
भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से दस दिवसीय गणेश जन्मोत्सव का भव्य आरंभ होता है। घर-घर में विघ्नहर्ता भगवान श्रीगणेश की सुंदर और मनमोहक प्रतिमा स्थापित की जाती है। गणेश चतुर्थी पर बप्पा की मूर्ति का चयन करते समय केवल उसकी सुंदरता ही नहीं, बल्कि शास्त्रों में बताए गए वास्तु और धार्मिक नियमों का पालन करना अनिवार्य माना गया है। बप्पा की प्रतिमा का स्वरूप घर की सुख-शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा को सीधे प्रभावित करता है। कई बार अनजाने में गलत स्वरूप की मूर्ति घर लाने से पूजन का पूर्ण फल प्राप्त नहीं हो पाता।
दाईं या बाईं: घर में स्थापना के लिए किस दिशा की सूंड वाली प्रतिमा लाएं?
गणेश जी की प्रतिमा में उनकी सूंड का घुमाव सबसे महत्वपूर्ण बिंदु माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार जिस प्रतिमा में गणपति की सूंड उनकी बाईं भुजा (देखने वाले के दाईं ओर) की तरफ घूमी होती है, उसे ‘वाममुखी गणेश’ कहा जाता है। वाममुखी गणपति चंद्र नाड़ी से जुड़े होते हैं, जिनका स्वभाव अत्यंत शांत, सौम्य और तुरंत प्रसन्न होने वाला माना गया है। गृहस्थ जीवन जीने वाले परिवारों के लिए बाईं ओर सूंड वाली मूर्ति की स्थापना ही सर्वोत्तम और कल्याणकारी मानी जाती है, क्योंकि इनकी सामान्य विधि-विधान से की गई पूजा भी पूर्ण फल प्रदान करती है।
इसके विपरीत, जिस प्रतिमा में सूंड दाईं ओर (देखने वाले के बाईं ओर) मुड़ी होती है, उसे ‘दक्षिणामुखी गणेश’ अथवा ‘सिद्धिविनायक’ कहा जाता है। दक्षिणामुखी प्रतिमा सूर्य नाड़ी से संबंधित होती है और इसमें अग्नि तत्व प्रधान होता है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि दक्षिणामुखी बप्पा की पूजा में तंत्र विद्या, कठोर ब्रह्मचर्य और अत्यंत कड़े वैदिक नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। यदि इनके पूजन में कोई छोटी सी भी त्रुटि रह जाए, तो व्यक्ति को विपरीत परिणाम झेलने पड़ सकते हैं। यही कारण है कि दक्षिणामुखी प्रतिमा की स्थापना केवल मंदिरों या विशेष साधना स्थलों पर ही की जाती है, सामान्य घरों में नहीं।
1. बैठी हुई मुद्रा वाली मूर्ति का ही करें चयन, खड़े गणेश जी न लाएं
घर के पूजा स्थल या हॉल में स्थापना के लिए हमेशा भगवान गणेश की बैठी हुई मुद्रा वाली मूर्ति लानी चाहिए। ललितासन या पद्मासन में विराजित गणेश जी घर में सुख, शांति, समृद्धि और स्थाई लक्ष्मी के वास का प्रतीक माने जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार खड़ी मुद्रा में स्थापित गणेश जी का स्वरूप चलायमान माना गया है, जिसे घर में रखना शुभ फलदायी नहीं होता। खड़ी मुद्रा वाली प्रतिमाएं कार्यालयों या व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं।
2. प्रतिमा में मूषक राज और मोदक की उपस्थिति अवश्य जांचें
गणेश जी की कोई भी प्रतिमा तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक उसमें उनके वाहन मूषक राज और उनके प्रिय मोदक का अंकन न हो। मूषक राज मनुष्य की चंचल बुद्धि और वासनाओं पर नियंत्रण का प्रतीक हैं, जबकि मोदक जीवन में मिठास, आत्मज्ञान और तृप्ति का प्रतीक माना गया है। प्रतिमा खरीदते समय यह ध्यानपूर्वक देखें कि गणेश जी के एक हाथ में या उनकी सूंड के पास मोदक अवश्य हो और उनके चरणों के निकट मूषक राज विनम्र भाव में बैठे हों।
3. प्राकृतिक मिट्टी से निर्मित इको-फ्रेंडली प्रतिमा ही घर लाएं
शास्त्रों में पार्थिव गणेश यानी मिट्टी से बने गणेश जी की पूजा को सर्वोत्तम और सर्वाधिक पुण्यदायी बताया गया है। कभी भी प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) या रासायनिक रंगों से बनी प्रतिमा घर में स्थापित न करें। पीओपी पानी में घुलनशील नहीं होता, जिससे विसर्जन के समय बप्पा की प्रतिमा खंडित होती है और यह घोर पाप व वास्तु दोष का कारण बनता है। इसके बजाय शुद्ध काली मिट्टी, नदी की मिट्टी या गाय के गोबर से तैयार पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमा ही घर लाएं।
4. प्रतिमा का रंग और भाव भंगिमा भी लाती है शुभता
गणेश जी का चेहरा हमेशा मुस्कुराता हुआ और आशीर्वाद की मुद्रा में होना चाहिए। आक्रामक, क्रोधित या अत्यधिक विचित्र कलात्मक मुद्राओं वाली मूर्तियों को घर में स्थान नहीं देना चाहिए। रंग के दृष्टिकोण से घर में सफेद, सिंदूरी या हल्के पीले रंग की गणेश प्रतिमा स्थापित करना अत्यंत मंगलकारी माना जाता है। सफेद रंग शांति और मोक्ष का प्रतीक है, जबकि सिंदूरी रंग समस्त विघ्नों को दूर कर तेज और आरोग्य प्रदान करता है।
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