवल विदेशी सांसदों तक सीमित नहीं है, बल्कि विदेशों में रहने वाले पाकिस्तानी प्रवासियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और स्वतंत्र पत्रकारों को भी निशाना बनाया जा रहा है। ब्रिटेन, अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले ऐसे कई एक्टिविस्ट्स जिन्होंने इमरान खान के समर्थन में रैलियां निकालीं या सोशल मीडिया पर वीडियो बनाए, उन्हें ऑनलाइन धमकियों, चरित्र हनन और उनके परिवारों को पाकिस्तान में प्रताड़ित किए जाने के मामलों की शिकायतें मिली हैं।

आलोचकों का तर्क है कि पाकिस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि सुधारने के लिए वास्तविक सुधार करने के बजाय ‘ट्रांसनेशनल रिप्रेशन’ (पारदेशीय दमन) और डिजिटल सेंसरशिप का सहारा ले रहा है। प्रवासी पाकिस्तानियों के पासपोर्ट रद्द करने, उन्हें देश लौटने पर गिरफ्तार करने की धमकियां देने और उनके खातों पर सामूहिक रिपोर्टिंग करवाकर उन्हें सस्पेंड कराने की रणनीति अपनाई जा रही है।

संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की चेतावनियों की अनदेखी

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के वर्किंग ग्रुप ऑन आर्बिट्रेरी डिटेंशन (मनमानी हिरासत पर कार्य समूह) ने पहले ही अपनी विस्तृत रिपोर्ट में इमरान खान की गिरफ्तारी और उनके खिलाफ दर्जनों मुकदमों को राजनीतिक रूप से प्रेरित और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करार दिया था। संयुक्त राष्ट्र ने इमरान खान की तत्काल और बिना शर्त रिहाई की सिफारिश की थी।

इसके बावजूद, इस्लामाबाद स्थित अधिकारियों ने इन सभी सिफारिशों को सिरे से खारिज करते हुए इसे देश की अदालतों का अपमान बताया। विश्लेषकों का कहना है कि जब कोई भी अंतरराष्ट्रीय संस्था या विदेशी संसद का प्रतिनिधि पाकिस्तान के मानवाधिकार रिकॉर्ड पर सवाल उठाता है, तो उसे वैध चिंता मानने के बजाय घरेलू जनता के सामने एक ‘विदेशी षड्यंत्र’ के रूप में पेश किया जाता है ताकि राष्ट्रवाद की आड़ में सत्ता की जवाबदेही से बचा जा सके।

साइबर वॉरफेयर और नैरेटिव कंट्रोल की नई रणनीति

आधुनिक राजनीति में सोशल मीडिया केवल राय व्यक्त करने का साधन नहीं रहा, बल्कि यह धारणा प्रबंधन (Perception Management) का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है। पाकिस्तान में इस समय राजनीतिक विपक्ष को जमीनी स्तर पर रैलियां करने और मुख्यधारा के टीवी चैनलों पर दिखने से पूरी तरह रोक दिया गया है। ऐसे में पीटीआई और इमरान खान के समर्थक सोशल मीडिया को अपने सबसे बड़े प्रचार मंच के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।

इस नैरेटिव को तोड़ने के लिए सत्ता तंत्र ने ‘साइबर ट्रूप्स’ और ‘बॉट फार्म्स’ तैयार किए हैं। ये बॉट नेटवर्क्स एल्गोरिदम को हाईजैक करके किसी भी आलोचनात्मक आवाज़ को दबाने, उसे नकारात्मक हैशटैग्स से घेरने और सार्वजनिक विमर्श को भटकाने का काम करते हैं। जब विदेशी सांसदों को टैग करके लाखों गालियां और अपमानजनक पोस्ट किए जाते हैं, तो उसका उद्देश्य अन्य अंतरराष्ट्रीय हस्तियों को यह संदेश देना होता है कि पाकिस्तान के मुद्दे पर बोलने का मतलब व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को खतरे में डालना है।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर इस डिजिटल हमले का दूरगामी असर

विदेशी सांसदों पर किए जा रहे इस तरह के साइबर हमलों का असर पाकिस्तान के राजनयिक संबंधों पर नकारात्मक रूप से पड़ सकता है। पश्चिमी देशों के सांसद अपनी संसद और मानवाधिकार समितियों में इस तरह के साइबर हमलों और डिजिटल उत्पीड़न के खिलाफ औपचारिक जांच की मांग कर सकते हैं।

यदि यह साबित होता है कि किसी देश की राज्य प्रायोजित एजेंसियां लोकतांत्रिक देशों के चुने हुए प्रतिनिधियों को सोशल मीडिया पर प्रताड़ित कर रही हैं, तो इससे पाकिस्तान को मिलने वाली अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता, जीएसपी प्लस (GSP+) व्यापार का दर्जा और आईएमएफ (IMF) के साथ होने वाले समझौतों पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं। आने वाले समय में यह देखना होगा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स इन बॉट नेटवर्क्स के खिलाफ क्या कार्रवाई करते हैं और क्या विदेशी सरकारें अपने सांसदों की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बनाती हैं।

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