
भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी यानी अनंत चतुर्दशी का दिन भगवान श्री गणेश के भक्तों के लिए आस्था, उमंग और भावुकता का संगम होता है। पूरे 10 दिनों तक घर और पंडालों में विधि-विधान से विराजने के बाद इस पावन तिथि पर बप्पा को विदाई दी जाती है। ‘गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ’ के जयकारों के साथ भक्त नम आंखों से विघ्नहर्ता को विसर्जित करते हैं। शास्त्रों के अनुसार, गणेश विसर्जन हमेशा शुभ चौघड़िया मुहूर्त और उचित धार्मिक नियमों का पालन करते हुए ही करना चाहिए, ताकि परिवार में सुख, समृद्धि और शांति का वास बना रहे।
अनंत चतुर्दशी पर गणेश विसर्जन के शुभ चौघड़िया मुहूर्त
अनंत चतुर्दशी के दिन विसर्जन के लिए दिन और रात में कई शुभ मुहूर्त प्राप्त होते हैं। भक्त अपनी सुविधानुसार शुभ चौघड़िया देखकर बप्पा की विदाई कर सकते हैं:
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प्रातःकाल मुहूर्त (शुभ चौघड़िया): सुबह 06:12 बजे से सुबह 07:42 बजे तक
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पूर्वाह्न मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत चौघड़िया): सुबह 10:45 बजे से दोपहर 03:15 बजे तक (यह विसर्जन के लिए सबसे उत्तम और प्रशस्त समय माना गया है)
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अपराह्न/संध्या मुहूर्त (शुभ चौघड़िया): शाम 04:45 बजे से शाम 06:15 बजे तक
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रात्रि मुहूर्त (लाभ चौघड़िया): शाम 07:45 बजे से रात 09:15 बजे तक
शास्त्रों के अनुसार राहुकाल के दौरान विसर्जन करने से बचना चाहिए। इसलिए दोपहर के समय राहुकाल की समय सीमा का ध्यान रखना जरूरी है।
विसर्जन से पहले की अंतिम पूजा विधि
गणपति जी को जल में विसर्जित करने से पहले घर या पंडाल में उनकी अंतिम विदाई पूजा अत्यंत श्रद्धापूर्वक करनी चाहिए:
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गंगाजल से आचमन और तिलक: चौकी पर स्थापित गणपति बप्पा को स्वच्छ जल व गंगाजल अर्पित करें। इसके बाद उन्हें रोली, कुमकुम और चंदन का तिलक लगाएं।
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प्रिय भोग व दूर्वा अर्पित करें: बप्पा को उनके सबसे प्रिय 21 दूर्वा दल, लाल गुड़हल या गेंदे के पुष्प और मोदक व बेसन के लड्डू का भोग लगाएं।
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विदाई की पोटली बांधें: एक स्वच्छ लाल कपड़े में थोड़ी दूर्वा, हल्दी की गांठ, साबुत सुपारी, थोड़े अक्षत और कुछ दक्षिणा (सिक्के) रखकर एक छोटी पोटली बनाएं और इसे बप्पा के साथ बांध दें। यह मान्यता है कि विदाई के समय यात्रा के लिए भगवान को पाथेय (राशन/भेंट) दिया जाता है।
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कपूर आरती और क्षमा याचना: धूप-दीप जलाकर परिवार सहित गणेश जी की आरती गाएं। इसके बाद हाथ जोड़कर जाने-अनजाने हुई भूलों के लिए क्षमा मांगें और घर में सुख-समृद्धि बनाए रखने की प्रार्थना करें।
चौकी हिलाने और विसर्जन यात्रा के नियम
आरती और भोग के बाद विसर्जन यात्रा शुरू करने से पहले कुछ विशेष धार्मिक परंपराओं का पालन करना अनिवार्य है:
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पाट या चौकी का संचलन: आरती समाप्त होने के बाद गणपति जी की चौकी या पाटे को हल्के हाथ से अपनी जगह से कुछ इंच आगे की ओर खिसकाएं। इसे ‘देव संचलन’ कहा जाता है, जो यह संकेत देता है कि अब भगवान की विदाई का समय हो चुका है।
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सम्मानपूर्वक उठाना: घर के प्रमुख सदस्य या यजमान दोनों हाथों से आदरपूर्वक प्रतिमा को उठाएं और सीधे विसर्जन स्थल की ओर बढ़ें। विसर्जन के दौरान प्रतिमा का मुख हमेशा सामने की तरफ होना चाहिए, पीठ पीछे नहीं।
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हवन की भस्म और अक्षत: विसर्जन यात्रा पर निकलते समय बप्पा के आगे-आगे थोड़े अक्षत और पुष्प छिड़कते हुए चलें।
विसर्जन के कड़े नियम: इन गलतियों से बचें
शास्त्रों और पर्यावरण संरक्षण दोनों के लिहाज से विसर्जन के समय कुछ सावधानियां बरतना आवश्यक है:
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प्रतिमा को फेंकें नहीं: किसी भी प्राकृतिक जलाशय, नदी, तालाब या कृत्रिम कुंड में प्रतिमा को कभी भी ऊपर से फेंकना या उछालना नहीं चाहिए। पानी में धीरे-धीरे उतरकर आदरपूर्वक प्रतिमा को जल के भीतर विसर्जित करें।
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इको-फ्रेंडली विसर्जन सबसे उत्तम: यदि प्रतिमा मिट्टी (क्ले) की है, तो घर के आंगन या बालकनी में एक बड़े गमले या टब में साफ पानी भरकर विसर्जन करना सबसे पुण्यकारी माना जाता है। मूर्ति के पूरी तरह घुलने के बाद उस मिट्टी और पवित्र जल को किसी तुलसी या सुंदर पौधे के गमले में डाल दें।
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प्लास्टिक व पूजन सामग्री अलग रखें: विसर्जन के समय माला, धूपबत्ती के पैकेट, प्लास्टिक या सजावट की वस्तुएं जल स्रोतों में न डालें। केवल मिट्टी की प्रतिमा और जैविक पूजन सामग्री को ही जल में समाहित होने दें।
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घर लौटकर करें चरण वंदन: विसर्जन पूरा करके घर लौटने पर तुरंत स्नान करें अथवा हाथ-पैर धोकर घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें और बप्पा के आशीर्वाद की कामना करें।
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