
पाकिस्तान के सबसे अशांत और खनिज समृद्ध प्रांत बलूचिस्तान में आजादी की मांग कर रहे विद्रोही समूहों ने एक अभूतपूर्व और बड़ा रणनीतिक फैसला लिया है। बलूच नेतृत्व ने बलूचिस्तान के सभी सार्वजनिक स्थलों, प्रमुख राजमार्गों, हवाई अड्डों, बंदरगाहों और शैक्षणिक संस्थानों से पाकिस्तान और ब्रिटिश काल से जुड़े नामों और प्रतीकों को पूरी तरह हटाने की योजना का ऐलान कर दिया है।
पाकिस्तान के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले मोहम्मद अली जिन्ना, उनकी बहन फातिमा जिन्ना और राष्ट्रीय कवि अल्लामा इकबाल के नाम पर रखे गए ऐतिहासिक ढांचों की पहचान मिटाने के इस फैसले ने इस्लामाबाद और रावलपिंडी स्थित पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान में गहरी बेचैनी पैदा कर दी है। बलूच नेता मीर यार बलूच ने इस पूरी प्रक्रिया को बलूचिस्तान की खोई हुई ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय अस्मिता को पुनर्स्थापित करने की दिशा में एक जरूरी कदम बताया है।
सड़कों, चौराहों और बुनियादी ढांचों से हटेंगे पाकिस्तानी प्रतीक
घोषित योजना के तहत सबसे पहले बलूचिस्तान की प्रांतीय राजधानी क्वेटा सहित प्रमुख शहरों की उन सड़कों और चौराहों की समीक्षा की जाएगी जिनके नाम पाकिस्तानी हस्तियों पर रखे गए हैं। क्वेटा की सबसे व्यस्त और प्रमुख ‘जिन्ना रोड’, ‘फातिमा जिन्ना रोड’ और ‘इकबाल रोड’ के नाम बदलकर बलूचिस्तान के प्राचीन इतिहास, भूगोल, शहीदों और सांस्कृतिक व्यक्तित्वों के नाम पर रखे जाएंगे।
इस अभियान का दायरा केवल सामान्य गलियों या साइनबोर्ड तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें निम्नलिखित प्रमुख परिसंपत्तियां भी शामिल होंगी:
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परिवहन व विमानन: बलूचिस्तान स्थित हवाई अड्डे, एयरलाइंस के स्थानीय टर्मिनल और प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्ग।
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रणनीतिक बंदरगाह: ग्वादर और तटीय इलाकों के वे प्रोजेक्ट्स जिन पर पाकिस्तानी हुकूमत की छाप है।
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ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधन: सुई गैस फील्ड, तेल के कुएं, बांध और खदान परियोजनाएं।
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संस्थान व सार्वजनिक सुविधाएं: सरकारी अस्पताल, विश्वविद्यालय, डिग्री कॉलेज, पार्क, शॉपिंग मॉल, बैंक और सरकारी प्रशासनिक इमारतें।
बलूच नेताओं का स्पष्ट कहना है कि बाहरी नियंत्रण को दर्शाने वाले हर आधिकारिक प्रतीक को व्यवस्थित तरीके से हटाया जाएगा ताकि नई पीढ़ी अपनी वास्तविक जड़ों से जुड़ सके।
‘आजादी केवल राजनीतिक नहीं, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक भी’
विदेश में रहकर आंदोलन को वैचारिक दिशा दे रहे बलूच नेता मीर यार बलूच ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर अपने बयान में इस कदम के पीछे का दर्शन स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि किसी भी संप्रभु और स्वतंत्र राष्ट्र की पहचान उसके अपने प्रतीकों, भाषा और नायकों से तय होती है। जब तक सार्वजनिक जीवन में विदेशी या जबरन थोपे गए प्रतीक मौजूद रहेंगे, तब तक वैचारिक मुक्ति अधूरी रहेगी।
मीर यार बलूच ने अपने वक्तव्य में जोर देकर कहा कि यह कदम किसी देश या समुदाय के प्रति नफरत से प्रेरित नहीं है, बल्कि अपनी जमीन पर अपने इतिहास को स्थापित करने का एक स्वाभाविक अधिकार है। उन्होंने तर्क दिया कि जब स्थानीय अस्पतालों और स्कूलों के नाम बलूच संस्कृति और शहीदों के नाम पर होंगे, तो युवाओं में आत्मसम्मान और सांस्कृतिक चेतना का संचार होगा।
11 अगस्त 1947 का इतिहास और पाकिस्तान के साथ विवाद की जड़
बलूचिस्तान का यह संघर्ष नया नहीं है, बल्कि इसका इतिहास 1947 के विभाजन से जुड़ा हुआ है। बलूच राष्ट्रवादी 11 अगस्त 1947 को कलात (बलूचिस्तान) की स्वतंत्रता की मूल नींव मानते हैं।
ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, अंग्रेजों के जाने के बाद कलात के खान मीर अहमद यार खान ने बलूचिस्तान को एक स्वतंत्र देश घोषित किया था। हालांकि, मार्च 1948 में पाकिस्तानी सेना के दबाव और जबरन विलय पत्र पर हस्ताक्षर के बाद बलूचिस्तान को पाकिस्तान का हिस्सा बना लिया गया। बलूच समुदाय इस कार्रवाई को एक ऐतिहासिक विश्वासघात मानता है और तभी से वहां स्वशासन और संप्रभुता के लिए लगातार सशस्त्र व राजनीतिक आंदोलन चल रहे हैं।
सीपैक (CPEC) और चीनी परियोजनाओं पर असर
बलूचिस्तान में पाकिस्तानी प्रतीकों को हटाने और विरोध को तेज करने की इस योजना का सीधा असर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) पर भी पड़ना तय माना जा रहा है। ग्वादर पोर्ट और बलूचिस्तान के खनिज संसाधनों पर पाकिस्तानी सेना और चीनी कंपनियों के नियंत्रण का स्थानीय जनता लंबे समय से विरोध कर रही है।
बलूच विद्रोहियों द्वारा चलाए जा रहे इस वि-उपनिवेशीकरण (Decolonization) अभियान से स्थानीय स्तर पर तैनात पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के लिए कानून-व्यवस्था बनाए रखना और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि साइनबोर्ड बदलने और प्रतीकों को खारिज करने की यह मुहिम बलूचिस्तान के आम नागरिकों के बीच अलगाव की भावना को और गहरा करेगी।
पाकिस्तानी सुरक्षा तंत्र और राजनीतिक गलियारों में बेचैनी
इस्लामाबाद स्थित केंद्रीय सत्ता के लिए यह घटनाक्रम इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि यह आंदोलन अब केवल हथियारों की लड़ाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सांस्कृतिक और बौद्धिक विमर्श में बदल चुका है। बलूच यकजेहती कमेटी (BYC) जैसी संस्थाओं द्वारा मानवाधिकारों, लापता लोगों और संसाधनों पर स्थानीय अधिकारों को लेकर चलाए जा रहे शांतिपूर्ण जन-आंदोलनों ने पहले ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की स्थिति असहज कर रखी है।
अब सार्वजनिक स्थानों से जिन्ना और इकबाल जैसे राष्ट्रीय संस्थापकों के नाम हटाने की रणनीति ने पाकिस्तान सरकार के सामने एक नया प्रशासनिक और वैचारिक संकट खड़ा कर दिया है। पाकिस्तानी सेना इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए अतिरिक्त बलों की तैनाती पर विचार कर रही है, लेकिन बलूच जनता के भीतर अपनी पहचान को लेकर उपजा यह असंतोष थमता नजर नहीं आ रहा है।
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