
हम चारों ओर विभिन्न प्रकार की आवाजों से घिरे हुए हैं, चाहे वह सुबह पक्षियों की चहचहाहट हो, सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों का शोर हो या फिर ईयरफोन में बजने वाला हमारा पसंदीदा संगीत। ध्वनि हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है, लेकिन विज्ञान के अनुसार हर आवाज हमारे शरीर और मस्तिष्क के लिए अनुकूल नहीं होती। ध्वनि की तीव्रता को मापने के लिए भौतिक विज्ञान में डेसीबल (Decibel – dB) की इकाई का उपयोग किया जाता है। आम बोलचाल में सामान्य फुसफुसाहट लगभग 30 डेसीबल की होती है, जबकि दो लोगों के बीच शांति से होने वाली सामान्य बातचीत 60 डेसीबल के आसपास दर्ज की जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और ईएनटी (ENT) विशेषज्ञों के अनुसार, 70 डेसीबल तक की आवाज को इंसानी कानों के लिए पूरी तरह सुरक्षित और प्राकृतिक माना जाता है। इस स्तर तक की आवाज को हमारे कान बिना किसी जैविक तनाव या कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाए वर्षों तक लगातार सुन सकते हैं। लेकिन जैसे ही यह पैमाना 80 या 85 डेसीबल के पार जाने लगता है, हमारे कानों के नाजुक अंदरूनी तंत्र के लिए खतरे की घंटी बजनी शुरू हो जाती है।
85 डेसीबल की लक्ष्मण रेखा: कब स्थायी रूप से बहरे हो सकते हैं आप?
ऑडिटरी साइंस यानी श्रवण विज्ञान के मुताबिक, 85 डेसीबल को इंसानी सुनने की क्षमता के लिए सुरक्षा की अंतिम सीमा माना गया है। 85 डेसीबल का मतलब होता है भारी ट्रैफिक का शोर, व्यस्त सड़क पर चलने वाली बस या भारी ब्लेंडर व मिक्सी की आवाज। यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन 8 घंटे या उससे अधिक समय तक 85 डेसीबल के शोर में लगातार रहता है, तो उसके कान के अंदर मौजूद ‘कोक्लीया’ (Cochlea) की सूक्ष्म संवेदी बाल कोशिकाएं (Hair Cells) धीरे-धीरे नष्ट होने लगती हैं। ये हेयर सेल्स ध्वनि तरंगों को न्यूरल सिग्नल्स में बदलकर दिमाग तक पहुंचाती हैं और शरीर में एक बार इनके नष्ट होने पर इन्हें दोबारा जीवित नहीं किया जा सकता। ध्वनि का नियम यह है कि हर 3 डेसीबल की बढ़ोतरी के साथ आवाज की ताकत दोगुनी हो जाती है, जिसका अर्थ है कि 88 डेसीबल पर सुरक्षित समय घटकर केवल 4 घंटे रह जाता है और 95 डेसीबल (जैसे किसी क्लब या डीजे का शोर) पर बिना सुरक्षा के केवल 15 मिनट में ही कानों को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है।
120 से 150 डेसीबल: दर्द की दहलीज और कान के पर्दे फटने का खतरा
