
शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व में मां भगवती के भक्त पूरे नौ दिनों तक उपवास और साधना करते हैं। इस अनुष्ठान का सबसे मुख्य और फलदायी पड़ाव महाअष्टमी (दुर्गाष्टमी) और महानवमी की पूजा तथा कन्या पूजन माना जाता है। इस वर्ष कई श्रद्धालुओं के मन में तिथियों के उतार-चढ़ाव को लेकर गहरा संशय बना हुआ है कि क्या महाअष्टमी और महानवमी एक ही दिन मनाई जाएगी या दोनों पर्व अलग-अलग दिनों में संपन्न होंगे। सोशल मीडिया और पंचांग गणनाओं के बीच लोग 18 अक्टूबर और 19 अक्टूबर की तिथियों को लेकर असमंजस की स्थिति में हैं। सनातन धर्म में किसी भी व्रत और अनुष्ठान का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब वह शास्त्रसम्मत उदयातिथि और सही मुहूर्त में किया जाए, इसलिए इस संशय का सटीक पंचांग समाधान जानना प्रत्येक भक्त के लिए अत्यंत आवश्यक है।
पंचांग और तिथि गणना: कब शुरू हो रही है अष्टमी और नवमी?
वैदिक ज्योतिष और पंचांग के गणित के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की तिथियों का चक्र विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। कई बार जब कोई तिथि सूर्योदय के समय व्याप्त होती है और दिन के मध्य में समाप्त होकर अगली तिथि लग जाती है, तो सामान्य जन में दोनों तिथियों के एक ही दिन होने का भ्रम पैदा हो जाता है। 18 अक्टूबर को आश्विन शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का वास सूर्योदय के साथ माना जा रहा है, जो कि दोपहर अथवा शाम तक प्रभावी रहेगी। इसके तुरंत बाद नवमी तिथि की शुरुआत हो जाएगी। शास्त्रों में नियम है कि जिस तिथि में सूर्योदय होता है, उस दिन की मुख्य साधना उदयातिथि के अनुसार मानी जाती है। यही कारण है कि कुछ पंचांगों में दोपहर बाद नवमी तिथि प्रवेश करने से लोगों को लगता है कि दोनों पर्व एक ही दिन आ रहे हैं, जबकि धर्मशास्त्रों में दिन की पूजा का निर्धारण सूर्योदय कालीन तिथि से ही तय होता है।
कन्या पूजन और हवन: 18 अक्टूबर या 19 अक्टूबर, किस दिन करें?
गृहस्थ जीवन में कन्या पूजन को साक्षात नवदुर्गा के आशीर्वाद का माध्यम माना गया है। जो साधक कुल परंपरा के अनुसार महाअष्टमी के दिन कन्या जिमाते हैं, उनके लिए 18 अक्टूबर का दिन उदयातिथि अष्टमी होने के कारण सर्वश्रेष्ठ और शास्त्रसम्मत है। इस दिन महागौरी की विशेष पूजा, संधि पूजा और कन्या पूजन मध्याह्न काल तक संपन्न किया जा सकता है। वहीं दूसरी ओर, जो परिवार और भक्त महानवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की आराधना और कन्या पूजन करते हैं, उनके लिए 19 अक्टूबर का दिन श्रेष्ठ रहेगा क्योंकि 19 अक्टूबर के सूर्योदय में नवमी तिथि प्रभावी रहेगी। इसलिए साधक अपनी पारिवारिक और कुल परंपरा के अनुसार 18 अक्टूबर को अष्टमी पूजन तथा 19 अक्टूबर को नवमी पूजन और हवन का अनुष्ठान बिना किसी संदेह के कर सकते हैं।
संधि पूजा और व्रत पारण का सही समय और शास्त्र नियम
दुर्गा पूजा और नवरात्रि के नौ दिनों में महाअष्टमी और महानवमी के मिलन का समय ‘संधि पूजा’ (Sandhi Puja) कहलाता है। यह वह पावन कालखंड होता है जब अष्टमी तिथि के अंतिम 24 मिनट और नवमी तिथि के शुरुआती 24 मिनट एक साथ मिलते हैं। तंत्र और पुराणों के अनुसार इसी संधि काल में मां दुर्गा ने चंड और मुंड नामक असुरों का संहार करने के लिए विकराल रूप धारण किया था। जो भक्त संधि पूजा और अखंड दीप की विशेष साधना करते हैं, वे 18 अक्टूबर की शाम को इस विशेष मुहूर्त का लाभ उठा सकते हैं। वहीं जो साधक पूरे नौ दिनों का अखंड उपवास रखते हैं, उनके लिए व्रत का पारण 19 अक्टूबर को नवमी पूजन, कन्या भोज और नवमी तिथि के मान समाप्ति के बाद या फिर 20 अक्टूबर को विजयादशमी (दशहरा) के पावन अवसर पर करना शास्त्र सम्मत माना गया है।
भ्रम से दूर रहकर श्रद्धा और भाव से करें जगतजननी की आराधना
धार्मिक विद्वानों और ज्योतिषाचार्यों का मत है कि तिथियों के सूक्ष्म गणित को लेकर भक्तों को अनावश्यक भ्रम में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। यदि आप अष्टमी पूजते हैं, तो 18 अक्टूबर को प्रातः काल स्नान-ध्यान करके मां महागौरी का आह्वान करें और नौ कन्याओं व एक बटुक भैरव का पूजन कर उन्हें हलवा, पूरी और चने का भोग लगाएं। यदि आप नवमी के उपासक हैं, तो 19 अक्टूबर को मां सिद्धिदात्री की अर्चना कर हवन संपन्न करें। देवी भागवत पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि भगवती केवल तिथियों के फेर से नहीं, बल्कि भक्त के निर्मल भाव, अटूट निष्ठा और सच्ची श्रद्धा से प्रसन्न होती हैं। इसलिए अपने कुल और परंपरा का पालन करते हुए पूरे उल्लास के साथ माता रानी की सेवा में लीन रहें।
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