खैबर पख्तूनख्वा में लगी इमरजेंसी, बर्खास्त हुई इमरान खान की PTI सरकार; गवर्नर शासन लागू होने से इस्लामाबाद तक मची खलबली

पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान एक बार फिर गंभीर संवैधानिक और राजनीतिक संकट के मुहाने पर आकर खड़ा हो गया है। केंद्र की शहबाज शरीफ सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने अशांत प्रांत खैबर पख्तूनख्वा (केपी) में आधिकारिक तौर पर आपातकाल (इमरजेंसी) और गवर्नर शासन लागू करने की मंजूरी दे दी है। इस एक आदेश के साथ ही प्रांत में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) की चुनी हुई प्रांतीय सरकार का नियंत्रण समाप्त हो गया है और तमाम प्रशासनिक व विधायी अधिकार सीधे संघीय सरकार तथा राज्यपाल फैसल करीम कुंडी के हाथों में चले गए हैं। पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 232 और 234 के तहत उठाए गए इस सख्त कदम ने देश के राजनीतिक हलकों में खलबली मचा दी है। पिछले कई महीनों से इस्लामाबाद स्थित संघीय हुकूमत और पेशावर स्थित प्रांतीय पीटीआई सरकार के बीच टकराव की जो चिंगारी सुलग रही थी, उसने अब भीषण सियासी आग का रूप ले लिया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला केवल एक प्रांत की प्रशासनिक फेरबदल भर नहीं है, बल्कि जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी को पूरी तरह हाशिए पर धकेलने की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम है।

इमरान खान की रिहाई के लिए लॉन्ग मार्च और इस्लामाबाद में मचा हड़कंप

इस अप्रत्याशित फैसले की तात्कालिक वजह पीटीआई द्वारा शुरू किया गया विशाल विरोध मार्च बना। रावलपिंडी की कुख्यात अदियाला जेल में एक साल से अधिक समय से बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की रिहाई, उनके स्वास्थ्य की उचित देखभाल और अदालती मामलों में कथित सैन्य दखल के विरोध में पीटीआई ने खैबर पख्तूनख्वा से संघीय राजधानी इस्लामाबाद की ओर बड़े पैमाने पर ‘लॉन्ग मार्च’ का आह्वान किया था। प्रांतीय नेतृत्व के नेतृत्व में हजारों की संख्या में पार्टी कार्यकर्ता, समर्थक और स्थानीय नागरिक लक्की मरवत से होते हुए राजधानी की सीमाओं की तरफ कूच कर रहे थे। इस्लामाबाद में सत्तासीन गठबंधन सरकार को यह डर सताने लगा था कि यदि खैबर पख्तूनख्वा से आ रहा यह भारी जनसैलाब राजधानी में प्रवेश कर गया, तो न केवल शहर की कानून-व्यवस्था चरमरा जाएगी, बल्कि लाल मस्जिद और संसद भवन के बाहर साल 2014 जैसी अनिश्चितकालीन धरने की स्थिति दोबारा पैदा हो सकती है। संघीय गृह मंत्रालय ने पहले ही साफ कर दिया था कि किसी भी सूरत में प्रदर्शनकारियों को इस्लामाबाद की सीमा में दाखिल नहीं होने दिया जाएगा। जब बातचीत के सभी दौर नाकाम साबित हुए, तो शहबाज कैबिनेट ने आपात बैठक बुलाकर सीधे प्रांत की सत्ता की बागडोर अपने हाथ में लेने का प्रस्ताव पारित कर दिया।

पीटीआई सरकार बर्खास्त, नेताओं की धरपकड़ और नेतृत्व पर कड़ा शिकंजा

इमरजेंसी की आधिकारिक अधिसूचना जारी होते ही सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय पुलिस ने पीटीआई के शीर्ष नेताओं पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया। मार्च का नेतृत्व कर रहे प्रांतीय नेताओं और पूर्व मुख्यमंत्री अली अमीन गंडापुर सहित कई प्रमुख चेहरों को नजरबंद या हिरासत में लिए जाने की खबरें सामने आने लगीं। पीटीआई के प्रांतीय सूचना मंत्री ने दावा किया कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रख रहे नेताओं पर दमनकारी नीतियां थोपी जा रही हैं। वहीं दूसरी तरफ, केंद्र सरकार ने तुरंत प्रभाव से डॉ. मुहम्मद फखर आलम इरफान को खैबर पख्तूनख्वा का नया मुख्य सचिव नियुक्त कर दिया और वरिष्ठ नौकरशाहों के तबादले करके पूरे प्रशासनिक तंत्र को सीधे इस्लामाबाद के अधीन कर लिया। पीटीआई के राष्ट्रीय चेयरमैन बैरिस्टर गौहर खान ने इस कार्रवाई की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए इसे जनता के लोकतांत्रिक जनादेश पर सीधा हमला बताया है। पीटीआई का कहना है कि 2024 के आम चुनावों में खैबर पख्तूनख्वा की जनता ने इमरान खान की पार्टी को प्रचंड बहुमत दिया था, और इस तरह असंवैधानिक हथकंडों से एक चुनी हुई सरकार को अपदस्थ करना लोकतंत्र का गला घोंटने के बराबर है।