जब ध्वनि का स्तर 120 डेसीबल को छूता है, तो इंसान के कान केवल आवाज नहीं सुनते बल्कि उन्हें शारीरिक दर्द का अहसास होने लगता है। मेडिकल भाषा में इसे ‘थ्रेशोल्ड ऑफ पेन’ (Threshold of Pain) कहा जाता है। 120 से 130 डेसीबल का शोर किसी रॉक कॉन्सर्ट की पहली पंक्ति, हवाई जहाज के टेकऑफ या पुलिस के सायरन के बिल्कुल पास खड़े होने पर महसूस होता है। इस स्तर पर कान के भीतर झनझनाहट और भारी चुभन होने लगती है। यदि ध्वनि की तीव्रता बढ़कर 140 से 150 डेसीबल तक पहुंच जाए—जैसे कि पास में हुआ कोई बड़ा पटाखा विस्फोट, जेट इंजन का थ्रस्ट या बंदूक से गोली चलने की आवाज—तो एक ही झटके में कान का पर्दा (Tympanic Membrane) फट सकता है। कान का पर्दा फटने से असहनीय दर्द, कानों से खून बहना, चक्कर आना और तत्काल बहरापन हो सकता है।
कितने डेसीबल पर हो सकती है मौत? जब ध्वनि बन जाती है जानलेवा हथियार
अब सबसे बड़ा और वैज्ञानिक सवाल यह उठता है कि क्या केवल आवाज इंसान की जान ले सकती है? इसका सीधा और वैज्ञानिक जवाब है—हाँ। अत्यधिक उच्च स्तर पर ध्वनि केवल एक आवाज नहीं रह जाती, बल्कि वह एक प्रचंड दबाव वाली भौतिक शॉकवेव (Shockwave) या प्रघाती तरंग में बदल जाती है। वैज्ञानिकों और सैन्य शोधों के अनुसार, 185 से 200 डेसीबल (dB) के बीच का ध्वनि स्तर किसी भी इंसान के लिए सीधे तौर पर जानलेवा साबित हो सकता है। 185 डेसीबल पर वायुदाब इतना भयंकर हो जाता है कि वह इंसान के फेफड़ों में हवा के बुलबुले (Air Embolism) बना देता है, जो रक्त प्रवाह के जरिए मस्तिष्क और दिल तक पहुंचकर कार्डियक अरेस्ट या ब्रेन स्ट्रोक का कारण बन जाते हैं। 194 डेसीबल किसी भी सामान्य वायुमंडलीय स्थिति में संभव अधिकतम गैर-आघात ध्वनि तरंग की सीमा है; इसके पार जाते ही यह पूरी तरह से विस्फोटक शॉकवेव बन जाती है। यदि कोई व्यक्ति 200 डेसीबल या उससे अधिक के संपर्क में सीधे तौर पर आ जाए, तो ध्वनि के भीषण दबाव से फेफड़े तुरंत फट जाते हैं, आंतरिक अंगों में भारी रक्तस्राव होने लगता है और कुछ ही पलों में इंसान की दर्दनाक मौत हो जाती है। ऐसा दबाव आमतौर पर मिसाइल विस्फोट, रॉकेट प्रक्षेपण स्थल के शून्य दायरे या परमाणु बम के धमाके के केंद्र में ही पैदा होता है।
रोजमर्रा की जिंदगी में कैसे सुरक्षित रखें अपने कान और सुनने की क्षमता?
आज की डिजिटल दुनिया में मोबाइल फोन, हेडफोन और ईयरबड्स के अत्यधिक इस्तेमाल ने युवाओं में समय से पहले बहरेपन की समस्या को तेजी से बढ़ा दिया है। ज्यादातर युवा घंटों तक 80 से 90 प्रतिशत वॉल्यूम पर ईयरफोन लगाकर गाने सुनते हैं या वीडियो देखते हैं, जो सीधे कान की तंत्रिकाओं को सुखा देता है। कानों की लंबी उम्र के लिए ऑडियोलॉजिस्ट्स का दिया हुआ ’60-60 का नियम’ अपनाना सबसे सुरक्षित माना जाता है। इसका मतलब है कि डिवाइस की अधिकतम आवाज के 60 प्रतिशत से अधिक वॉल्यूम कभी न रखें और लगातार 60 मिनट से ज्यादा ईयरफोन का इस्तेमाल न करें। इसके अलावा, शादी-समारोहों, राजनीतिक रैलियों और तेज लाउडस्पीकर वाले आयोजनों में डीजे बॉक्स के सीधे संपर्क में खड़े होने से बचें और जब भी भारी शोरगुल वाली फैक्ट्रियों या निर्माण स्थलों के आसपास हों, तो ईयरप्लग का उपयोग अवश्य करें।
Shashwat Lokwarta – State News,Up News देश-दुनिया