जानें पवित्र स्नान-दान का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि; इन अचूक उपायों से बरसेगी मां लक्ष्मी व भगवान विष्णु की कृपा

सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि का विशेष आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व है। इस पावन तिथि को ‘भादौ पूर्णिमा’ या ‘प्रौष्ठपदी पूर्णिमा’ भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भाद्रपद पूर्णिमा जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु और धन-वैभव की अधिष्ठात्री देवी मां लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त करने का सबसे उत्तम दिन माना गया है। इसके अलावा, इस पूर्णिमा का एक बड़ा महत्व यह भी है कि इसी दिन से पितरों के तर्पण और पिंडदान के महापर्व ‘पितृ पक्ष’ (श्राद्ध महालय) की अनौपचारिक शुरुआत हो जाती है। जिन पूर्वजों का देहावसान पूर्णिमा तिथि को हुआ होता है, उनका श्राद्ध कर्म इसी पावन तिथि को विधि-विधान से संपन्न किया जाता है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस दिन श्रद्धापूर्वक किए गए पवित्र नदी स्नान, जप, तप और दान से कई गुना अधिक पुण्य फल प्राप्त होता है।

सत्यनारायण भगवान की कथा और चंद्र देव के अर्घ्य का महत्व

धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, भाद्रपद पूर्णिमा के दिन भगवान सत्यनारायण की कथा सुनना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। इस दिन घर में सत्यनारायण भगवान की पूजा कर केले के पत्ते, पंचामृत, पंजीरी और तुलसी दल अर्पित करने से परिवार के सभी कलह दूर होते हैं और सुख-शांति का वास होता है।

इसके साथ ही, पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं से परिपूर्ण रहता है। शाम के समय जल में कच्चा दूध, अक्षत और सफेद पुष्प मिलाकर चंद्र देव को अर्घ्य देने से कुंडली में चंद्र दोष शांत होता है, मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। मां लक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए इस रात कौड़ियों, खीर और कमल के पुष्प से विशेष पूजन करने का विधान है।

इस पावन दिन क्या करना रहेगा बेहद शुभ?

भाद्रपद पूर्णिमा के अवसर पर श्रद्धालुओं को कुछ विशेष धार्मिक नियमों और शुभ कार्यों का पालन अवश्य करना चाहिए:

  • पवित्र नदी स्नान: इस दिन गंगा, यमुना या किसी भी पवित्र नदी अथवा सरोवर में ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करें। यदि बाहर जाना संभव न हो, तो घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करें।

  • अन्न व वस्त्र दान: स्नान के बाद किसी जरूरतमंद, निर्धन या ब्राह्मण को सामर्थ्य अनुसार अनाज (चावल, गेहूं), तिल, सफेद वस्त्र, छाता और दक्षिणा का दान अवश्य करें। इस दिन किया गया दान पितरों को भी तृप्ति प्रदान करता है।

  • पीपल वृक्ष की पूजा: पूर्णिमा के दिन पीपल के वृक्ष में भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी का वास माना जाता है। सुबह पीपल के पेड़ में जल और कच्चा दूध अर्पित कर दीपक जलाएं और परिक्रमा करें।

  • उमा-महेश्वर व्रत: कई क्षेत्रों में भाद्रपद पूर्णिमा के दिन भगवान शिव और माता पार्वती के ‘उमा-महेश्वर’ स्वरूप का भी उपवास रखा जाता है, जिससे वैवाहिक जीवन में मधुरता और दांपत्य सुख की प्राप्ति होती है।

  • तामसिक भोजन से परहेज: इस दिन पूर्ण सात्विकता का पालन करें। घर में लहसुन, प्याज या किसी भी प्रकार के तामसिक भोजन से दूर रहें और संयम व ब्रह्मचर्य का पालन करें।

पितृ पक्ष से जुड़ा विशेष संयोग

भाद्रपद पूर्णिमा के ठीक अगले दिन से आश्विन मास के कृष्ण पक्ष के 16 दिवसीय पितृ पक्ष की शुरुआत हो जाती है। इसलिए इस दिन पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान या जल देने का विशेष प्रावधान शास्त्रों में वर्णित है। इस दिन कौवे, गाय, कुत्ते और चींटियों को भोजन (ग्रास) निकालना न केवल पितृदोष से राहत दिलाता है, बल्कि परिवार में सुख-समृद्धि और आरोग्य का वरदान भी सुनिश्चित करता है।

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