आतंकवाद, टीटीपी और केंद्र-प्रांत के बीच कड़वाहट की असल वजह

शहबाज शरीफ सरकार ने खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल लागू करने के पीछे सबसे बड़ा कारण प्रांत की बदहाल सुरक्षा व्यवस्था और आतंकवाद के खिलाफ ढुलमुल रवैये को बताया है। अफगानिस्तान की सीमा से सटे इस प्रांत में पिछले कुछ वर्षों के दौरान तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और अन्य चरमपंथी गुटों के हमलों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि कई जिलों में हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि शाम ढलते ही आम नागरिक घरों से बाहर निकलने से कतराते हैं। संघीय कैबिनेट का आरोप है कि पीटीआई की प्रांतीय सरकार आतंकवाद से निपटने में जानबूझकर अनिच्छा दिखा रही थी और सुरक्षा बलों के अभियानों में सहयोग करने के बजाय अफगान तालिबान के साथ स्वतंत्र बातचीत की वकालत कर रही थी। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सख्त लहजे में कहा कि जब देश के जवान और बेकसूर नागरिक आतंकी हमलों में जान गंवा रहे हों, तब संघीय सरकार हाथ पर हाथ धरकर मूकदर्शक नहीं बनी रह सकती। हालांकि, पीटीआई का पलटवार है कि आतंकवाद से लड़ने के नाम पर केंद्र असल में अपनी सियासी प्रतिद्वंद्विता साध रहा है और अपनी विफलताओं का ठीकरा प्रांतीय हुकूमत के सिर फोड़ रहा है।

पेशावर से इस्लामाबाद तक छावनी में तब्दील सड़कें, आम जनजीवन अस्त-व्यस्त

गवर्नर शासन के ऐलान के बाद पूरे खैबर पख्तूनख्वा में माहौल बेहद तनावपूर्ण बना हुआ है। प्रांतीय राजधानी पेशावर, डेरा इस्माइल खान, मर्दान और स्वात जैसे संवेदनशील इलाकों में भारी पुलिस बल और अर्धसैनिक बलों (पैरा-मिलिट्री) की तैनाती कर दी गई है। राजधानी पेशावर को इस्लामाबाद से जोड़ने वाले मुख्य जीटी रोड और मोटरवे पर बड़े-बड़े शिपिंग कंटेनर रखकर रास्ते पूरी तरह सील कर दिए गए हैं। कई शहरी इलाकों में अफवाहों को रोकने और प्रदर्शनकारियों के समन्वय को तोड़ने के मकसद से मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को आंशिक रूप से बंद या धीमा कर दिया गया है। सड़कों पर कंटेनर और कंटीले तार लगे होने के चलते आम जनता को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है; मरीजों को अस्पतालों तक पहुंचाने और जरूरी सामानों की ढुलाई में भारी रुकावटें आ रही हैं। सुरक्षा बलों को दंगारोधी उपकरणों के साथ चौराहों पर तैनात रखा गया है ताकि किसी भी संभावित उग्र प्रदर्शन को फौरन दबाया जा सके।

कानूनी लड़ाई और पाकिस्तान के भविष्य पर गहराते सवाल

खैबर पख्तूनख्वा की सरकार बर्खास्त होने के बाद अब यह पूरा मामला पाकिस्तान की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक पहुंचना तय है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अनुच्छेद 232 के तहत आंतरिक अशांति के आधार पर इमरजेंसी लगाने के लिए प्रांतीय विधानसभा के प्रस्ताव की आवश्यकता होती है। चूंकि पीटीआई बहुमत वाली विधानसभा ने ऐसा कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया था, इसलिए पार्टी इसे असंवैधानिक करार देकर अदालत में चुनौती देने की तैयारी कर रही है। पंजाब बार काउंसिल सहित देश के कई प्रमुख वकील संगठनों ने भी इस कदम की आलोचना करते हुए कहा है कि राजनीतिक मतभेदों को सुलझाने के लिए इमरजेंसी जैसी तानाशाही शक्तियों का इस्तेमाल करना मुल्क के फेडरल ढांचे को कमजोर करता है। दूसरी तरफ, शहबाज सरकार इस आदेश को संसद के दोनों सदनों से मंजूरी दिलाने की रणनीति बना रही है। आर्थिक बदहाली, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के भारी कर्ज और आंतरिक सुरक्षा संकट से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए यह नया सियासी बवंडर स्थिति को और ज्यादा विस्फोटक बना सकता है। अगर इमरान खान के समर्थक सड़कों पर बड़े पैमाने पर उतरते हैं, तो आने वाले दिन मुल्क के लिए बेहद अशांत साबित हो सकते हैं।

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